संपादकीय: साइबर ठगी पर सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने साइबर धोखाधड़ी में बैंकों की लापरवाही पर उन्हें जिम्मेदार ठहराया है, जबकि बैंक असामान्य लेनदेन रोकने में विफल रहे हैं
HighLights
बैंकों की लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने जिम्मेदारी तय की।
साइबर अपराधी डिजिटल अरेस्ट, लालच से कर रहे हैं ठगी।
54 हजार करोड़ की धोखाधड़ी, डिजिटल लेनदेन पर असर।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सराहनीय है कि यदि साइबर धोखाधड़ी के मामलों में बैंकों की गलती या लापरवाही पाई जाती है तो उन्हें पीड़ित व्यक्ति को भरपाई करनी होगी। यह निराशाजनक है कि बैंक असामान्य लेनदेन को भांप पाने में नाकाम हैं, जबकि उन्हें इसके प्रति अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए, क्योंकि साइबर धोखाधड़ी के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं और यह धोखाधड़ी बैंकों के माध्यम से ही हो रही है।
साइबर अपराधी फर्जी पुलिस, कस्टम, सीबीआइ, ईडी अथवा आयकर अधिकारी के रूप में लोगों को डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर ठगने में लगे हुए हैं। उनके झांसे में आकर कोई व्यक्ति जैसे ही उनकी ओर से बताए गए खाते में धनराशि ट्रांसफर करता है, वैसे ही वह एक के बाद एक दूसरे खातों में स्थानांतरित होती जाती है और अधिकांश मामलों में अपराधियों तक पहुंच पाना कठिन हो जाता है। अनेक मामलों में तो यह सामने आया है कि साइबर छल के जरिये हासिल की गई राशि विदेश पहुंच गई।
साइबर अपराधी डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर तो लोगों को ठगने का काम कर ही रहे हैं, उन्हें लालच देकर अथवा बहकाकर भी ठगी कर रहे हैं। इस ठगी में भी बैंक ही माध्यम बनते हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि साइबर धोखाधड़ी के कुछ मामलों में बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत पाई गई है। ऐसे कुछ कर्मचारियों-अधिकारियों की गिरफ्तारी भी हुई है। एक विडंबना यह भी है कि बैंक म्यूल खातों की पहचान और निगरानी नहीं कर पा रहे हैं, जबकि साइबर ठगी के लिए ऐसे ही खातों का इस्तेमाल होता है।
इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि कुछ मामलों में साइबर अपराधी पकड़ में आ जाते हैं और चंद लोगों को छल-छद्म से हड़पी गई राशि भी वापस हो जाती है, लेकिन सच्चाई यही है कि साइबर अपराधियों का दुस्साहस और उनका दायरा बढ़ता चला जा रहा है। अधिकांश मामलों में लोगों को उनकी राशि कभी वापस नहीं मिल पाती।
साइबर अपराधी किस तरह बेलगाम हो गए हैं और वे किस बड़े पैमाने पर लोगों को ठगने का काम कर रहे हैं, इसका पता कुछ माह पहले सामने आए इस आंकड़े से लगता है कि अभी तक 54 हजार करोड़ रुपये की साइबर धोखाधड़ी हो चुकी है। यह राशि कुछ राज्यों के बजट से भी अधिक है।
यह अच्छा है कि सुप्रीम कोर्ट साइबर धोखाधड़ी के मामलों के प्रति लगातार कठोर रुख अपना हुए है और गत दिवस उसने रिजर्व बैंक के प्रस्तावित केवाईसी संशोधन निर्देशों की समीक्षा करने की भी बात कही, लेकिन उचित यह होगा कि सरकारी एजेंसियां भी अपनी सक्रियता दिखाएं, क्योंकि अभी तक तो साइबर अपराधी उनसे दो हाथ आगे ही नजर आ रहे हैं। यह स्थिति डिजिटल लेनदेन की व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कम करने वाली है।




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