विचार: राष्ट्रीय हितों के आड़े न आए राजनीति
कई बार हम यह चर्चा विशेषज्ञों के जरिये सुनते हैं कि 1980 तक भारत और चीन लगभग बराबर ही थे, लेकिन हम ऐसी रणनीतिक परियोजनाओं को धरातल पर उतारने में पीछे रह गए।
HighLights
विझिंजम बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक समुद्री द्वार बना।
प्राकृतिक गहराई बड़े जहाजों को संभालने में सक्षम, कम लागत।
छोटे उद्योगों को वैश्विक व्यापार से जोड़कर अर्थव्यवस्था मजबूत।
हर्ष वर्धन त्रिपाठी। पिछले दिनों जब केरलम के विझिंजम बंदरगाह से निर्यात-आयात शुरू हुआ तो मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने इसे राज्य के लिए गर्व का क्षण बताते हुए कहा कि यह बंदरगाह दुनिया की ओर खुलने वाला द्वार है। खास बात यह है कि इस बंदरगाह का निर्माण अदाणी समूह ने किया है। यह भारत का गहरे समुद्र में बना ऐसा बंदरगाह है, जिसकी देश को वर्षों से रणनीतिक आवश्यकता थी। 1991 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करुणाकरन ने विझिंजम में एक डीप-सी बंदरगाह की परिकल्पना की थी। हालांकि कुछ रिकार्ड कहते हैं कि 1940 में त्रावणकोर के दीवान सीपी रामास्वामी अय्यर ने यह विचार सुझाया था और इसके आधार पर सर्वेक्षण भी हुआ था। परिकल्पना 1940 की मानें या 1991 की, इतना तो स्पष्ट है कि लंबे समय तक यह परियोजना कागजों में ही रही। जब इसके आकार लेने की बात आई तो प्रश्न उठा कि विझिंजम का डीप-सी पोर्ट बनाएगा कौन, क्योंकि 1995, 2004, 2008 और 2010 में चार प्रयासों के बाद भी कोई कंपनी इसे बनाने का ठेका नहीं ले सकी।
2014 में इसे नए सिरे से तैयार करने की योजना बनाई गई और 2015 में अदाणी समूह के साथ इसे बनाने का समझौता हुआ।
भारत में परियोजनाओं को धरातल पर लाने में अक्सर देरी होती ही है, लेकिन इस परियोजना में हुई देरी से देश को कितना नुकसान हुआ, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। भारत अभी तक अपने कंटेनर ट्रैफिक का 75 प्रतिशत कोलंबो, सिंगापुर और दुबई के बंदरगाहों के जरिये लाता और भेजता है। अब विझिंजम बंदरगाह से निर्यात-आयात शुरू होने से भारत के जहाजों की विदेशी बंदरगाहों के उपयोग पर निर्भरता कम होगी। गहरे समुद्र में बने विझिंजम बंदरगाह की गहराई स्वाभाविक तौर पर बिना खोदाई किए 20 मीटर की है। इसे आसानी से ऐसे समझा जा सकता है कि जहां विझिंजम बंदरगाह है, वहां समुद्र में लगभग 9-10 मंजिला इमारत पानी के भीतर समा जाएगी। प्राकृतिक रूप से इतनी गहराई पर होने से विझिंजम बंदरगाह में नियमित रखरखाव की लागत भी कम रहेगी। गहराई में होने के कारण विझिंजम बंदरगाह बहुत बड़े जहाजों को भी समायोजित-संचालित करने की क्षमता रखता है।
विश्व की बदलती रणनीतिक परिस्थितियों में आपूर्ति शृंखला बनाए रखने की चुनौती भारत जैसे विशाल देश के सामने बहुत बड़ी है। विश्व के सामने विझिंजम बंदरगाह भारत के मजबूत होते अंतरराष्ट्रीय समुद्री बुनियादी ढांचे का बड़ा प्रमाण है। विश्व के सर्वाधिक व्यस्ततम पूर्व-पश्चिम समुद्री मार्ग के निकट होने से विझिंजम बंदरगाह के जरिये भारत वैश्विक व्यापार के केंद्र में आ सकता है। इस बंदरगाह से निर्यात-आयात होने का सीधा लाभ देश के छोटे और मझोले उद्योगों को होगा। छोटे-मझोले उद्योगों के वैश्विक व्यापार में बने रहने के लिए सर्वाधिक आवश्यक होता है कि कम लागत में समय से उनका सामान पहुंचाया और मंगाया जा सके। विझिंजम बंदरगाह छोटे-मझोले उद्योगों के लिए यह करने जा रहा है। भारत के समुद्री उत्पादों, इंजीनियरिंग उत्पादों, काजू, मसाले, कपड़े को वैश्विक बाजार में पहुंचने में आसानी होगी। निर्यात के साथ हमारे देश की आयातक कंपनियों को भी इससे लाभ होगा। अंतरराष्ट्रीय कारोबार के साथ ही केरल के अलावा तमिलनाडु और कर्नाटक के उद्योगों को भी अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग से सीधे जुड़ने का लाभ होगा। बंदरगाह पर बड़े मालवाहक जहाजों की आवाजाही से इससे जुड़े ढेरों व्यापार बंदरगाह के आसपास विकसित होंगे।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में यह बंदरगाह बड़ी भूमिका निभाएगा, लेकिन यह याद रहे कि भारत की स्वतंत्रता के पूर्व जिस गहरे समुद्री बंदरगाह की परिकल्पना की गई थी और उसका सर्वेक्षण भी हो गया था, उस पर काम 2015 में जाकर शुरू हो पाया और 2024 में जाकर पहला चरण पूरा हो पाया और उस दौरान भी राहुल गांधी अदाणी पर हमला जारी रखे हुए थे। जबकि जिस दौरान केरलम में यह बंदरगाह बन रहा था, तब राज्य में वामपंथी और कांग्रेसी सरकारें ही रहीं। विझिंजम बंदरगाह से निर्यात-आयात शुरू होते समय कांग्रेस की सरकार है और केरलम के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन का यह कहना कि अब सबसे बड़ी चुनौती इस अवसर का अधिकतम लाभ उठाकर भारत और केरलम से दुनिया को जोड़ने और अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढ़ाने की है, बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है और एक सबक भी दे जाता है कि राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में देरी और उस पर दलगत राजनीति से देश का नुकसान होता है और सभी दलों को इससे बचना चाहिए।
भारत विश्व समीकरणों में जिस तरह से अपनी स्थिति बेहतर कर रहा है, उसमें विझिंजम बंदरगाह जैसे बुनियादी ढांचे का विशेष महत्व हो जाता है। कई बार हम यह चर्चा विशेषज्ञों के जरिये सुनते हैं कि 1980 तक भारत और चीन लगभग बराबर ही थे, लेकिन हम ऐसी रणनीतिक परियोजनाओं को धरातल पर उतारने में पीछे रह गए। दलगत राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, पर्यावरण के नाम पर पैदा की जाने वाली बाधाओं और विशेषज्ञता वाली बड़ी कंपनियों के न होने से हम पिछड़ते चले गए। अब हम चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करके भारत और उसके बीच का अंतर कम कर सकते हैं, लेकिन तभी जब आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य में राजनीतिक बाधा न आए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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