राजीव सचान। अपने देश को आजादी ही आंदोलन के जरिये मिली थी, इसलिए उसकी एक परंपरा विकसित हो गई। इसलिए और भी, क्योंकि संविधान शांतिपूर्ण तरीके से धरना-प्रदर्शन का अधिकार देता है। यह अधिकार लोकतंत्र की एक शक्ति है। विडंबना यह रही कि आंदोलन की परंपरा विकसित होने के साथ ही विकृत भी होती गई। इसके चलते देश अराजकता भरे अनेक आंदोलनों का गवाह बना। कई बार इस अराजकता के चलते जान के साथ माल का भी भारी नुकसान हुआ है। आंदोलनों के उग्र हो जाने के परिणामस्वरूप पुलिसकर्मियों की भी जानें गई हैं। आंदोलनों के दौरान न जाने कितनी बार सार्वजनिक संपत्ति के साथ-साथ आम लोगों के वाहन जलाए गए हैं। इसका शायद ही किसी को अनुमान हो कि उग्र आंदोलनों के चलते ट्रेन की कितनी बोगियां फूंकी जा चुकी हैं और कितनी बसें एवं कारें तोड़ी या जलाई जा चुकी हैं। इसका भी हिसाब किसी के पास नहीं कि चक्का जाम आंदोलनों से वाहनों और रेलों का आवागमन रोक देने या फिर सड़क घेरकर बैठ जाने से कितने करोड़ों-करोड़ लोग परेशान होते रहते हैं। आंदोलनों के कारण अपने काम-धंधे के लिए निकले आम लोग खीझते रहते हैं, लेकिन उनकी पहले भी सुनवाई नहीं होती थी और अब भी नहीं होती। कोई उनकी पीड़ा को न सुनता है और न ही समझता है। आंदोलन से परेशान लोग किसी को कोसें, अंततः उनके हिस्से में क्षोभ और कुंठा ही आती है।

सड़क पर उतरे कुछ सौ प्रदर्शनकारी अपने उग्र-अराजक रवैये से हजारों-लाखों लोगों की नाक में दम कर सकते हैं। याद करें सीएए के खिलाफ शाहीन बाग आंदोलन और कृषि कानून विरोधी आंदोलन। 'भारत बंद' की पुकार पर कई आंदोलन और विरोध प्रदर्शन देशव्यापी भी होते हैं, लेकिन अब ऐसा करते हुए ऐसे नारे भी लगने लगे हैं, 'बंद दुकानें तुम्हारी, खुली दुकानें हमारी।' इसका अर्थ होता है कि यदि किसी ने देश, प्रदेश या जनपद बंद के दौरान दुकान खोलने का साहस किया तो उसमें तोड़फोड़ हो सकती है। अनेक ऐसे आंदोलन होते हैं, जिनमें प्रदर्शनकारी या तो एक स्थान पर नारेबाजी करते हैं या किसी अधिकारी के कार्यालय तक मार्च करते हुए जाते हैं और वहां उसे ज्ञापन देकर आते हैं। आम तौर पर वे पुलिस बैरिकेडिंग से आगे नहीं बढ़ते, लेकिन अब बिना अनुमति धरना-प्रदर्शन करना और पुलिस बैरिकेडिंग गिराकर या लांघकर आगे बढ़ना आम हो गया है। जब ऐसा होता है तो पुलिस लाठीचार्ज करती है। कई बार भीड़ तितर-बितर हो जाती है, लेकिन कभी वह भी पिटती है और पुलिस भी। ऐसे मौकों पर भीड़ के उग्र हो जाने की स्थिति में उस पर गोली चलाने की भी नौबत आती रही है। अब तो पुलिस को अराजकता का सहारा ले रहे आंदोलनकारियों से ही नहीं, तमाशबीनों, पेशेवर आंदोलनजीवियों, यूट्यूबरों, रीलबाजों की जमात और अफवाह फैलाने वालों से भी निपटना पड़ता है।

आंदोलन इसलिए लोकतंत्र के लिए आवश्यक होते हैं, क्योंकि वे आक्रोशित या पीड़ित समूह के आक्रोश को निकालने का काम करते हैं। किसी ने सही ही कहा है कि आंदोलन प्रेशर कुकर जैसे होते हैं। लोग तार्किक और न्यायसंगत के साथ अतार्किक मांगों को लेकर भी आंदोलन कर सकते हैं। करते भी हैं। इसे रोका नहीं जा सकता। धरना-प्रदर्शन, रैली-सभा या आंदोलन के दौरान झूठे दावे करने पर भी कोई रोक नहीं। याद करें जब बोफोर्स तोप सौदे में दलाली का मामला गर्म था, तब वीपी सिंह जेब से एक पर्ची निकाल कर कहते थे कि इसमें दलालों के नाम हैं। वक्त आने पर बताएंगे। सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान यह कुप्रचार किया गया कि इससे मुसलमानों की नागरिकता छीन ली जाएगी। कृषि कानून विरोधी आंदोलन के दौरान कथित किसान नेता कहते थे कि सरकार किसानों के खेत छीनकर अंबानी-अदाणी को दे देगी। राफेल सौदे में दलाली के अपने आरोप को पुख्ता करने के लिए राहुल गांधी दावा करते थे कि खुद मोदी ने दलाली खाने वाले की जेब में पैसा डाला है।

कई बार आंदोलनकारियों के पास कोई तार्किक मुद्दा होता है, पर वे आंदोलन के लिए अराजक तरीके अपनाना पसंद करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे ज्यादा से ज्यादा लोग तंग होंगे और इससे ही शासन-प्रशासन दबाव में आएगा। अब न्यायपालिका को भी दबाव में लेने का काम होने लगा है। बीते दिनों राहुल गांधी ने उस मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मिलने की इच्छा जताई, जिसकी कोर्ट सुनवाई कर रहा है। जब उन्हें बताया गया कि ऐसा नहीं हो सकता तो वे विपक्षी नेताओं के साथ सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करते हुए गए और पुलिस को चकमा देकर याचिका देने का नया तरीका चुना। कुल मिलाकर धरना-प्रदर्शन के तरीके तेजी से बदल रहे हैं। इस क्रम में आंदोलन करने वाले पुलिस-प्रशासन के साथ आम लोगों के लिए कहीं अधिक परेशानी का कारण बन रहे हैं, क्योंकि अब आंदोलन के नाम पर कोई भी समूह कहीं भी, कभी भी सड़क पर हंगामा खड़ा कर सकता है। कोई नहीं जानता कि आंदोलनों का प्रोटोकाल कब बनेगा, जिसकी कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने जरूरत जताई थी। यदि आंदोलनों की प्रकृति इसी तरह बदलने के साथ विकृत होती रही तो लोकतंत्र कितना सशक्त होगा, यह तो पता नहीं, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि उनके आगे आम जनता खुद को और अधिक असहाय-निरुपाय महसूस करेगी और उसकी कोई नहीं सुनेगा।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)