दिव्य कुमार सोती। वैसे तो रूस-यूक्रेन युद्ध और इजरायल-अमेरिका-ईरान युद्ध अलग-अलग क्षेत्रों, अलग-अलग कारणों और अलग-अलग समय पर प्रारंभ हुए, परंतु जैसे-जैसे ये लंबे खिंचते जा रहे, एक-दूसरे से जुड़ते जा रहे हैं। अब ये एक ही भू-राजनीतिक शतरंज की बिसात का हिस्सा नजर आने लगे हैं। अनाधिकारिक रूप से ये युद्ध एक दूसरे से जुड़ चुके हैं। इन्हें अब क्षेत्रीय युद्ध या संघर्ष भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इन युद्धों से उत्तरी रूस से कैस्पियन सागर और फारस की खाड़ी से लेकर ओमान की खाड़ी तक प्रभावित हो चुके हैं।

रूस और ईरान ने मिलकर अमेरिका के विरुद्ध सीधे युद्ध की घोषणा भले ही न की हो, परंतु यह युद्ध दोनों आपसी सहयोग से ही लड़ रहे हैं। फरवरी 2026 में ईरान पर इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हमले से पहले तक ईरान सस्ते, परंतु घातक ड्रोनों की बड़े पैमाने पर रूस को आपूर्ति कर रहा था। अमेरिका से युद्ध छिड़ने पर अपनी जरूरतों के चलते हुए वह ऐसा करने में असमर्थ हो गया तो रूस ने ईरान को घातक ग्रान ड्रोनों की आपूर्ति प्रारंभ कर दी। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने यूक्रेन में जो वायु प्रतिरक्षा प्रणालियां तैनात की थीं, उनसे जूझने के लंबे अनुभव के आधार पर रूस ने इन ड्रोनों को अधिक उन्नत बनाया था, ताकि वे पश्चिमी रक्षा प्रणालियों को भेद सकें और उसका असर पिछले कई महीनों से ईरान-अमेरिका युद्ध में स्पष्ट नजर आ रहा है।

अमेरिकी तथा इजरायली वायु प्रतिरक्षा प्रणालियां ईरानी ड्रोन हमलों को नाकाम नहीं कर पा रहीं, जिससे युद्ध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। ईरान और रूस का समन्वय सिर्फ जमीनी युद्ध क्षेत्र तक ही सीमित नहीं। पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के आकलन के अनुसार अंतरिक्ष में गश्त कर रहे कम से कम 14 रूसी सैटेलाइट ईरान से वास्तविक काल की भू-स्थानिक, रडार और सिग्नल इंटेलिजेंस से जुड़ी खुफिया जानकारियां लगातार साझा कर रही हैं, जिसके चलते ईरानी फौज लगातार खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने में सफल रही है। इससे अमेरिकी सेनाओं को अच्छा-खासा नुकसान उठाना पड़ा है।

रूस ने ऐसा इसलिए किया है, ताकि अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा रूस के अति महत्वपूर्ण ठिकानों पर यूक्रेन के जरिये कराए गए हमलों का बदला ले सके। साथ ही अमेरिका के हथियार भंडार को इतना कम किया जा सके कि वह यूक्रेन को अधिक सहायता न पहुंचा पाए। इसका असर दिखाई भी देने लगा है। रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका-ईरान संघर्ष के एक साथ चलने की वजह से अमेरिकी सेना के पास रक्षा साजोसामान की भारी किल्लत हो गई है। पेंटागन ने चेतावनी दी है कि अगर इस समय कोई और बड़ा वैश्विक युद्ध छिड़ गया, तो अमेरिका के पास हथियारों का स्टाक पूरी तरह खत्म होने का खतरा है। ईरान और उसके समर्थित गुटों के ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइल हमलों को रोकने के लिए अमेरिकी सेना को अपनी इन सबसे आधुनिक मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ा है, जिसके चलते अमेरिका ने अपने एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम के लगभग 80 प्रतिशत स्टाक का इस्तेमाल कर लिया है। अमेरिका के आधुनिक पैट्रियट मिसाइल इंटरसेप्टर्स का 50 प्रतिशत से 60 प्रतिशत स्टाक खत्म हो चुका है।

अमेरिका के लिए पश्चिम एशिया में वही स्थिति उत्पन्न हो गई है, जो उसने रूस के लिए यूक्रेन में उत्पन्न की थी। इस संकट के पीछे कम लागत वाले आधुनिक हाइब्रिड युद्ध का गणित है। रूस और ईरान बहुत कम लागत में हर महीने हजारों की तादाद में आत्मघाती ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलें बना रहे हैं। इसके विपरीत इन्हें विफल करने के लिए अमेरिका के पैट्रियट जैसे रक्षा सिस्टम को बनाने में बहुत जटिल तकनीक और एडवांस गाइडेंस सिस्टम की जरूरत होती है।

अमेरिकी कंपनियां इन मिसाइलों को उतनी तेजी से नहीं बना पा रही हैं, जितनी तेजी से ये युद्ध के मैदान में खर्च हो रही हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के अनुसार पश्चिम एशिया में मिसाइलें भेजने की वजह से यूक्रेन को पहले के मुकाबले सिर्फ एक-तिहाई एयर-डिफेंस मिसाइलें मिल पा रही हैं। इसका प्रभाव अब चीन के मोर्चे पर भी दिखाई देने लगा है, जहां अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को हथियारों की आपूर्ति में पांच साल तक की देरी होने की चेतावनी दी है। जापान को मिलने वाली टोमाहाक मिसाइलों में दो साल की देरी हो चुकी है। ताइवान भेजी जाने वाली 14 अरब डालर की हथियारों की खेप को बीच में ही रोकना पड़ा है, ताकि अमेरिकी सेना अपने खुद के स्टाक को बचा सके।

जहां ईरान पहले से ही होर्मुज जलमार्ग को बंद करके अपनी ताकत दिखा चुका है, वहीं अब उसके समर्थक यमन के हूतियों के जरिये बाब अल-मंडेब पर कब्जा करके उसने दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों पर अपना शिकंजा कस लिया है। सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिका से हूतियों पर हमले की अपील की थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने ईरान के साथ चल रहे युद्ध और यूक्रेन में खुले मोर्चे के चलते हथियारों की किल्लत के कारण यमन में नया मोर्चा खोलने से मना कर दिया। अमेरिका के पास इतने उन्नत हथियार और प्रतिरक्षा प्रणालियां नहीं बची हैं कि वह एक साथ ईरान से लड़े, यूक्रेन की मदद करे और यमन में भी एक नया मोर्चा संभाल सके।

वैसे तो रूस सीधे तौर पर यमन में हुई इस उथल-पुथल में शामिल नहीं, परंतु उसके चलते मास्को को बड़ा फायदा हो रहा है, क्योंकि लाल सागर का रास्ता असुरक्षित होने से कच्चे तेल की कीमतें 106 डालर प्रति बैरल के पार चली गई हैं। इससे आर्थिक प्रतिबंधों से जूझ रहे रूस के तेल निर्यात की वैल्यू बहुत बढ़ गई है। इसका सीधा आर्थिक नुकसान पश्चिमी देशों को झेलना पड़ रहा है, जहां ईंधन के दाम बढ़ रहे हैं। इस तरह यह युद्ध न सिर्फ अमेरिकी सैन्य शक्ति की सीमाएं जगजाहिर कर रहा है, बल्कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध तथा सोवियत संघ के विघटन के बाद बनी विश्व व्यवस्था को भी विघटित करता प्रतीत हो रहा है।

(लेखक काउंसिल आफ स्ट्रैटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं)