विचार: कानूनों के दुरुपयोग से उपजा संकट
कानूनों का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग देश में विधि के शासन पर स्थापित व्यवस्था के समक्ष विश्वास का संकट खड़ा करता है।
HighLights
जीएसटी कानून के दुरुपयोग पर वित्त मंत्री की राहत।
लंबित मामले, विचाराधीन कैदी न्याय प्रणाली पर बोझ।
गिरफ्तारी को अपवाद बनाना, झूठी शिकायतों पर दंड।
सिद्धार्थ मिश्रा। पिछले दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जीएसटी कानून के दुरुपयोग एवं उनकी जटिलताओं से परेशान कारोबारियों को बड़ी राहत दी। नई व्यवस्था के अनुसार अब जीएसटी अधिकारी कारोबारियों को जीएसटी कानूनों का हवाला देकर गिरफ्तार नहीं कर सकेंगे और इसके लिए उन्हें कोर्ट से आदेश लेना होगा।
इसमें संदेह नहीं कि देश में जीएसटी कानूनों का दुरुपयोग हुआ है, लेकिन यह दुरुपयोग केवल जीएसटी कानून या किसी एक कानून तक सीमित नहीं रहा है और यह भी आवश्यक नहीं है कि दुरुपयोग अधिकारियों द्वारा ही किया गया हो, जनता द्वारा कानूनों के दुरुपयोग के मामले भी प्राय: सामने आते रहते हैं।
कानून देश की नींव होते हैं और पूरे देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और विधिक संरचना कानूनों पर ही आधारित होती है। कानूनों का निर्माण एक ओर नागरिकों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की प्राप्ति सुनिश्चित करने और दूसरी तरफ समाज और देश में शांति, सुरक्षा, अनुशासन, व्यवस्था, विकास और प्रगतिशीलता बनाए रखने के लिए किया जाता है।
कानूनों का निर्माण उनके ईमानदार एवं सच्चाई से उपयोग तथा अनुपालन के उद्देश्य से होता है, परंतु स्थिति तब विकट हो जाती है जब नेक नीयत से बनाए गए कानूनों का दुरुपयोग होने लगता है। यह स्थिति देश में विधि के शासन पर स्थापित व्यवस्था के लिए न केवल गंभीर चुनौती पेश करती है, बल्कि उस अवधारणा को कमजोर कर उसके समक्ष विश्वास का संकट खड़ा कर देती है।
भारत में व्यक्तिगत विवादों में कानूनों का दुरुपयोग एक पुरानी समस्या है, लेकिन आज यह केवल कुछ व्यक्तिगत विवादों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह न्याय-प्रणाली, पुलिस-तंत्र और मुकदमेबाजी की संस्कृति से जुड़ा एक गंभीर संरचनात्मक संकट बन चुका है।
कानून का उपयोग अधिकारों और दायित्वों के ईमानदारी से क्रियान्वयन के लिए किया जाना चाहिए, लेकिन जब किसी कानून का प्रयोग दबाव डालने, प्रतिशोध लेने, लाभ-प्राप्ति के लिए या विलंब के एक औजार के रूप में होने लगे, तब उसका नैतिक और संवैधानिक संतुलन बिगड़ जाता है।
देश में लंबित मामलों, विचाराधीन कैदियों और अत्यधिक बोझिल आपराधिक न्याय-व्यवस्था ने कानूनों के दुरुपयोग के लिए अनुकूल स्थिति बनाई है। राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड के अनुसार, 30 जुलाई, 2026 तक कुल 4,99,11,920 मामले लंबित थे, जिनमें लाखों आपराधिक और सिविल विवाद थे। 31 दिसंबर, 2024 तक भारत की जेलों की क्षमता 4,53,769 थी, लेकिन वहां 5,11,542 कैदी बंद थे, यानी जेलें 112.7 प्रतिशत क्षमता पर चल रही थीं। इसी तारीख पर 3,71,440 कैदी विचाराधीन कैदी थे, जो कुल जेल-जनसंख्या का लगभग 72.6 प्रतिशत था।
भारत में सामान्यत: लगभग हरेक कानून का दुरुपयोग होता है, मगर सर्वाधिक दुरुपयोग वैवाहिक, पारिवारिक, संपत्ति-विवादों और जाति- भेदभाव संबंधी विवादों में दिखता है। कई मामलों में गंभीर शिकायतें वास्तविक होती हैं, लेकिन कुछ मामलों में शिकायतों का इस्तेमाल बदला, दबाव या समझौते के साधन के रूप में किया जाता है।
घरेलू विवाद, दहेज-संबंधी आरोप, संपत्ति पर कब्जे और पड़ोसियों के झगड़ों में झूठी प्राथमिकी दर्ज करने और गिरफ्तारी कराने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ऐसे में मुकदमे का परिणाम चाहे जो हो, लेकिन प्रक्रिया-भर में प्रतिवादी को सामाजिक, आर्थिक और मानसिक क्षति झेलनी पड़ती है।
यही कारण है कि दुरुपयोग की समस्या को केवल 'झूठे केस' कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह एक प्रकार से 'प्रक्रियात्मक दंड' की समस्या भी है। समस्या का एक मूल कारण गिरफ्तारी की अत्यधिक उपयोग-प्रवृत्ति भी है।
कई मामलों में पुलिस पहले हिरासत, फिर जांच के सिद्धांत पर काम करती है। इससे कानून के दुरुपयोग की आशंका बढ़ती है, क्योंकि गिरफ्तारी स्वयं एक दंड बन जाती है। नौकरी, प्रतिष्ठा, परिवार, कारोबार और मानसिक स्वास्थ्य-इन सब पर गिरफ्तारी का प्रभाव पड़ता है, भले ही बाद में व्यक्ति बरी हो जाए।
इस संकट का समाधान कानूनों को अधिक सटीक, जवाबदेह और समयबद्ध बनाने में है। पहली आवश्यकता है गिरफ्तारी को अपवाद बनाना, न कि स्वचालित प्रतिक्रिया। दूसरी, झूठी, दुर्भावनापूर्ण या बदले की भावना से दायर शिकायतों पर क्षतिपूर्ति और उचित दंड को प्रभावी बनाना।
तीसरी, पुलिस और अभियोजन की प्रारंभिक जांच को अधिक विश्वसनीय बनाना, ताकि हर विवाद सीधे आपराधिक मुकदमे में न बदला जाए। चौथी, न्यायालयों की क्षमता बढ़ाकर लंबित मामलों को कम करना, क्योंकि देरी स्वयं दुरुपयोग की जमीन तैयार करती है। डिजिटल न्याय-प्रबंधन इस दिशा में उपयोगी हो सकता है।
यदि न्यायालय, पुलिस और अभियोजन के डाटा का नियमित विश्लेषण किया जाए, तो यह पहचाना जा सकता है कि कौन-से प्रविधान सबसे अधिक विवादास्पद हैं, किन क्षेत्रों में झूठे या कमजोर केस बार-बार दर्ज हो रहे हैं और कहां जमानत तथा विचाराधीनता का असंतुलन सबसे अधिक है।
पारदर्शिता दुरुपयोग को सीमित कर सकती है, क्योंकि कानूनों का दुरुपयोग अक्सर अंधेरे में पनपता है। डाटा-आधारित निगरानी और जवाबदेही से प्रणालीगत दोषों की पहचान पहले ही संभव होती है।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के विधि संकाय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)
-1792003354748_v.webp)
-1792003162214_v.webp)




-1791829843742_v.webp)




