जागरण संपादकीय: ट्रंप पर कितना भरोसा करें
अब जब अमेरिका को भारत का साथ लेना जरूरी जान पड़ रहा है, तब फिर उससे ऐसा समझौता होना चाहिए, जो भारतीय हितों के भी अनुकूल हो।
HighLights
ट्रंप के भारत व्यापार समझौते के दावों पर लगातार संदेह।
अमेरिका को ऊर्जा संकट में भारत के सहयोग की आवश्यकता।
वेनेजुएला के कच्चे तेल शोधन में भारत की अहम भूमिका।
यह समझना कठिन है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस कथन पर कितना भरोसा किया जाए कि वे भारत से व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के निकट हैं? वे और उनके सहयोगी इसके पहले भी कई बार यह कह चुके हैं कि हम भारत से व्यापार समझौता करने के करीब हैं, लेकिन महीनों बीत गए और ऐसा होने की नौबत नहीं आई। ट्रंप के दावों पर यकीन करना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि वे अपनी ही बातों से मुकरने के आदी हो चुके हैं।
अभी हाल में तो वे उस कानून पर अमल टालने को भी बाध्य हुए, जिसके तहत भारत, चीन समेत उन पांच देशों पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने जा रहे थे, जो रूस से तेल आयात करते हैं। उन्हें अपने कदम इसलिए पीछे खींचने पड़े, क्योंकि अमेरिका खुद रूस से डीजल खरीदने को बाध्य हो गया। इसकी भी अनदेखी न की जाए कि अमेरिका-ईरान टकराव और रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते विश्व भर का ऊर्जा बाजार अस्थिर हो गया है। इसके चलते तेल एवं गैस के बढ़ते मूल्यों की तपिश अमेरिका को भी झेलनी पड़ रही है-और वह भी ऐसे समय, जब वहां मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं और ट्रंप की साख दांव पर हैं।
यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि अमेरिका को अंततः यह आभास हुआ कि ऊर्जा संकट के समाधान में भारत का सहयोग लेना आवश्यक है। इसका एक प्रमाण उसके विदेश मंत्री मार्को रूबियो का जामनगर की रिलायंस रिफाइनरी का दौरा करना है। वहां जाने से पहले उन्होंने भारत को कच्चे तेल की रिफाइनिंग के मामले में महाशक्ति कहा। तथ्य यह भी है कि अमेरिका इस कोशिश में है कि भारत वेनेजुएला से अधिक से अधिक कच्चा तेल खरीदे और उसे शोधित कर निर्यात करे, ताकि ऊर्जा संकट से जूझ रहे अन्य देशों के साथ उसे भी राहत मिले।
भारत वेनेजुएला से जितना अधिक कच्चा तेल खरीदेगा, अमेरिका को उतना ही अधिक लाभ होगा, क्योंकि उसने वहां के तेल स्रोतों को एक तरह से अपने कब्जे में ले लिया है। यह भी उल्लेखनीय है कि वेनेजुएला के कच्चे तेल की गुणवत्ता ऐसी है कि सबके लिए उसका शोधन करना आसान नहीं। भारत यह करने में सक्षम है। स्पष्ट है कि जब अमेरिका को यह लगा कि भारत उसके हितों की पूर्ति में सक्षम है, तब उसके रवैये में नरमी आई। इसके बाद भी जब तक व्यापार समझौता हो नहीं जाता, तब तक आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता।
इसलिए और भी नहीं, क्योंकि ट्रंप कह रहे हैं कि भारत से व्यापार समझौता हमारे द्वारा पहले किए गए समझौतों से अलग तरह का होगा। इसका ठीक-ठीक अर्थ क्या है, जब तक यह स्पष्ट न हो जाए, तब तक समझौते को लेकर संदेह बना रहेगा। अब जब अमेरिका को भारत का साथ लेना जरूरी जान पड़ रहा है, तब फिर उससे ऐसा समझौता होना चाहिए, जो भारतीय हितों के भी अनुकूल हो।


-1792606042745_v.webp)








