डॉ. जयंतीलाल भंडारी। हाल में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में आयोजित 57वीं वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परिषद की बैठक में जीएसटी को सरल एवं बेहतर बनाने के लिए बड़े बदलाव किए। ये बदलाव करीब एक साल पहले जीएसटी दरों और स्लैब को कम करने के लिए गए उठाए गए महत्वपूर्ण कदमों के बाद अब जीएसटी व्यवस्था में सुधार को नई धार देते हुए दिखाई दे रहे हैं। जीएसटी परिषद के नए फैसले पंजीकरण, टैक्स रिटर्न, रिफंड, इनपुट टैक्स क्रेडिट (आइटीसी), कर प्रवर्तन, निर्यात, विवाद निपटान और विभिन्न प्रदेशों के बीच वस्तुओं की आवाजाही से जुड़े नियमों को सरल और लाभप्रद बनाने से संबंधित हैं। वस्तुतः यह पूरी कवायद, व्यापार सुगमता (ईज आफ डूइंग बिजनेस) और कर अनुपालन के सरलीकरण पर केंद्रित हैं।

उल्लेखनीय है कि जीएसटी परिषद ने कर अधिकारियों की गिरफ्तारी की शक्तियों को समाप्त करने और अभियोजन की सीमा को बढ़ाए जाने की ऐतिहासिक सिफारिश की है। इससे 'कर आतंक' का डर खत्म होगा और ईमानदारी से व्यापार करने वालों का भरोसा बढ़ेगा। परिषद ने आइटीसी और रिफंड की प्रक्रियाओं को बेहद तेज और पारदर्शी बनाने का निर्णय लिया है। इससे व्यवसायों के पास नकदी का प्रवाह बढ़ेगा, जिससे वे नया निवेश कर सकेंगे। कुल कर देनदारी 10,000 रुपये से कम होने पर जीएसटी के तहत कारण बताओ नोटिस नहीं दिए जाने, सामान्य जुर्माने की सीमा घटाए जाने और भारतीय कंपनियों के विदेशी कारोबार को कुछ शर्तों के साथ निर्यात माने जाने संबंधी सिफारिशों से उद्योग-कारोबार के विकास का नया दौर शुरू होगा।

खासतौर से छोटे और असंगठित विक्रेताओं को ई-कामर्स प्लेटफार्म के वेयरहाउस का उपयोग कर व्यापार करने की अनुमति मिलने से डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार इन बदलावों से निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज होगी, अनुपालन लागत में कमी आएगी और करदाताओं को आटोमेटेड रिफंड की सुविधा मिलेगी। निश्चित रूप से अगले साल एक अप्रैल से लागू होने वाले इन नए जीएसटी सुधारों से जहां जीएसटी संबंधी मुश्किलों का सामना कर रहे एमएसएमई, स्टार्टअप्स और छोटे व्यापारियों को बड़ा लाभ होगा, वहीं कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान, महंगाई और कमजोर मानसून जैसी चुनौतियों का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को भी रफ्तार पकड़ने में मदद मिलेगी।

वित्त मंत्रालय ने सितंबर 2026 की अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, वैश्विक वित्तीय अस्थिरता, अमेरिकी व्यापार नीतियों से जुड़ी अनिश्चितताएं, महंगाई और देश में कमजोर मानसून से निर्मित परिस्थितियां इस समय देश की आर्थिक वृद्धि की गति को बनाए रखने में बड़ी चुनौती बन गई हैं। हालांकि आरबीआइ द्वारा प्रकाशित बुलेटिन 'स्टेट आफ द इकोनमी' के अनुसार इन सबके बावजूद मजबूत घरेलू बुनियाद के दम पर देश की अर्थव्यवस्था दमदार बनी हुई है। इस परिदृश्य के कारण भारत की अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी तिमाही यानी जुलाई से सितंबर में 7.3 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल कर सकती है, जबकि पहली तिमाही में भारत ने 7.8 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की थी।

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक सुस्ती के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में लचीलापन देखने को मिला है। हाल में प्रकाशित विश्व बैंक की नई रिपोर्ट में चालू वित्त वर्ष के लिए भारत की विकास दर के पूर्व निर्धारित अनुमान 6.6 प्रतिशत को बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत कर दिया गया है। भारत की जीडीपी वृद्धि अनुमान में बढ़ोतरी का मुख्य आधार मजबूत घरेलू मांग, निजी खपत में लगातार सुधार और बुनियादी ढांचा क्षेत्र में सरकारी एवं निजी निवेश में आई तेजी है। इसी कारण क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भारत की सावरेन क्रेडिट रेटिंग को 'बीएए 3' पर बनाए रखा है और देश के आर्थिक आउटलुक को 'स्थिर' रखा है। दुनिया की प्रसिद्ध जापानी क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (जेसीआर) ने भारत की सावरेन रेटिंग को भी बीबीबी+ से बढ़ाकर ए- कर दिया है। यह भारत की मजबूत आर्थिक वृद्धि, ठोस निजी खपत, निरंतर सार्वजनिक निवेश और सुदृढ़ होती वित्तीय व्यवस्था के कारण संभव हुआ है। यद्यपि विकास की गति सकारात्मक है, लेकिन भविष्य की चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है। भारत को वैश्विक और घरेलू आर्थिक चुनौतियों का रणनीतिपूर्वक सामना करते हुए आगे बढ़ना होगा।

नि:संदेह देश की आर्थिक रफ्तार बनाए रखने और जीएसटी व्यवस्था को और अधिक कारगर बनाने के लिए कई और बातों पर ध्यान देना जरूरी है। जैसे कि जीएसटी विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार नियंत्रित करना होगा। आपूर्तिकर्ता द्वारा कर जमा न करने पर ईमानदार खरीदारों के कर जमा (इनपुट टैक्स क्रेडिट) को रोके जाने से बचाने के लिए कड़े कानूनी सुरक्षा नियम लागू करने होंगे। एमएसएमई और निर्यातकों के लिए कर वापसी प्रक्रिया को शत-प्रतिशत स्वचालित और जोखिम-आधारित बनाकर व्यावसायिक पूंजी का प्रवाह तेज करना होगा। करदाताओं और अधिकारियों के बीच सीधे संपर्क को समाप्त करने वाली कर-अधिनिर्णयन प्रणाली को सभी राज्यों में पूरी तरह लागू करना होगा।

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)