जागरण संपादकीय: एक जरूरी इनकार
वैसे तो राहुल गांधी एक लंबे अर्से से एसआईआर को वोट चोरी बताने में लगे हुए हैं, लेकिन जबसे यह समाचार आया कि एसआईआर के कुछ पहलुओं पर दोनों चुनाव आयुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त से असहमत थे, तबसे राहुल गांधी नए सिरे से आक्रामक हो गए।
HighLights
मुख्य न्यायाधीश ने राहुल गांधी से मुलाकात करने से स्पष्ट इनकार किया।
एसआईआर का मुद्दा पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है।
राहुल गांधी के गैर-जिम्मेदाराना राजनीतिक व्यवहार पर संपादकीय ने सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने राहुल गांधी एवं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुलाकात करने में असमर्थता जताकर बिल्कुल सही कदम उठाया। जिस मामले की सुप्रीम कोर्ट पहले से ही सुनवाई कर रहा हो, उसे लेकर किसी दल के नेताओं को मुख्य न्यायाधीश से संपर्क एवं संवाद करने का न तो कोई औचित्य है और न ही ऐसी कोई परंपरा रही है। राहुल गांधी शुद्ध संकीर्ण राजनीतिक कारणों से एक नई, किंतु खराब परंपरा स्थापित करने की जो कोशिश कर रहे थे, उसे खारिज किया जाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य था।
यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने राहुल गांधी के समक्ष उन कारणों को दो टूक ढंग से स्पष्ट किया कि वे उनसे मुलाकात क्यों नहीं कर सकते? अच्छा हो कि राहुल गांधी को यह समझ आए कि वे हर मामले में मनमानी नहीं चला सकते। उन्हें सुनिश्चित लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के साथ ही आगे बढ़ना होगा। इसलिए और भी, क्योंकि वे गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार करने के आदी हो चुके हैं। कुछ दिनों पहले उन्होंने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर के मुद्दे पर ही राष्ट्रपति से मुलाकात करने के बाद इतना अधिक बेतुका बयान दिया कि राष्ट्रपति भवन को उसका तुरंत खंडन करना पड़ा।
इस खंडन ने राहुल गांधी को एक अगंभीर एवं अविश्वसनीय नेता के तौर पर ही रेखांकित किया। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि एक बार वे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर भी गलत बयानी कर चुके हैं। इसके लिए उन्हें माफी भी मांगनी पड़ी थी, लेकिन उनका रवैया सुधरा नहीं। एसआईआर के मुद्दे को अनावश्यक तूल दे रहे राहुल गांधी ने इस तथ्य की अनदेखी ही कि इस मुद्दे की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की पीठ की ओर से ही की जा रही है। यदि उन्हें इस मामले में कुछ और कहना-बताना था तो उसका तरीका याचिका ही हो सकता था। आखिरकार उन्हें इसी तरीके का सहारा लेना पड़ा।
वैसे तो राहुल गांधी एक लंबे अर्से से एसआईआर को वोट चोरी बताने में लगे हुए हैं, लेकिन जबसे यह समाचार आया कि एसआईआर के कुछ पहलुओं पर दोनों चुनाव आयुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त से असहमत थे, तबसे राहुल गांधी नए सिरे से आक्रामक हो गए। हालांकि इस खबर के बाद तीनों चुनाव आयुक्तों ने यह बयान जारी करके स्पष्ट किया कि जो भी असहमतियां थीं, उनका समाधान कर लिया गया था। कायदे से इसके साथ ही इस प्रसंग का पटाक्षेप हो जाना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सड़कों पर उतरना आवश्यक समझा। बहती गंगा में हाथ धोने के लिए कॉकरोच जनता पार्टी के लोग भी मैदान में आ गए। राहुल गांधी और सीजेपी के नेता कुछ भी दावा करें, एसआईआर को लेकर उनका शोरगुल एक शिगूफे से अधिक कुछ नहीं।

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