आदित्य सिन्हा। विकसित राजस्थान-2047' के लक्ष्य की दिशा में प्रशासनिक रोडमैप को गति देते हुए राजस्थान के मुख्य सचिव ने बीते दिनों भारतीय गुणवत्ता परिषद यानी क्यूसीआइ को शासन के छह विभागों के गहन संस्थागत परीक्षण का जिम्मा सौंपा है। इस कवायद का उद्देश्य कार्यप्रणालियों का विस्तृत खाका तैयार करना, विभागीय प्राथमिकताओं के अनुरूप मौजूदा मानव संसाधन की समीक्षा करना, अंतर-विभागीय दोहराव को समाप्त करना और प्रशासनिक पदानुक्रम के प्रत्येक स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

अरुणाचल प्रदेश भी 2025 में प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन कर चुका है। केरलम ऐसी चार कवायदें पहले ही पूरी कर चुका है। यह रुझान दर्शाता है राज्यों ने अपनी प्रशासनिक मशीनरी को चुस्त-दुरुस्त बनाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। जबकि केंद्र सरकार ने 2009 के बाद से ऐसी कोई पहल नहीं की है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि केंद्र सरकार ने 'विकसित भारत' का नारा तो गढ़ा है, लेकिन वह अपने स्तर पर इस दिशा में कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठा रही है?

कई कसौटियों पर प्रशासनिक सुधार आवश्यक ही नहीं, अपितु अपरिहार्य हो गए हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि सरकारी परियोजनाएं भारी लेट-लतीफी की शिकार हैं। केंद्रीय बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की आधिकारिक निगरानी रिपोर्ट दर्शाती है कि 458 परियोजनाओं की स्वीकृत लागत में 5.71 लाख करोड़ रुपये तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी हो गई है। ये परियोजनाएं कई महीनों से लेकर दशकों की देरी तक खिंच चुकी हैं। सुधारों की राह में इस पहलू को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि सरकारें सबसे बड़ी मुकदमेबाज बन गई हैं।

वर्ष 2025 के अंत तक अदालतों में लंबित 5.39 करोड़ मुकदमों में केंद्र और राज्य सरकारें ही एक पक्ष हैं। स्थिति ऐसी बन गई है कि सरकार का एक विभाग ही दूसरे विभाग के खिलाफ अपील दायर कर रहा है और इस तकरार की कीमत आम नागरिकों के लंबित मामलों को चुकानी पड़ रही है।

सुधारों की राह में तीसरी कसौटी योजनाओं को सुसंगत बनाने की है। केंद्र प्रायोजित योजनाओं का दायरा कागजों पर तर्कसंगत बनाकर 130 से घटाकर 75 मूल श्रेणियों में समेटने का दावा तो किया गया, लेकिन हकीकत यही है कि 2025-26 में इनका बजट 5.4 लाख करोड़ रुपये को पार कर गया। इनमें से तमाम योजनाएं दशकों से चली आ रही हैं, लेकिन उनकी उपयोगिता की व्यापक समीक्षा की सुध पहली बार पिछले साल ली गई है।

चौथी कसौटी प्रशासनिक अधिकारियों से ही जुड़ी है। जहां सरकारों के सचिवालय तो बाबुओं से भरे हुए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अधिकारियों का भारी अभाव है। एक जनवरी 2025 तक आइएएस का लगभग हर पांचवां पद और आइएफएस का हर तीसरा पद खाली पड़ा था। इसका असर जिला स्तर और फील्ड पोस्टिंग में स्पष्ट दिखता है।

पांचवीं कसौटी यही है कि मौजूदा व्यवस्था में किसी के भी काम की जवाबदेही या प्रदर्शन को समग्रता में नहीं आंका जाता। 'रिजल्ट्स फ्रेमवर्क डाक्युमेंट्स' की व्यवस्था ने एक समय सचिव स्तर के शीर्ष अधिकारियों को वार्षिक लक्ष्यों के लिए सीधे जवाबदेह बनाया था, जिनकी स्वतंत्र समीक्षा तीसरे पक्ष से कराई जाती थी। अपने दौर में करीब 80 विभागों को दायरे में लेने वाली यह व्यवस्था 2013-14 के बाद ठंडे बस्ते में डाल दी गई और इसका कोई विकल्प तक तैयार नहीं किया गया।

