विचार: गंभीर संगठित अपराध बना मानव तस्करी
यौन शोषण पीड़ितों के मामले में पुलिस को संवेदनशलीन बनाने के साथ ही उनके लिए संरक्षण गृहों का परिवेश भी बेहतर बनाया जाए।
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने मानव तस्करी पर दिए महत्वपूर्ण निर्देश।
पीड़ितों को अपराधी न मानें, निजता का ध्यान रखें।
कानूनों में सुधार और पुनर्वास पर विशेष जोर।
आरके विज। युवतियों के मानव तस्करों के गिरोह के चंगुल में फंसने के समाचार आए दिन आते ही रहते हैं। शायद यही कारण रहा कि बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देश दिया कि वे मानव तस्करी रोकने के लिए बनाई गई विशेष इकाइयों को थाने का दर्जा दें। वेश्यावृत्ति या देह व्यापार के उद्देश्य से की जाने वाली मानव-तस्करी एक गंभीर संगठित अपराध है। आम तौर पर कोई भी महिला स्वेच्छा से इस व्यवसाय में कदम नहीं रखती। हालांकि अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 के तहत स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति करना अपराध नहीं है, फिर भी कुछ प्रविधान ऐसे हैं, जिनके तहत वेश्यावृत्ति करने वाले को भी सजा दी जा सकती है।
हैरानी है कि अनैतिक व्यापार की रोकथाम के लिए कानून है, परंतु इसमें मानव-तस्करी की परिभाषा नहीं दी गई। भारतीय दंड विधान में भी जस्टिस वर्मा कमेटी की अनुशंसाओं के बाद 2013 में मानव तस्करी के प्रविधान (धारा 370 और धारा 370 ए आइपीसी) जोड़े गए, जो अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन यानी पालेरमो प्रोटोकाल के अनुरूप हैं। 1956 का कानून संयुक्त राष्ट्र की 1949 के अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन पर आधारित था, जिसका उद्देश्य यौन शोषण को रोकना था। दो बार इस कानून में संशोधन किया गया। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत भी मानव तस्करी को संगठित अपराध माना गया। बालकों की तस्करी के प्रकार पोक्सो और जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम के प्रविधानों के अनुसार निपटाए जाते हैं।
गृह मंत्रालय के निर्देशानुसार जिलों में मानव-तस्करी विरोधी इकाइयां भी सक्रिय हैं, जिन्हें केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता दी गई है। कानून में कुछ कमियों को दूर करने और मानव-तस्करी की पीड़ित की सुरक्षा और पुनर्वास सुनिश्चित करने के उद्देश्य से इसी विषय पर काम करने वाली संस्था प्रज्वला ने 2004 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। यह याचिका केंद्र सरकार द्वारा कुछ कार्रवाई करने के वादे के चलते कोर्ट द्वारा निपटाई गई, पर कुछ मूल कमियां अभी भी शेष थीं, जिसके कारण 2022 में प्रज्वला द्वारा पुन: याचिका दायर की गई, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। इसमें पहला निर्देश यह था कि वेश्यावृत्ति के लिए मानव-तस्करी की पीड़ित महिला का बचाव करने के बाद उसके साथ अपराधी जैसा बर्ताव न किया जाए। उसकी निजता का ध्यान रखा जाए और उसे मीडिया के सामने पेश न किया जाए। पूछताछ के दौरान महिला पुलिस हमेशा साथ रहे। पूछताछ के दौरान यह स्पष्ट किया जाए कि क्या वेश्यावृत्ति स्वैच्छिक थी या जबरदस्ती। पीड़ित महिला को संरक्षण गृह भेजना या स्वजनों को सौंपने से पहले, उसकी सहमति सबसे महत्वपूर्ण है। संरक्षण गृह भी सभी सुविधाओं से युक्त हों।