विचार: क्यों लंबे खिंच रहे हैं युद्ध
एक अच्छा सैन्य प्रमुख वही है, जो युद्ध आरंभ होने से पहले ही उसकी समाप्ति की रूपरेखा भी तैयार कर ले। वर्ष 1971 में भारत का सफल सैन्य अभियान एक सुविचारित योजना और उसके सटीक रणनीतिक क्रियान्वयन की ही मिसाल था।
HighLights
युद्ध शुरू करना आसान, पर समाप्त करना बेहद मुश्किल होता है।
निर्णायक जीत के लिए सिर्फ सैन्य शक्ति पर्याप्त नहीं होती।
स्थायी समाधान हेतु कूटनीति, आर्थिक क्षमता और राजनीतिक नेतृत्व अनिवार्य।
मेजर जनरल जगतबीर सिंह (सेवानिवृत्त)। पूर्व सेना प्रमुख जनरल वीएन शर्मा ने बहुत ही मार्के की बात कही थी कि युद्ध छेड़ना तो आसान है, लेकिन एक बार शुरू होने के बाद उसे अपनी शर्तों पर समाप्त करना कठिन होता है। एक अच्छा सैन्य प्रमुख वही है, जो युद्ध आरंभ होने से पहले ही उसकी समाप्ति की रूपरेखा भी तैयार कर ले। वर्ष 1971 में भारत का सफल सैन्य अभियान एक सुविचारित योजना और उसके सटीक रणनीतिक क्रियान्वयन की ही मिसाल था।
इसी रणनीति के बल पर भारत ने महज सोलह दिनों के अंतराल में निर्णायक विजय प्राप्त की और वैश्विक मानचित्र पर बांग्लादेश का उदय हुआ। वह युद्ध कम से कम समय में अधिक से अधिक परिणाम देने का अप्रतिम उदाहरण बना। जबकि इतिहास ऐसे अनगिनत उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहां रणभूमि में आरंभिक स्तर पर विजय की ओर अग्रसर दिखने वाले अंत में हार गए और पराजित दिख रहा खेमा विजेता बनकर उभरा।
इराक और अफगानिस्तान जैसे संघर्षों से भी स्पष्ट हुआ कि निर्णायक सफलता केवल सैन्य शक्ति के दम पर हासिल नहीं की जा सकती। स्थायी विजय के लिए सिर्फ विरोधी की सामरिक क्षमताओं को ध्वस्त करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि संघर्ष की जड़ में मौजूद गहरे अंतर्विरोधों और मूल समस्याओं का सार्थक समाधान निकालना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आधुनिक युद्धों में यह झलकता भी है।
अधिकांश जंगों का फैसला अंत में वार्ता के जरिये ही हुआ। किसी भी युद्ध की समाप्ति के लिए दोनों पक्षों को संवाद के माध्यम से संघर्ष विराम का विकल्प चुनना होता है। नि:संदेह विध्वंस का अपना एक वजन होता है और तबाही का यही मंजर युद्ध को शांति काल की सामान्य राजनीति से अलग करता है। हालांकि सामरिक हलकों में यह तबाही भी केवल बातचीत की शर्तों में पलड़े को अपने पक्ष में अधिक से अधिक मोड़ने का प्रयोजन ही अधिक होती है।
दुनिया इस समय युद्धों की आग में झुलस रही है। कोई मोर्चों पर चल रहे संघर्षों ने वैश्विक व्यवस्था को बड़े पैमाने पर झकझोर कर रख दिया है। जून में जारी उप्साला कान्फ्लिक्ट डाटा प्रोग्राम यानी यूसीडीपी की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में अभी 65 सक्रिय संघर्ष चल रहे थे। इन संघर्षों की संख्या लगातार दूसरे वर्ष दोगुनी बढ़ गई है, जिनका आंकड़ा 2023 में दो था, वह 2025 में आठ तक पहुंच गया।
दशकों तक संप्रभु देशों के बीच प्रत्यक्ष सैन्य टकराव अपवाद स्वरूप ही देखने को मिलते थे, लेकिन हालिया वैश्विक घटनाओं ने बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव और बदलती वैश्विक सुरक्षा संरचना को पूरी तरह उजागर कर दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर जो सैन्य आक्रमण छेड़ा, वहां लक्ष्य स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं थे। उन्होंने इसके लिए अमेरिकी संसद और इजरायल को छोड़कर किसी अन्य प्रमुख सहयोगी को भी भरोसे में नहीं लिया। न ही कूटनीतिक वार्ताओं एवं आर्थिक प्रतिबंधों के विकल्पों को पूरी तरह आजमाया गया।