स्पष्ट है कि जो व्यवस्था अपने अधिकारियों की कार्यक्षमता का ही हिसाब नहीं रख सकती तो वह उनके काम की कद्र कर उन्हें पुरस्कृत करेगी? ऐसे में ठोस नतीजों की उम्मीद बेमानी ही कही जाएगी। ऐसा नहीं कि इन विसंगतियों को पहले चिह्नित न किया गया हो। वर्ष 2006 से 2009 के बीच द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के माध्यम से केंद्र सरकार के स्तर पर 15 रिपोर्ट और 1,514 सिफारिशें प्रस्तुत की गई थीं। इनमें से सरकार ने 1,183 को स्वीकार भी कर लिया था। इनके क्रियान्वयन का अंतिम बार हिसाब मई 2012 में दिया गया था। तब यह संख्या 533 दर्ज की गई थी और उसके बाद कभी इनकी गिनती ही नहीं हुई।

यह सही है कि दिसंबर 2023 तक 1,562 अप्रासंगिक हो चुके पुराने कानूनों को निरस्त किया गया। इसी क्रम में जन विश्वास अधिनियम, 2023 के जरिये 183 प्रविधानों को आपराधिक बंदिश से मुक्त किया गया। वर्ष 2017 के बजट से योजनागत और गैर-योजनागत व्यय का भेद समाप्त कर दिया गया। ये तमाम सुधार ऐसे हैं, जिनसे व्यवस्था के भीतरी तंत्र के विशेषाधिकारों पर जरा भी आंच नहीं आई। जबकि जिन सुधारों को दफन कर दिया गया, वे सत्ता प्रतिष्ठान की मानसिकता को पूरी तरह बेनकाब करते हैं। मंत्रालयों के एकीकरण या उन्हें सुगठित बनाने का यही अर्थ है कि नेताओं के विशेषाधिकारों पर चोट होना।

सिविल सेवाओं के लिए एक कड़ा कानून भी अधिकारियों के सुरक्षा आवरण और सुविधावादी रवैये पर आघात करता है। असल में जब कुछ समूह अपने निहित स्वार्थों के लिए लामबंद होते हैं, तो सुधार वहीं दम तोड़ देते हैं। इस क्रम में विशेषाधिकार संपन्न वर्ग अपने मनमाने अधिकारों या विवेकाधिकारों की रक्षा में उतर आता है। भारत में सुधारों का क्रियान्वयन उनकी उपयोगिता या योग्यता से नहीं, बल्कि इस बात से निर्धारित हुआ है कि उनकी आंच किसको झेलनी पड़ेगी। स्पष्ट है कि यहां बीमारी पहचान करने में कोई समस्या नहीं, बल्कि वास्तविक समस्या उसके उपचार की है कि उसमें किसकी जवाबदेही तय की जाए।

स्पष्ट है कि सुधारों की राह में परियोजनाओं की पूर्णता को लेकर अनुशासन बरतना होगा। सरकारों को मुकदमेबाजी के चलन से बचना होगा। परियोजनाओं की एक मियाद भी तय करनी होगी। प्रशासनिक अधिकारियों के कैडर का संतुलित रूप से पुनर्गठन करना होगा। हर विभाग का समग्रता में उचित मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाए। यदि हमें विकसित भारत के लक्ष्य की पूर्ति करनी है तो अगले दो दशकों तक करीब आठ प्रतिशत की दर से आर्थिक वृद्धि करनी होगी।

कोई भी देश जर्जर प्रशासनिक मशीनरी के बूते ऐसा लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है। विकसित भारत का आह्वान तो दिल्ली से हुआ था, लेकिन इसकी शुरुआत जयपुर से होती दिख रही है। प्रशासनिक सुधारों के मोर्चे पर दिल्ली को अब और देर नहीं करनी चाहिए।

(लेखक लोक-नीति विश्लेषक हैं)