डॉ. मोहन भागवत सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। मेरे विचार से भारत को विश्वगुरु बनाने का मार्ग सामाजिक एकता, सद्भाव, स्वबोध और नागरिक अनुशासन से होकर गुजरता है। भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधताओं में निहित एकता और समावेशी जीवनदृष्टि में है। हमारी भाषा, जाति, प्रांत, पूजा-पद्धति, खानपान और रीति-रिवाज अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हम सब एक ही राष्ट्र के अंग हैं। हमें इन विविधताओं का सम्मान करते हुए परस्पर आत्मीयता और विश्वास को मजबूत करना होगा। केवल विचार व्यक्त करने से परिवर्तन नहीं आएगा। हमें अपने आचरण में भी एकता, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति समर्पण को उतारना होगा।

भारत की सनातन परंपरा हमें संपूर्ण सृष्टि में एकात्मता का बोध कराती है। हमारी संस्कृति ने सदैव विविधताओं को स्वीकार करने और समय के अनुरूप आवश्यक परिवर्तन अपनाने की प्रेरणा दी है। जब हमने इस दृष्टि को अपने जीवन में बनाए रखा, तब भारत ने दुनिया का मार्गदर्शन किया। लेकिन आत्मविस्मृति, आपसी संपर्क की कमी और संकीर्णता के कारण समाज में दूरियां बढ़ीं। अब हमें अपनी मूल पहचान को समझते हुए संगठित होना और सामूहिक हित के लिए काम करना है। संघ के शताब्दी वर्ष में हमने समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचने और भारत, हिंदुत्व तथा संघ के बारे में संवाद बढ़ाने का प्रयास किया है। संपर्क अभियान के अंतर्गत 4,61,527 गांवों और 41,076 नगरीय बस्तियों में 10 करोड़ से अधिक घरों तक संपर्क किया गया।

देश के 1,117 जिलों में आयोजित प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठियों में 4,26,497 महिला-पुरुष शामिल हुए। इसके अतिरिक्त 5,036 खंडों में सद्भावना बैठकें, 34,187 मंडलों में हिंदू सम्मेलन और युवा सम्मेलन आयोजित किए गए, जिनमें लगभग 39 लाख युवाओं की भागीदारी रही। हमारा उद्देश्य केवल अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाना नहीं, बल्कि समाज के साथ संवाद स्थापित करना भी है। विदेशों में भी भारत और संघ के विषय में संवाद किया गया। आज दुनिया भौतिक समृद्धि के बावजूद पर्यावरण संकट, पारिवारिक जीवन में बदलाव और सामाजिक विविधताओं के बीच संतुलन बनाने जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में भारत की समग्र जीवनदृष्टि उपयोगी साबित हो सकती है। इस संवाद को हमें आगे भी जारी रखना चाहिए।

मैं मानता हूं कि समाज में स्थायी परिवर्तन के लिए हमें पांच विषयों पर विशेष ध्यान देना होगा। ये हैं-सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वबोध एवं स्वदेशी और नागरिक अनुशासन। इन्हें हम पंच परिवर्तन कहते हैं। इन विषयों को किसी एक अभियान या वर्ष तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। सामाजिक समरसता का अर्थ है कि हम जाति, भाषा, क्षेत्र और अन्य भिन्नताओं के आधार पर किसी से भेदभाव न करें। कुटुंब प्रबोधन के माध्यम से परिवार में संवाद, संस्कार और आपसी विश्वास मजबूत हों। पर्यावरण संरक्षण के लिए हमें प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभानी होगी। स्वबोध का अर्थ अपनी संस्कृति, इतिहास और राष्ट्रीय पहचान को समझना है। स्वदेशी के माध्यम से हम अपनी आवश्यकताओं और क्षमताओं के अनुरूप देश में निर्मित वस्तुओं तथा स्थानीय कौशल को प्रोत्साहन दे सकते हैं। नागरिक अनुशासन का अर्थ है कि हम अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी पालन करें।

आज बच्चों और युवाओं के सामने नई चुनौतियां हैं। परिवार, विद्यालय और सामाजिक वातावरण से मिलने वाले संस्कारों की भूमिका कमजोर नहीं पड़नी चाहिए। इंटरनेट और इंटरनेट मीडिया ने ज्ञान के अनेक रास्ते खोले हैं, लेकिन इनके माध्यम से अनुचित सामग्री भी आसानी से उपलब्ध हो रही है। विशेषकर ओटीटी मंचों पर उपलब्ध सामग्री को लेकर समाज में चिंता है। हमें इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और शासन-प्रशासन को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। नशे की बढ़ती प्रवृत्ति भी एक गंभीर सामाजिक समस्या है। इससे निपटने के लिए सरकार, प्रशासन, परिवार और समाज को मिलकर प्रयास करना होगा। माता-पिता बच्चों में सही और गलत का विवेक विकसित करें तथा युवा स्वयं भी नशे से दूर रहने का संकल्प लें। संघ के स्वयंसेवक इस दिशा में देशव्यापी सामाजिक प्रयास खड़ा करने में सहयोग करेंगे। हमारा उद्देश्य युवाओं को भयभीत करना नहीं, बल्कि उन्हें जागरूक, आत्मविश्वासी और जिम्मेदार बनाना है।