उनके पास इस युद्ध को समाप्त करने की भी कोई कारगर रणनीति नहीं थी। इसका ही असर है कि वे रह-रहकर हमले करते रहते हैं। इसके पीछे उनकी वही धारणा है कि प्रचंड सैन्य शक्ति ईरान को बिना शर्त घुटने टेकने पर विवश कर देगी, लेकिन यह अभियान अमेरिका को केवल एक जटिल और अंतहीन रणनीतिक गतिरोध की ओर ही ले जाता दिख रहा है। सैन्य शक्ति के मामले में ईरान कहीं भी अमेरिका के आगे नहीं टिकता। ऐसी जबरदस्त सैन्य शक्ति के बावजूद अमेरिका अभी तक ईरान को रणनीतिक रूप से परास्त कर अपनी शर्तें मानने पर विवश नहीं कर पाया।
वहीं, ईरान खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों को निशाना बनाने की सामर्थ्य तथा होर्मुज जलमार्ग पर आर्थिक नाकेबंदी के खतरे के जरिये एक प्रभावी प्रतिरोध और संतुलन खड़ा करने में कामयाब रहा है। सैन्य विजय के अति-उत्साही भरोसे ने ट्रंप प्रशासन को संघर्ष-समाप्ति के किसी सुविचारित पड़ाव पर पहुंचने से वंचित कर दिया है। परिणामस्वरूप इस लंबी खिंचती जंग का आर्थिक भार बढ़ता जा रहा है और वैश्विक बाजार गंभीर संकट के मुहाने पर पहुंचते जा रहे हैं।
यूक्रेन के मोर्चे पर रूसी सेना भी लंबे समय से फंसी हुई है। इतना समय तो सोवियत रेड आर्मी ने द्वितीय विश्व युद्ध में नाजी जर्मनी की सेना से मुकाबले में भी नहीं लगाया था। रूसी राष्ट्रपति पुतिन और उनके रणनीतिक योजनाकारों का युद्ध की समयसीमा को लेकर किया गया पूरा गुणा-गणित ध्वस्त हो गया, क्योंकि उनकी मूल मंशा इसे एक त्वरित एवं पूरे प्रचंड वेग से किए जाने वाले हमले के जरिये जल्द से जल्द समाप्त करने की थी।
यहां भी अगर विशुद्ध सैन्य शक्ति और संख्याबल की बात की जाए, तो यूक्रेन दूर-दूर तक रूस के करीब नहीं ठहरता। इसके बावजूद, यूक्रेन भारी कीमत चुकाकर भी अपना कड़ा प्रतिरोध जारी रखे हुए है। यूक्रेन पर निर्णायक जीत की उम्मीद ने रूस को एक ऐसे विध्वंसक और थका देने वाले युद्ध के दलदल में धकेल दिया है, जहां से बाहर निकलने की कोई स्पष्ट राह नहीं दिखती।
इजरायल के गाजा अभियान का लक्ष्य भी स्पष्ट था कि हमास की ऐसी कमर तोड़ दी जाए कि वह कभी फिर से उठ खड़ा न हो सके। देखा जाए तो आज हमास की हालत एकदम पस्त है और वह सात अक्टूबर, 2023 से पहले की स्थिति में नहीं रहा। उसके शीर्ष नेतृत्व का सफाया हो चुका है। पूरा ढांचा नष्ट हो गया है। उसकी व्यवस्था चरमरा गई है, लेकिन उसके बचे-खुचे सदस्य बिखरे हुए छापामार दस्तों के जरिये लगातार संघर्ष कर रहे हैं। सीधी लड़ाई में हमास जैसे संगठन की हार उसकी समाप्ति को सुनिश्चित कर भी नहीं सकती।
स्पष्ट है कि शत्रु को रणभूमि में परास्त कर देना ही पर्याप्त नहीं। सैन्य इतिहास साक्षी है कि निर्णायक विजय केवल सैन्य शक्ति से नहीं मिलती। इसके लिए स्पष्ट राजनीतिक नेतृत्व, पेशेवर सैन्य दक्षता, कूटनीतिक कौशल, आर्थिक क्षमता, उन्नत तकनीक और दृढ़ राष्ट्रीय संकल्प को एक सूत्र में बांधकर मुख्य सामरिक लक्ष्य की दिशा में सक्रियता आवश्यक होती है।
(लेखक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हैं)




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