विचार: अराजकता के सहारे सत्ता परिवर्तन वाली हरकतें
संजय गुप्त। नीट पेपर लीक को लेकर दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन कर चर्चा में आई काकरोच जनता पार्टी ने जब संसद मार्च का आयोजन किया था, तब उसमें कैसी हिंसा हुई थी, यह किसी से छिपा नहीं।
HighLights
CJP और कांग्रेस पर अराजक सत्ता परिवर्तन का आरोप।
प्रशांत भूषण, नेहा बोरा के बयान बांग्लादेश से प्रेरित।
राहुल गांधी की सुप्रीम कोर्ट मार्च पर आपत्ति।
संजय गुप्त। नीट पेपर लीक को लेकर दिल्ली में जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन कर चर्चा में आई काकरोच जनता पार्टी ने जब संसद मार्च का आयोजन किया था, तब उसमें कैसी हिंसा हुई थी, यह किसी से छिपा नहीं। इस हिंसा से यह आशंका पैदा हुई थी कि सीजेपी समर्थक देश में बांग्लादेश और नेपाल जैसे हालात पैदा कर सत्ता परिवर्तन चाह रहे हैं।
अब इस आशंका की पुष्टि होती दिख रही है। इसी कारण रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस को घेरा। बीते दिनों एसआईआर के मुद्दे पर कांग्रेस की ओर से आयोजित धरना-प्रदर्शन में शामिल वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि हां, हम सत्ता परिवर्तन के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं और ऐसा करके रहेंगे। नीट पेपर लीक के विरोध में सीजेपी के धरने में सक्रिय रहीं नेहा बोरा ने भी कांग्रेस के प्रदर्शन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया।
राहुल गांधी ने उन्हें आगे भी किया, जबकि वे सीजेपी की सहयोगी हैं और वामपंथी छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन यानी आइसा की अध्यक्ष हैं। नेहा बोरा ने भी साफ कहा कि बांग्लादेश के छात्र आंदोलन ने उन्हें क्रांति का रास्ता दिखाया और वे उस आंदोलन से प्रेरणा लेती हैं। क्या इससे अधिक बेतुकी बात और कोई हो सकती है?
कांग्रेस के साथ खड़े प्रशांत भूषण, नेहा बोरा के बयानों और सीजेपी नेताओं के अराजक रवैये से यह आशंका बलवती होती है कि देश में अस्थिरता पैदाकर सत्ता परिवर्तन की कोशिश की जा रही है। यह खतरनाक है कि खून-खराबे वाली क्रांति तक की बातें की जा रही हैं और बांग्लादेश के हिंसक आंदोलन को प्रेरक बताया जा रहा है। बांग्लादेश आंदोलन में कट्टरपंथी मजहबी और अराजकतावादी ताकतें भी शामिल थीं।
इसी कारण वहां ऐसे हालात बने कि प्रधानमंत्री शेख हसीना को जान बचाने के लिए भागकर भारत आना पड़ा। इसके बाद वहां उनके समर्थकों के साथ ही हिंदुओं की बड़े पैमाने पर हत्याएं हुईं। बांग्लादेश में हिंसा के बल पर जो सत्ता परिवर्तन हुआ और जिसके नतीजे में अंतरिम सरकार बनी, उसने इस देश को और अधिक अराजकता की आग में ही झोंका।
बांग्लादेश में वास्तविक सत्ता परिवर्तन चुनाव के बाद ही हुआ। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन चुनावों से ही होता है, लेकिन राहुल गांधी के करीबी प्रशांत भूषण और नेहा बोरा अराजकता के सहारे सत्ता परिवर्तन की बातें कर रहे हैं। निःसंदेह हमारा संविधान विरोध प्रदर्शन का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं। संविधान शांतिपूर्ण विरोध पर बल देता है, लेकिन इसकी अनदेखी करके अराजक तौर-तरीकों की पैरवी की जा रही है।
अराजकता के सहारे सत्ता परिवर्तन की बातें करना संविधान का खुला निरादर ही है। लोकतंत्र और संविधान का ऐसा अनादर आपातकाल के समय हुआ था, जिसे इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए थोपा था। यह विडंबना ही है कि आपातकाल के काले अध्याय से परिचित राहुल गांधी अराजक तरीके से सत्ता परिवर्तन चाहने वालों का साथ ले रहे हैं।