मैं विज्ञान और तकनीक की प्रगति का स्वागत करता हूं। विज्ञान का उपयोग मानव जीवन को बेहतर बनाने और समाज को अधिक तार्किक बनाने के लिए होना चाहिए। लेकिन तकनीक अपने आप में हमारा अंतिम लक्ष्य नहीं है। वह मानव कल्याण का साधन है। केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और उपभोग पर आधारित विकास अंततः प्रकृति तथा समाज के लिए नुकसानदायक हो सकता है। हिमालयी क्षेत्रों में सामने आने वाली विनाशकारी घटनाएं हमें विकास के स्वरूप पर विचार करने की प्रेरणा देती हैं। विकास ऐसा होना चाहिए, जिसमें प्रकृति, पर्यावरण और मानवीय आवश्यकताओं के बीच संतुलन बना रहे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकें अनेक अवसर प्रदान करती हैं, लेकिन विवेक और नैतिकता के अभाव में उनका दुरुपयोग भी हो सकता है। भारत अपनी सांस्कृतिक दृष्टि के आधार पर ऐसा विकास माडल प्रस्तुत कर सकता है, जिसमें विज्ञान, समन्वय, संयम और मानव कल्याण साथ-साथ चलें।

मेरे लिए हिंदू भाव किसी एक पूजा-पद्धति, भाषा, जाति, प्रांत या राजनीतिक विचारधारा तक सीमित नहीं है। इसका मूल आध्यात्मिकता, मानवता और विश्व बंधुत्व में है। भारतीयता हमें ज्ञान के प्रकाश में जीवन विकसित करने और संपूर्ण विश्व को अपना मानने की प्रेरणा देती है। भारत के नागरिकों के बीच संबंध स्वाभाविक और आत्मीय होने चाहिए। मातृभूमि के प्रति भक्ति, साझा पूर्वज परंपरा का गौरव और भारतीय संस्कृति के मानवीय मूल्यों के अनुरूप जीवन हमें एक सूत्र में बांधते हैं। संघ इसी भाव को जागृत कर समाज को संगठित और सामर्थ्यवान बनाने का प्रयास करता है। मेरा विश्वास है कि संगठित समाज ही राष्ट्र की सुरक्षा, प्रतिष्ठा और प्रगति में प्रभावी भूमिका निभा सकता है। समाज को संगठित करने का हमारा प्रयास सभी पंथों के सम्मान और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाला होना चाहिए।

भारत जैसे विविधताओं वाले देश में हमें परस्पर व्यवहार में सद्भाव और अपनापन बनाए रखना होगा। इतिहास की घटनाओं को स्वीकार करते हुए ऐसी परिस्थितियां बनानी चाहिए, जिनसे पुरानी गांठें खुलें और नई गांठें न पड़ें। हमें उन तत्वों से सावधान रहना होगा, जो छोटी-छोटी बातों पर समाज को उकसाकर विवाद पैदा करते हैं। राजनीतिक दलों, सामाजिक समूहों और शासन-प्रशासन के बीच व्यवहार की मर्यादा बनी रहनी चाहिए। आंदोलनों का उद्देश्य समस्याओं का समाधान होना चाहिए, न कि द्वेष और विभाजन बढ़ाना। विरोध करने वालों और कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाले प्रशासन, दोनों को संविधान और कानून की सीमाओं का पालन करना चाहिए। राजनीतिक लाभ और सस्ती लोकप्रियता के लिए सामाजिक सद्भाव से समझौता नहीं होना चाहिए। मेरा मानना है कि हर समस्या का समाधान केवल सरकार या आंदोलन से नहीं निकल सकता। समाज की सहभागिता और सामूहिक प्रयास भी महत्वपूर्ण हैं।

मेरे विचार से भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक रूप से समृद्ध बनना नहीं, बल्कि दुनिया को सुख, शांति और मानव कल्याण की दिशा दिखाना भी है। इसके लिए हमें अपनी राष्ट्रीय पहचान को समझना होगा और उसे जीवन में उतारना होगा। विश्व की अच्छी बातों से सीखते हुए अपनी सांस्कृतिक विशेषताओं को भी सुदृढ़ रखना होगा। भारत का परम वैभव और विश्वगुरु बनने का लक्ष्य किसी शार्टकट से पूरा नहीं होगा। इसके लिए प्रत्येक नागरिक को अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने होंगे। हमें समाज की एकता, सुरक्षा, न्याय और प्रगति के लिए अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। संघ के शताब्दी वर्ष के बाद हमारा लक्ष्य ऐसी संगठित, अनुशासित और पुरुषार्थी सामाजिक शक्ति का निर्माण करना है, जो राष्ट्र के हित में कार्य करे। मुझे विश्वास है कि आत्मीयता, समर्पण और सामूहिक पुरुषार्थ के बल पर भारत विश्व के सामने समग्र विकास और मानव कल्याण का नया प्रतिमान प्रस्तुत कर सकता है।