जागरण संपादकीय: सर्वोपरि हो जनहित
बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह सही कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन मौलिक अधिकार है। वैसे तो सभी प्रदर्शनकारी अपने धरना-प्रदर्शन को शांतिपूर्ण बताते हैं, लेकिन प्रायः वे ऐसे तौर-तरीके अपनाते हैं, जिनसे जनता परेशान हो।
HighLights
बॉम्बे हाई कोर्ट ने प्रदर्शनकारियों की पृष्ठभूमि जांचने को कहा।
प्रदर्शनों से आम जनता को परेशानी नहीं होनी चाहिए।
न्यायपालिका प्रदर्शनों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल बनाए।
विजयदशमी की पूर्व संध्या पर बॉम्बे उच्च न्यायालय की ओर से की गई यह टिप्पणी जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही अमल में लाने लायक भी कि प्रदर्शनकारियों की पृष्ठभूमि जांची जाए और साथ ही इसका ध्यान भी रखा जाए कि किसी प्रदर्शन से आम जनता को परेशानी न हो। उसने यह टिप्पणी इसलिए की, क्योंकि कुछ याचिकाओं में यह शिकायत की गई थी कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के प्रति अनावश्यक कठोरता दिखाई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनकी मांग पर जिस तरह पुलिस को सख्ती न बरतने के निर्देश देने से इनकार किया, उससे यही पता चलता है कि मुंबई में हुआ प्रदर्शन शांतिपूर्ण नहीं था और उससे लोगों को परेशानी भी उठानी पड़ी।
हाई कोर्ट ने यह सही कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन मौलिक अधिकार है। वैसे तो सभी प्रदर्शनकारी अपने धरना-प्रदर्शन को शांतिपूर्ण बताते हैं, लेकिन प्रायः वे ऐसे तौर-तरीके अपनाते हैं, जिनसे जनता परेशान हो। इसके लिए वे ट्रैफिक जाम करते हैं और पुलिस से धक्का-मुक्की करते हैं। सीजेपी ऐसे ही तौर-तरीकों का परिचय दे रही है और इसी कारण दिल्ली में उसके संसद मार्च में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। इसमें प्रदर्शनकारियों के साथ बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे।
इसकी अनदेखी न की जाए कि सीजेपी समर्थक हर हाल में अपनी मांगें माने जाने की जिद पकड़ते हैं और अब तो उनके समर्थक खुले आम रिजीम चेंज की भी बात कर रहे हैं। रिजीम चेंज का मतलब चुनाव के जरिये सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि अव्यवस्था और अराजकता के सहारे तख्तापलट करना होता है। विडंबना यह है कि कांग्रेस रिजीम चेंज की बातें करने वालों के साथ खड़ी होने में संकोच नहीं कर रही है। तथ्य यह भी है कि उसने भी इस तरीके से प्रदर्शन किए हैं कि लोगों को परेशानी उठानी पड़ी। इसमें संदेह है कि बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणियों को वे प्रदर्शनकारी गंभीरता से लेंगे, जो जनता को तंग करने वाले तरीके अपनाते हैं। ऐसे में न्यायपालिका को केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन की जरूरत ही नहीं जतानी चाहिए, बल्कि ऐसे निर्देश भी जारी करने चाहिए, जिससे पुलिस अराजकता का परिचय देने वालों के खिलाफ सख्ती कर सके और जो आम लोगों को परेशानी से बचा सकें।
उचित यह होगा कि न्यायपालिका प्राथमिकता के आधार पर यह सुनिश्चित करे कि धरना-प्रदर्शन का कोई स्पष्ट प्रोटोकाल बने, क्योंकि शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बहाने जनजीवन को बाधित करने और माहौल बिगाड़ने वाली गैर-कानूनी हरकतें बढ़ रही हैं। यह समय की मांग है कि न्यायपालिका शांतिपूर्ण आंदोलन के अधिकारों की रक्षा के साथ ही उनके दुरुपयोग के कारण आम जन को होने वाली परेशानियों से बचाने के लिए भी आगे आए, क्योंकि प्रायः जनहित की अनदेखी ही होती है।











