उमेश चतुर्वेदी। उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की औपचारिक घोषणा में अभी देर है, लेकिन सियासी मोर्चेबंदी तेज होती जा रही है। विपक्षी दलों के मोर्चे आईएनडीआईए को लगता है कि जिस तरह बीते लोकसभा चुनावों में ‘संविधान रक्षा’ का उसका दांव किंचित सफल रहा था, उसकी तुलना में एसआईआर का विरोध उसके लिए कहीं ज्यादा कारगर साबित हो सकता है। एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उसका धरना-प्रदर्शन उसके इसी सोच का प्रतीक है। विपक्षी गठबंधन को लगता है कि एसआईआर उसके लिए ऐसा सियासी हथियार साबित होगा, जिसके जरिये वह भाजपा को हरा सकता है। विपक्षी गठबंधन का यह मंसूबा कितना सफल होगा, यह बाद में पता चलेगा, लेकिन एसआईआर के बहाने विपक्ष जो राजनीतिक उठापटक कर रहा है, उसकी असलियत को जानना-समझना जरूरी हो जाता है।

यह पहला मौका नहीं है जब चुनाव में पराजित राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाया हो। 1971 के आम चुनाव में हार के बाद भारतीय जनसंघ के प्रमुख बलराज मधोक ने रूसी स्याही के जरिये चुनावी फर्जीवाड़े का आरोप लगाया था। हालांकि पहले राजनीतिक दल कम से कम इस तथ्य का ध्यान रखते थे कि संस्था के रूप में चुनाव आयोग की साख कमजोर न हो। केंद्र में नरेन्द्र मोदी के उभार के बाद करीब हर चुनाव में हार रहे दल चुनाव आयोग पर सवाल तो उठा ही रहे हैं, साथ ही उसकी साख पर भी आघात कर रहे हैं। 2014 की चुनावी हार के समय विपक्षी दल सकते में रहे, इसलिए तब चुनाव आयोग के खिलाफ सवाल नहीं उठे। अलबत्ता इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों यानी ईवीएम को हैक करने का शिगूफा छेड़ा जाने लगा।

इसे कांग्रेस की अगुआई में लगभग समूचे विपक्षी दलों ने हवा दी। विपक्षी दलों के इस कोरस गान में वामपंथी वैचारिकी ने भरपूर सहयोग दिया। ईवीएम को हैक करने को लेकर हास्यास्पद दावे तक किए गए। हारकर चुनाव आयोग को ईवीएम हैक करने के लिए सार्वजनिक चुनौती देनी पड़ी, जिसका किसी के पास कोई जवाब नहीं था। फिर भी एक के बाद एक चुनावों में भाजपा की जीत पर ईवीएम को घेरा जाता रहा। हालांकि जब 2015 के बिहार, 2020 के दिल्ली, 2016 और 2021 के बंगाल विधानसभा चुनावों में भाजपा तमाम कोशिशों के बावजूद हार गई, तब कोई हंगामा नहीं हुआ।

आज देश की राजनीति जिस पड़ाव पर है, उसमें विरोधियों की साख को हवा में उछालना बड़ा कार्य मान लिया गया है। जैसे अगर किसी चुनाव में भाजपा को जीत मिलती है तो विपक्षियों का तर्क होता है कि चुनाव आयोग ने ईवीएम में हेराफेरी करके उसे जिता दिया। वहीं भाजपा जब हार जाती है तो यही विपक्षी खेमा जीत का जश्न मनाते हुए कहता है कि भाजपा जानबूझकर चुनाव हार गई। बंगाल में भाजपा की जीत विपक्ष को पच नहीं रही, लेकिन केरल और तमिलनाडु में अपनी जीत में उसे कोई खराबी नहीं दिखती। वास्तविकता यह है कि विपक्षी खेमा हार के पीछे अपनी नीतियों की नाकामी और अपने अनाचार को जिम्मेदार नहीं मानता। उलटे चुनाव आयोग और ईवीएम पर ही ठीकरा फोड़ता रहता है।

