विचार: आर्थिक हितों पर चोट करते आंदोलन
देश में आए दिन होने वाले विरोध-प्रदर्शन आर्थिक विकास, निवेश और रोजगार के लिए भी मुश्किलें पैदा करते हैं।
HighLights
दिल्ली में प्रदर्शनों से व्यापार को भारी आर्थिक नुकसान हुआ।
सामाजिक अशांति से जीडीपी और निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
विरोध प्रदर्शनों और आर्थिक प्रगति में संतुलन बनाना आवश्यक है।
डॉ. सुरजीत सिंह। लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को असहमति जताने और सरकार से जवाब मांगने का अधिकार है। पिछले कुछ अर्से से यदि काकरोच जनता पार्टा यानी सीजेपी और कुछ विपक्षी दलों को लगता है कि मात्र कुछ हजार लोगों के सहारे अराजकता फैला कर हर बात पर सरकार को झुकने के लिए मजबूर किया जा सकता है तो यह शायद उनकी अपरिपक्वता ही है। सीजेपी नेताओं और विपक्षी दलों को यह क्यों नही समझ आ रहा कि सड़कों पर अराजकता फैलाने से आम आदमी कितना प्रभावित हो रहा है? व्यवसाय बंद होने से रोज कमाकर खाने वालों की जीविका कितनी प्रभावित हो रही है?
दिल्ली के व्यापारिक संगठनों की मानें तो राष्ट्रीय राजधानी में हालिया प्रदर्शनों और प्रतिबंधों के कारण लगभग 2,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। कन्फेडरेशन आफ इंडिया ट्रेडर्स ने इन धरना-प्रदर्शनों के चलते दिल्ली में प्रतिदिन लगभग 400 करोड़ रुपये के कारोबार के नुकसान का अनुमान व्यक्त किया। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती, जिसमें नागरिकों की आवाज भी सुनी जाए और देश की आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित न हों। मुख्य सड़कों पर अराजकता या अव्यवस्था की आशंका भरे आंदोलन से न सिर्फ बाजार की बिक्री प्रभावित होती है, बल्कि इसका असर दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों, सामान पहुंचाने वाले वाहन चालकों, छोटे थोक व्यापारियों, पैकिंग करने वाले श्रमिकों, रेहड़ी-पटरी वाले और आसपास चाय आदि की दुकान चलाने वाले भी प्रभावित होते हैं।
बड़े कारोबारी तो कुछ समय तक नुकसान सह सकते हैं, लेकिन रोज की कमाई पर निर्भर परिवार के लिए एक दिन का काम छूटना भी भोजन, किराया, बच्चों की पढ़ाई और दवाइयों के खर्च को प्रभावित करता है। बड़े त्योहारों और शादी-विवाह के समय में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। त्योहारों से पहले खुदरा व्यापारियों को उम्मीद रहती है कि कपड़े, जूते, इलेक्ट्रानिक्स, उपहार, मिठाइयों और घरेलू सामान की बिक्री बढ़ेगी। व्यापारी पहले से माल खरीदते हैं, कर्मचारियों की व्यवस्था करते हैं और किराया तथा अन्य खर्च वहन करते हैं। सड़कों पर अव्यवस्था या फिर अराजकता के कारण यदि ग्राहक बाजार तक नहीं पहुंच पाते तो बाजार एवं आर्थिकी पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे आंदोलन आर्थिक विकास, निवेश, उत्पादन और रोजगार के लिए भी मुश्किलें उत्पन्न करते हैं।
वर्ष 2021 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा प्रकाशित शोधपत्र ‘सामाजिक अशांति के व्यापक आर्थिक प्रभाव' में 1990 से 2019 तक के विभिन्न देशों के आंकड़ों के आधार पर बताया गया था कि सामाजिक अशांति का अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। अशांति बढ़ने के छह तिमाहियों बाद भी जीडीपी का स्तर औसतन 0.2 प्रतिशत नीचे रह सकता है, जबकि अशांति की बड़ी घटनाओं के बाद यह अंतर लगभग एक प्रतिशत तक पहुंच सकता है। इसका प्रमुख कारण विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में गिरावट, उपभोग में कमी तथा निवेशकों के विश्वास में कमजोरी है। शोध में यह भी पाया गया कि कई आंदोलनों का आर्थिक प्रभाव राजनीतिक या चुनाव संबंधी आंदोलनों से अधिक हो सकता है। निरंतर अराजकता और अव्यवस्था देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी प्रभावित करती है।
आज जब विश्व की अनेक एजेंसियों ने भारत का जीडीपी अनुमान बढ़ा दिया है, तब संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए, जो आर्थिक माहौल को नकारात्मक बनाए। नेताओं को यह समझना होगा कि अराजकता पैदा करने वाले आंदोलन लोगों का ध्यान आकर्षित करने का आसान रास्ता तो हो सकता है, पर लोकतंत्र मे सत्ता परिवर्तन केवल चुनावी जनमत, स्पष्ट नीतिगत विकल्पों और जन-विश्वास से ही संभव है। भारत में सड़कों पर अव्यवस्था सत्ता परिवर्तन का साधन नहीं बन सकती। आज देश का आम नागरिक अपनी आजीविका और बेहतर भविष्य को लेकर अधिक सजग है।
यदि किसी कारण देश की अर्थव्यवस्था या रोजमर्रा का कारोबार बाधित होता है, तो आम जनता को यह अहसास होने लगता है कि आर्थिक अस्थिरता से देश और उनका खुद का नुकसान हो रहा है। इससे वे सत्ता परिवर्तन के बजाय शांति और स्थिरता के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। आज का युवा और जेन-जी मतदाता अधिक जागरूक है। वह भावनात्मक नारों से अधिक अपने आर्थिक भविष्य के आधार पर राजनीतिक निर्णय लेता है। आम तौर पर आंदोलनकारी इसे भांप नहीं पाते कि आज लोग आर्थिक व्यवधान पैदा करने वाले किसी माध्यम को सकारात्मक बदलाव का जरिया नहीं मानते।
आर्थिक दृष्टि से आदर्श लोकतंत्र वह है, जहां विरोध की आवाज भी सुनी जाए और अर्थव्यवस्था की गति भी बाधित न हो। जहां सरकार की जिम्मेदारी है कि वह असंतोष के कारणों को समझे और संवाद के माध्यम से समाधान निकाले, वहीं आंदोलनकारियों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करते समय आम लोगों की आजीविका और सार्वजनिक हितों का भी ध्यान रखें। प्रभावी संस्थाएं, संवेदनशील शासन और जिम्मेदार विरोध, इन तीनों के समन्वय से ही आर्थिक प्रगति और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
(लेखक अर्थशास्त्री हैं)

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