विचार: तिरंगे की आड़ में अराजक व्यवहार
अदालतों को आंदोलनकारियों के अधिकारों के साथ ही आम जन के अधिकारों की भी चिंता करनी होगी।
HighLights
विरोध प्रदर्शनों में तिरंगे का अराजकता फैलाने हेतु दुरुपयोग।
शाहीन बाग, किसान आंदोलन में तिरंगे की आड़ में अव्यवस्था।
अदालतें आम लोगों की परेशानी पर भी ध्यान दें।
राजीव सचान। वर्ष 2004 से पहले आम लोगों को अपने घरों या कार्यालयों पर तिरंगा फहराने का अधिकार नहीं था। वे ऐसा केवल स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ही कर सकते थे। हर कोई सभी दिन अपने घरों, कार्यालयों और वाहनों पर तिरंगे का उपयोग कर सके, इसके लिए उद्योगपति नवीन जिंदल ने लंबी लड़ाई लड़ी। जनवरी 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया कि लोग कभी भी सम्मान और गरिमा के साथ अपने घर, दुकान, दफ्तर पर तिरंगा फहराने के लिए स्वतंत्र हैं। इसके बाद राजनीतिक एवं गैर-राजनीतिक संगठन और आम लोग तिरंगे का उपयोग करने लगे।
पहली बार अन्ना आंदोलन के समय बड़े पैमाने पर तिंरगे का उपयोग हुआ। धीरे-धीरे कुछ लोग तिरंगे की आड़ लेकर मनमानी और यहां तक कि लोगों को तंग करने का काम भी करने लगे। नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग में एक सड़क घेरकर जो लंबा धरना चला, उसमें भी तिरंगा लहराया गया था। जेएनयू में छात्र नेता रहा शरजील इमाम उसी दौरान जब इस कानून के विरोध में आग उगल रहा था और यहां तक कि चिकन नेक यानी सिलिगुड़ी कारिडोर को पूर्वोत्तर से शेष भारत को अलग करने की जरूरत जता रहा था, तब उसके मंच पर भी तिरंगा लहरा रहा था।
कृषि कानूनों के विरोध में करीब 13 महीने तक एक तरह से दिल्ली घेरकर बैठे संगठनों ने भी तिरंगे का इस्तेमाल किया। तब उनके धरने के कारण हर दिन लाखों लोग परेशान हो रहे थे। इन संगठनों ने गणतंत्र दिवस पर जो ट्रैक्टर रैली निकाली, वह बिल्कुल भी शांतिपूर्ण नहीं थी। प्रदर्शनकारियों ने लाल किले पर धावा बोलकर वहां जमकर उत्पात मचाया, जबकि उन्होंने वादा किया था कि प्रत्येक ट्रैक्टर पर तिरंगा लगाया जाएगा और देशभक्ति के गीत बजाए जाएंगे। इसके विपरीत तिरंगे की आड़ में अराजकता फैलाई गई। इस घटना में बड़ी संख्या में पुलिस वाले भी पीटे गए। तिरंगे की आड़ में अराजक हरकतें बढ़ती ही जा रही हैं। अभी जब दिल्ली में जंतर-मंतर को धरना-प्रदर्शन वाले स्थलों की सूची से बाहर किया गया तो काकरोच जनता पार्टी के समर्थकों ने कनाट प्लेस पर तिरंगा फहराने की जिद पकड़ी।
'लहरा दो तिरंगा' कार्यक्रम का आयोजन सीजेपी नेताओं आशुतोष रांका और सौरव दास को जंतर-मंतर पर जबरन तिरंगा फहराने से जुड़े मामले में न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के विरोध में किया गया। ऐसा नहीं है कि दिल्ली पुलिस कनाट प्लेस में किसी को तिरंगा नहीं फहराने देना चाहती थी। उसने सीजेपी नेता अभिजीत दीपके से कहा था कि वे 11 लोगों के साथ वहां तिरंगा फहरा सकते हैं, पर उनका तो इरादा तिरंगे के बहाने शक्ति प्रदर्शन करने का था। वे अच्छे से जानते थे कि त्योहार के कारण कनाट प्लेस में खरीदारों की भारी भीड़ उमड़ती है और वहां किसी तरह के प्रदर्शन से उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा, लेकिन सीजेपी को न तो व्यापारियों के नुकसान की कोई परवाह थी और न ही आम लोगों को होने वाले परेशानी की।
शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन करने अथवा अपनी मांगें मनवाने के बहाने तिरंगे का जो अनुचित उपयोग होने लगा है, उसे रोके जाने की जरूरत है, क्योंकि देशभक्ति के परिचायक तिरंगे की आड़ में कई बार अव्यवस्था और अराजकता उत्पन्न की जाती है। अब इसका भरोसा नहीं कि तिरंगा लिए कोई समूह अनुशासित ढंग से ही शांतिपूर्ण प्रदर्शन करेगा और आम लोगों को परेशान नहीं होने देगा। प्रायः आंदोलनकारियों को तब तक चैन नहीं मिलता, जब तक ट्रैफिक जाम न हो जाए। विडंबना यह है कि धरना-प्रदर्शन करने वालों के अधिकारों के प्रति तो अदालतें उदार रहती हैं, लेकिन वे इसका ध्यान कम ही रखती हैं कि इन अधिकारों के दुरुपयोग से आम लोगों को परेशानी होती है।
हमारा संविधान शांतिपूर्ण तरीके से धरने-प्रदर्शन का अधिकार देता है, लेकिन इन अधिकारों की सीमा वहीं तक है, जहां तक दूसरों को तकलीफ न हो। अब ऐसे धरना-प्रदर्शन बढ़ रहे हैं, जिनमें तिरंगाधारी आम लोगों के लिए जानबूझकर समस्याएं खड़ी करते हैं। कुछ तो अराजकता का भी सहारा लेते हैं और इसके लिए पुलिस से धक्का-मुक्की करने के साथ झूठी खबरें भी फैलाते हैं। सीजेपी के संसद चलो मार्च के दौरान यही हुआ था, लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हिंसा करने वालों को माफी दे दी। यह एक तरह से अराजकता फैलाने वालों को दिया गया अभयदान ही था। अदालतों को आंदोलनकारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए सजग रहना ही चाहिए, लेकिन उन्हें इस पर भी गौर करना चाहिए कि यदि इन अधिकारों के दुरुपयोग से आम लोगों की नाक में दम होता है तो उनके अधिकारों की रक्षा भी हो।
सीजेपी के जो लोग अपने धरने-प्रदर्शन को शांतिपूर्ण बताते हैं, उनके साथी और समर्थक तिरंगे को ढाल बनाकर रिजीम चेंज की भी बातें कर रहे हैं। लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिये सत्ता परिवर्तन की चाह रखना बुरी बात नहीं। राजनीतिक-सामाजिक संगठनों को सत्ता परिवर्तन के लिए जनमत तैयार करने का पूरा अधिकार है, लेकिन रिजीम चेंज का मतलब तो अराजकता के सहारे तख्तापलट करना होता है। बांग्लादेश में ऐसा ही हुआ था और यह स्पष्ट ही है कि प्रशांत भूषण रिजीम चेंज की बात कर रहे हैं तो नेहा बोरा बांग्लादेश के हिंसक आंदोलन से प्रेरणा ले रही हैं। इसे प्रेरणा नहीं, कुप्रेरणा ही कहा जाएगा।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)











