प्रो. रसाल सिंह। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की नौवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक अंडरस्टैंडिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियांड भाग-दो में हुआ परिवर्तन एक पाठ्यक्रम संशोधन मात्र नहीं, बल्कि समकालीन भारत में इतिहास के पुनर्पाठ का उल्लेखनीय प्रयास है। पचास वर्षों से अधिक समय तक भारतीय विद्यार्थी मध्यकालीन भारत को मुख्यतः विदेशी आक्रांताओं के नजरिये से पढ़ते आए हैं।

दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य की प्रशासनिक एवं आर्थिक व्यवस्था, विकसित स्थापत्य कला, उन्नत एवं अभिजात्य जीवनशैली और अपराजेय सैन्य शक्ति एवं गंगा-जमुनी तहजीब आदि उस पुराने पाठ का केंद्र थे। मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाले वामपंथी इतिहासकार उसका गुणगान समन्वय और सहिष्णुता की संस्कृति के नाम पर करते रहे। इस दृष्टि ने निश्चय ही भ्रामक इतिहास-बोध वाली ऐसी पीढ़ियां तैयार कीं, जो स्वदेश की गौरवपूर्ण प्रतिरोध परंपरा और देशज सुशासन व्यवस्था और प्रगत कला-संस्कृति से अपरिचित और अनभिज्ञ रह गईं।

नई पुस्तक में बताया गया है कि भारतीय उपमहाद्वीप ने बार-बार विदेशी आक्रमण, धार्मिक भेदभाव और सामाजिक-आर्थिक संकट झेले, पर स्वदेशी शक्तियों ने लगातार उन आक्रांताओं का प्रतिरोध किया, जो घुसपैठ कर रहे थे। इसमें अनेक ऐसे प्रसंग जोड़े गए हैं, जो अब तक मुख्यधारा की पाठ्यपुस्तकों में या तो फुटनोट में थे या पूरी तरह अनुपस्थित थे। महाराणा प्रताप और अकबर की सेनाओं के बीच 1582 में विजयदशमी के दिन लड़ा गया दिवेर के युद्ध को विस्तार से रखा गया है।

मेवाड़ की सेना ने इस युद्ध में मुगल सेना को पराजित करके अपने खोए हुए क्षेत्रों पर पुनः अधिकार प्राप्त किया था। उत्तर-पूर्व भारत के शक्तिशाली अहोम साम्राज्य का उल्लेख है, जिसने लगभग छह सौ वर्षों तक अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखी और सरायघाट के युद्ध (1671) में ‘उत्तर-पूर्व के शिवाजी’ कहे जाने वाले वीर योद्धा लचित बोरफुकन के नेतृत्व में मुगल सेना को पराजित किया।

इसमें दक्षिण भारत के विजयनगर साम्राज्य की सामर्थ्य और प्रतिरोध, मराठों की स्वराज की अवधारणा का भी वर्णन है। औरंगजेब की जजिया सहित भारी कर लगाने और धार्मिक कट्टरता की नीतियों के विरुद्ध 1669 में गोकुला जाट और 1686 में सिनसिनी के जमींदार राजाराम के नेतृत्व में हुए विद्रोह, सिख गुरुओं की आध्यात्मिक और राजनीतिक दृढ़ता, गुरु अर्जुन देव और गुरु तेग बहादुर के बलिदान, गुरु गोविंदसिंह के सशस्त्र संघर्ष और खालसा पंथ की स्थापना आदि के माध्यम से स्थापित किया गया है कि विदेशी आक्रमणों का प्रतिरोध अखिल भारतीय स्तर पर था।

पुस्तक में मंदिरों के विनाश और पुनर्निर्माण का इतिहास भी है। इसमें बताया गया है कि कैसे काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण पहले राजा टोडरमल और राजा मान सिंह ने कराया, फिर औरंगजेब द्वारा ध्वस्त किए जाने के बाद उसका पुनर्निर्माण देवी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया। जब मंदिर बनाना प्रतिबंधित हुआ तो श्रीमंत शंकरदेव, माधवदेव, चैतन्य महाप्रभु, चंडीदास, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई, गुरु नानक, भक्त नरसी, ललद्यद आदि भक्त कवियों ने अपने गीतों और पदों के माध्यम से सनातन धर्म, भारतीयता और आध्यात्मिक भावना की रक्षा की।

पुस्तक में शासन और सुशासन को केवल पश्चिमी लोकतंत्र (वेस्टमिंस्टर प्रणाली आदि) की देन न मानकर उसकी जड़ें भारतीय परंपरा में खोजी गई हैं। भारत की सुशासन की समझ वैदिक युगीन सभा/समिति, रामायणकालीन रामराज्य और महाभारतकालीन राजधर्म के अलावा मुंडक उपनिषद, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और चोल वंश कालीन सेंगोल जैसे विचारों, ग्रंथों और प्रतीकों से विकसित होते हुए आधुनिक संविधान-आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिक भागीदारी तक पहुंची है। इसमें कई भारतीय संस्थानों के आदर्श वाक्य इसीलिए जोड़े गए, ताकि विद्यार्थी को यह समझ आए कि हमारी संवैधानिक संस्थाएं अपनी प्रेरणा और प्रतीक अपनी ही परंपरा से लेती हैं।

इस पहल से भारत की युवा पीढ़ी में आत्म-गौरव का पुनर्जागरण होगा, क्योंकि पुराने इतिहास-बोध ने एक प्रकार की हीनता और आत्म-विस्मृति पैदा की थी। भारत की सांस्कृतिक एकता की समझ विकसित होगी। अब विद्यार्थी को भारत एक मानचित्र मात्र नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना का साकार रूप लगेगा। शासन के भारतीय मानकों की श्रेष्ठ परंपरा का पुनर्स्थापन होगा। इतिहास के प्रति आलोचनात्मक और भारत-केंद्रित दृष्टि का विकास होगा।

इस पहल का सबसे दूरगामी प्रभाव विद्यार्थियों के भविष्य-संबंधी दृष्टिकोण निर्माण में होगा। एक समाज जो अपने अतीत में केवल पराजय देखता है, वह भविष्य में भी केवल अनुकरणजीवी बनता है। एक राष्ट्र जो अपने अतीत में प्रतिरोध और पुनर्निर्माण देखता है तथा अपनी शासन परंपरा और प्रतीकों में न्याय, करुणा एवं कल्याण देखता है, वह भविष्य में आत्मनिर्भर बनकर वैसा ही माडल निर्मित करने का उद्यम करता है। यह चेतना ही राष्ट्रीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण का मूलमंत्र है।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में प्रोफेसर हैं)