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया कि रेड और रेस्क्यू करने की कार्रवाई करने वाली इकाई के प्रभारी डीएसपी स्तर के अधिकारी हों, जिनमें महिला अधिकारी, गैर-शासकीय सलाहकार आदि सम्मिलित हों। प्रत्येक राज्य में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक स्तर का अधिकारी मानव-तस्करी विरोधी ब्यूरो का प्रभारी हो और ‘पीड़ित सुरक्षा योजना’ लागू करने के लिए नोडल अधिकारी महिला एवं बाल विकास विभाग के सचिव हों। इसी प्रकार कानून में उल्लिखित प्रविधानों के अनुसार गैर-शासकीय सलाहकार निकाय और मान्यता-प्राप्त कल्याणकारी संस्थाओं को अधिसूचित किया जाए। कोर्ट द्वारा ‘विक्टिम प्रोटेक्शन प्लान’ में दिए गए विस्तृत निर्देश तब तक लागू रहेंगे, जब तक संसद इस संबंध में कोई कानून नहीं बना लेती। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि पीड़ित चाहे मानव-तस्करी के तहत हो या अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम के अंतर्गत, ‘पीड़ित सुरक्षा योजना’ सभी पीड़ितों (स्वेच्छा से वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं सहित) पर लागू होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा कानून और संस्थाओं की विस्तृत समीक्षा करते हुए उनमें कुछ संशोधन के भी सुझाव दिए।
पहला, यह कि अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम के अंतर्गत वेश्यावृत्ति की पीड़ित को (धारा सात, आठ और 20 के अंतर्गत) अपराधी न माना जाए, खासतौर पर जब वह मानव-तस्करी की शिकार हो। पूर्व में, इस संबंध में केंद्र सरकार द्वारा भी एडवाइजरी जारी की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने संरक्षण गृह के डिटेंशन-आधारित माडल के भी बहुआयामी विकल्प सोचने का सुझाव दिया, ताकि पीड़ितों की आवश्यकता के अनुसार उनका पुनर्वास करने में सहायता मिले। तीसरा, यह कि स्वैच्छिक वेश्यावृत्ति के मामलों में अधिकार-आधारित सुरक्षा के प्रविधान कानून में किए जाएं, क्योंकि फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट प्रविधान कानून में नहीं है और अक्सर उनसे पीड़ित के बजाय अपराधी की तरह व्यवहार किया जाता है। चौथा, पालेरमो प्रोटोकाल में दी गई मानव-तस्करी की परिभाषा की तरह बीएनएस में भी नाबालिग पीड़ित के लिए तस्करी के तरीकों की अनिवार्यता को भी दूर किया जाए। पांचवां, पुलिस द्वारा पीड़ित के शोषण या उसे समय पर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत न करने को आपराधिक बनाया जाए। ऐसा सुझाव विधि-आयोग द्वारा भी दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट का यह भी कहना था कि वर्तमान में यौन शोषण के लिए मानव-तस्करी से निपटने के प्रविधान कई कानूनों में हैं, इसलिए समग्रता से परिपूर्ण एक कानून बनाया जाए।
जहां तक संगठित अपराध अनुसंधान एजेंसी (ओसीआइए) के गठन का प्रश्न है तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार इस मामले में निर्णय ले। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की यह मंशा भी है कि पुलिस अधिकारियों को पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित किया जाए और उनकी संवेदनशीलता का स्तर बढ़ाया जाए। संरक्षण गृहों का माहौल बेहतर हो और यौन शोषण की पीड़ितों के पुनर्वास में सभी का सहयोग मिले। संविधान में प्रत्येक व्यक्ति को शोषण से बचाव का मौलिक अधिकार है, जिसमें पुनर्वास भी सम्मिलित है। इसलिए राज्य की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह गंभीर संगठित अपराध बन चुके मानव तस्करी के पीड़ितों के बचाव एवं पुनर्वास की पर्याप्त व्यवस्था करे।
(लेखक छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक रहे हैं)
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