पहले वे सीजेपी से दूरी बनाए थे, लेकिन अब उसका भी साथ लेने को तैयार हैं। देश की आजादी में मुख्य भूमिका निभाने वाली कांग्रेस ने जैसा रवैया अपना लिया है, उससे यह कहना कठिन है कि यह महात्मा गांधी के मूल्यों वाली कांग्रेस है।
यदि आज की कांग्रेस गांधीवादी मूल्यों का सम्मान कर रही होती तो राहुल गांधी याचिका दायर करने के बहाने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करते हुए नहीं जाते। इस मार्च के पहले उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से मिलने की कोशिश भी की, जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली, क्योंकि वे एक अनुचित परंपरा स्थापित करना चाह रहे थे। यह पहली बार देखने को मिला कि कोई नेता लोगों की भीड़ के साथ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने गया हो।
यह सुप्रीम कोर्ट को धमकाने की कोशिश वाली इतनी आपत्तिजनक हरकत थी कि सुप्रीम कोर्ट को यह कहना पड़ा कि ऐसे आचरण से कोई उसे धमका नहीं सकता। ध्यान रहे बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन पर आमादा हिंसक आंदोलनकारियों की अराजकता के चलते वहां के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद छोड़ने को बाध्य हुए थे। तथ्य यह भी है कि केरलम कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को पद छोड़ने की चेतावनी दी।
आखिर यह क्यों न माना जाए कि एक के बाद एक संवैधानिक संस्थाओं को लांछित करने और उनकी साख से खिलवाड़ करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट को भी आक्रामक तरीके से दबाव में लेने की राहुल गांधी और उनके साथियों की कोशिश सत्ता परिवर्तन वाला माहौल बनाने का उपक्रम है?
राहुल गांधी अपनी याचिका को लेकर कितने गंभीर थे, इसका पता इससे चलता है कि उसमें 14 गलतियां थीं। यह भी विचित्र है कि राहुल गांधी एक ओर धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहे हैं और दूसरी ओर उनसे अपनी कथित गलतियों को स्वीकार कर सरकारी गवाह बनने को कह रहे हैं। यह अराजक व्यवहार ही है। उनकी समझ से एसआईआर के तहत मृतकों, स्थानांतरित हो गए या दो जगह दर्ज जो नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए, वह वोट चोरी है।
वे एक ओर एसआईआर के विभिन्न पहलुओं की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा जता रहे हैं और दूसरी ओर एसआईआर को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सड़कों पर भी उतरकर अव्यवस्था पैदा कर रहे हैं। यह सब तो सुप्रीम कोर्ट पर भरोसा करने का दिखावा ही जान पड़ता है।
इसकी भी अनदेखी न की जाए कि जिन अमेरिकी अरबपति जार्ज सोरोस पर कई देशों में सत्ता परिवर्तन कराने वाली ताकतों का साथ देने के आरोप हैं और जो प्रधानमंत्री मोदी को नापसंद करते हैं एवं उनके विरोधियों की आर्थिक मदद करते हैं, उनकी पक्षधरता ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख सैम पित्रोदा कर रहे हैं।
इस सबसे यही लगता है कि कुछ विदेशी ताकतें भी भारत को अस्थिर करना चाह रही हैं और यहां राजनीतिक एवं गैर-राजनीतिक लोग उनका साथ दे रहे हैं। इसी कारण यह संदेह उपजा है कि सीजेपी ऐसी ही ताकतों की कठपुतली है। सच जो भी हो, यह ठीक नहीं कि अराजक तरीकों को लोकतांत्रिक बताकर भारतीय लोकतंत्र को कमजोर करने की ही नहीं, सत्ता परिवर्तन की भी कोशिश होती दिख रही है।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)






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