राहुल गांधी के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे की नजर में मोदी तानाशाह हैं, लेकिन उन्हीं को संसद से लेकर सड़क तक अपशब्दों से भी नवाजने से ये दल नहीं चूकते। जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शनों के दौरान मोदी के लिए जिन अश्लील अपशब्दों की जो बौछार हुई, विपक्षी खेमा उन पर लहालोट नजर आया। सवाल यह है कि ऐसा कौन-सा तानाशाह होगा, जिसे ऐसी गालियां खुलेआम दी जा सकती हैं? और वह गालीबाजों को दंडित करने के बजाय उन्हें क्षमा कर दे।

जहां तक ज्ञानेश कुमार की बात है तो वह उसी केरल कैडर के आईएएस अधिकारी रहे हैं, जहां समय-समय पर कांग्रेस-वाम दलों की सरकारें रही हैं। जाहिर है कि राज्य में काम करते वक्त उनका रिश्ता वामपंथी और कांग्रेसी नेताओं से भी रहा होगा। दोनों भले ही राज्य में विरोधी हों, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में दोनों खेमों के साझा दुश्मन मोदी और भाजपा हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि गृह मंत्रालय में सेवा के दौरान अनुच्छेद 370 की समाप्ति में ज्ञानेश कुमार की भूमिका और समान नागरिक संहिता के लिए जमीन तैयार करने जैसे कार्यों के चलते भी वे विपक्षी दलों की आंखों की किरकिरी बन चुके हैं।

यह पहला मौका नहीं है जब किसी लोकतांत्रिक संस्था को साखहीन साबित करने के लिए विपक्षी खेमे ने अपने घोड़े नहीं खोले। मोदी के सत्ता में आने के साढ़े तीन साल बाद न्यायपालिका को उनकी सरकार के इशारों पर नाचने वाला बताने की कोशिशें खूब हुईं। सीबीआई से लेकर ईडी की कार्रवाइयों को भी राजनीति से प्रेरित बताया जाता। चाहे ऐसी कार्रवाई खूंखार अपराधियों, आतंकियों और जालसाजों के खिलाफ क्यों न हो। किसी अल्पसंख्यक अपराधी के खिलाफ पुलिस ने कार्रवाई कर दी, तो उसे सांप्रदायिक नजरिये से देखने और दिखाने का प्रपंच किया जाता। यहां तक कि विपक्षी दल जून 2020 में गलवन घाटी में भारतीय और चीनी सेना के बीच संघर्ष में भी भारतीय सैन्य बलों को कमजोर दिखाने से बाज नहीं आए। जबकि तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अनुसार गलवन में भारतीय सैनिकों का पलड़ा ही भारी रहा था।

आज यह स्पष्ट है कि विपक्ष का अभियान जन के मन में पैठ नहीं कर पा रहा। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी ने वोटर अधिकार यात्रा निकाली थी, जो टांय-टांय फिस्स साबित हुई। इसके पहले जनवरी, 2024 में मणिपुर से शुरू और मुंबई में खत्म हुई ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में मोदी के निशाने पर होना कोई बड़ी बात नहीं थी, लेकिन इसके जरिये सीधे-सीधे संस्थाओं को निशाना बनाने की कोशिश हुई। जहां तक जवाबदेही की बात है तो चाहे ज्ञानेश कुमार हों या फिर कोई और, अगर किसी ने गड़बड़ी की है तो उस पर विधिसम्मत कार्रवाई होनी ही चाहिए, लेकिन संस्थाओं की साख पर सवाल उठाकर ऐसा नहीं होना चाहिए। अगर संस्थाएं अपनी नैतिक आभा के साथ नहीं बची रहीं तो तय मानिए कि यह लोकतंत्र की सेहत के लिए शुभ नहीं होगा।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)