यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय से यह स्पष्ट कर दिया कि यदि अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग का कोई व्यक्ति मतांतरण कर लेता है तो फिर वह आरक्षण का लाभ पाने का अधिकारी नहीं रहेगा। हालांकि ऐसा ही निर्णय मद्रास उच्च न्यायालय ने भी दिया था, लेकिन तमिलनाडु सरकार ने उसे शीर्ष न्यायालय में चुनौती दी थी, क्योंकि वह अपने उस नियम को बनाए रखना चाहती थी, जिसके तहत उसने यह सुविधा दी थी कि यदि एससी या ओबीसी समुदाय के लोग इस्लाम या ईसाई मत अपना लेते हैं तो भी आरक्षण के लाभ पाते रह सकते हैं। यह केवल सनातन परिवार के आरक्षित वर्गों के अधिकारों में कटौती करने वाला ही नहीं, बल्कि एक तरह से मतांतरण को बल देने वाला नियम था।

इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि एससी या ओबीसी वर्ग के अनेक हिंदू, सिख या बौद्ध अपना धर्म त्याग देते हैं और फिर यह मांग करने लगते हैं कि मतांतरण के बाद भी उन्हें आरक्षण का लाभ मिलते रहना चाहिए। ऐसी मांग का समर्थन कई मुस्लिम एवं ईसाई संगठन भी करते हैं। हालांकि ऐसा करके वे अपने इस दावे की पोल ही खोलते हैं कि उनके यहां न तो जाति है और न ही किसी तरह का जातिगत भेदभाव। ध्यान रहे इसी तरह के दावों के बहाने ही वे निर्धन एवं अशिक्षित हिंदुओं, सिखों आदि को मतांतरित होने का प्रलोभन देते हैं। कटु सच्चाई यह है कि एससी अथवा ओबीसी वर्ग के लोग मतांतरित होने के बाद भी अपने नए पंथ में जातिगत भेदभाव और वैमनस्य का शिकार होते हैं। इसी कारण दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों के संगठन बने हुए हैं।

निःसंदेह समस्या केवल इतनी ही नहीं थी कि तमिलनाडु सरकार ने जैसा नियम बना रखा था, उससे मतांतरण कराने वालों को प्रोत्साहन मिल रहा था और एससी एवं ओबीसी के अधिकारों में सेंधमारी भी हो रही थी, बल्कि यह भी थी कि हिंदू धर्म त्यागने वाले एससी या ओबीसी आरक्षण के साथ ही अल्पसंख्यकों को मिलने वाले लाभ भी पाने लगते थे। इस दोहरे लाभ का आकर्षण भी छल-छद्म और लोभ-लालच से मतांतरण कराने वालों के पक्ष में काम करता था और इसका सबसे अधिक नुकसान हिंदू समाज उठाता था, क्योंकि सिखों और बौद्धों को तो अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त है।यह कोई छिपी बात नहीं कि हिंदू समाज खास तौर पर कपट और लालच से मतांतरण अभियानों में लिप्त ईसाई और मुस्लिम संगठनों के निशाने पर है। भले ही एक के बाद एक राज्य सरकारें छल-कपट से होने वाले मतांतरण को रोकने के कानून बना रही हों या उन्हें कठोर कर रही हों, लेकिन मतांतरण थम नहीं रहा है। इसका मूल कारण पंथ प्रचार की स्वतंत्रता का दुरुपयोग है। यह दुरुपयोग कैसे रुके, इस पर सरकार के साथ सुप्रीम कोर्ट को भी विचार करना चाहिए।