दिनेश प्रसाद। जेन जी और जेन अल्फा की पीढ़ी को समझते समय सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि विद्यार्थी क्या सीख रहे हैं, अपितु यह है कि वे सीख कहां से रहे हैं? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि विद्यार्थी केवल पाठ्यपुस्तक से नहीं सीखता। वह अपने आसपास के व्यवहार से भी सीखता है, परिवार से सीखता है, मित्रों से सीखता है, शिक्षक से सीखता है और आज पहले से कहीं अधिक डिजिटल दुनिया से सीखता है। वह जो देखता है, सुनता है और अनुभव करता है, धीरे-धीरे उसके विचार और व्यवहार का हिस्सा बन जाता है।


ऐसे में शिक्षा की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक गंभीर एवं बढ़ जाती है। गत दिनों में यह देखने में आया है कि आज की पीढ़ी अधिकारों की चर्चा बहुत करती है, अधिकारों के बारे में जागरूक करना आवश्यक भी है। उन्हें पता होना चाहिए कि उन्हें शिक्षा का अधिकार है, सम्मान के साथ जीने का अधिकार है, अपनी बात रखने का अधिकार है और समान अवसर पाने का अधिकार है। लेकिन क्या हम उन्हें उतनी ही गंभीरता से उनके कर्तव्यों के बारे में भी बता रहे हैं? या वर्तमान पीढ़ी को उनके कर्तव्यों का ज्ञान है? अधिकार महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कर्तव्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। लोकतंत्र केवल अधिकारों की व्यवस्था नहीं है। वह अधिकार और कर्तव्य के संतुलन पर चलता है। यदि कोई व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति सजग है, लेकिन अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन है तो लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत नहीं हो सकती। इसलिए आज की पीढ़ी को यह सिखाना आवश्यक है कि उसे क्या मिलना चाहिए, इसके साथ यह भी समझना होगा कि समाज और राष्ट्र के प्रति उसकी जिम्मेदारी क्या है।


विद्यार्थियों को यदि केवल यह बताया जाए कि उनके अधिकार क्या हैं, लेकिन यह न बताया जाए कि दूसरों के भी अधिकार हैं और उन अधिकारों का सम्मान करना उनका कर्तव्य है, तो अधिकार की चेतना अधूरी रह जाएगी। अपने विचार रखने का अधिकार है तो दूसरों के विचार को सुनने का दायित्व भी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो उसके जिम्मेदार उपयोग का कर्तव्य भी है। इंटरनेट तक पहुंच है तो डिजिटल माध्यम का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने की जिम्मेदारी भी है। आज इंटरनेट मीडिया ने इस संतुलन को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। एक क्लिक में कोई सूचना हजारों लोगों तक पहुंच सकती है। ऐसे में आज के विद्यार्थी को यह भी सिखाना होगा कि हर सूचना सत्य नहीं होती, हर वायरल सामग्री साझा करने योग्य नहीं होती और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जिम्मेदारी से अलग नहीं हो सकती।


यही वह स्थान है जहां संस्कार और मूल्य शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनते हैं। संस्कार का अर्थ केवल परंपराओं का पालन करना नहीं है। संस्कार का अर्थ है- सही और गलत में अंतर समझने की क्षमता, दूसरों के प्रति सम्मान, अनुशासन, संवेदनशीलता, सहानुभूति, सत्य के प्रति आग्रह और अपने कर्तव्यों के प्रति सजगता। मूल्य व्यक्ति को यह तय करने में सहायता करते हैं कि किसी परिस्थिति में उसके लिए सही आचरण क्या होना चाहिए। जब अधिकारों के साथ संस्कार और कर्तव्य जुड़ते हैं तो अधिकार केवल व्यक्तिगत लाभ का माध्यम नहीं रहता, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माण की शक्ति बन जाता है। किसी भी अधिकार की वास्तविक शक्ति इस बात में है कि उसका उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है।


यदि अधिकार का उपयोग केवल अपने हित के लिए हो और उससे समाज के हित की उपेक्षा होने लगे तो वही अधिकार टकराव का कारण बन सकता है। लेकिन जब अधिकार के साथ कर्तव्य और संस्कार जुड़ते हैं तो वही अधिकार राष्ट्र निर्माण का माध्यम बन जाता है। एक जागरूक युवा अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाएगा, लेकिन साथ ही सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा भी करेगा। वह अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करेगा, लेकिन दूसरों की स्वतंत्रता का सम्मान भी करेगा। वह प्रश्न पूछेगा, लेकिन तथ्यों को समझने का प्रयास भी करेगा। इसलिए बच्चों को अधिकारों की जानकारी देना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उन्हें यह समझाना भी है कि अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।


जेन जी और जेन अल्फा के सामने सबसे बड़ी चुनौती शायद सूचना की कमी नहीं, बल्कि सूचना की अधिकता है। पहले बच्चे के सीखने के प्रमुख केंद्र घर, विद्यालय और समाज थे। आज इन तीनों के साथ डिजिटल दुनिया भी एक शक्तिशाली शिक्षक बन चुकी है। यह 'डिजिटल शिक्षक' हमेशा सही जानकारी देगा, यह जरूरी नहीं है। किसी वीडियो की लोकप्रियता उसकी सत्यता की गारंटी नहीं है। किसी प्रभावशाली व्यक्ति की बात अंतिम सत्य नहीं हो सकती। एआइ से प्राप्त उत्तर को भी विवेक की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। इसलिए आज की शिक्षा को केवल जानकारी देने वाली शिक्षा नहीं, बल्कि विवेक विकसित करने वाली शिक्षा बनना होगा। बच्चे को उत्तर बताने से अधिक महत्वपूर्ण है उसे सही प्रश्न पूछना सिखाना। उसे यह सिखाना आवश्यक है कि किसी सूचना पर विश्वास करने से पहले वह स्रोत देखे, तथ्य जांचे और विभिन्न दृष्टिकोणों को समझे। यही आलोचनात्मक चिंतन आगे चलकर उसे कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने में सक्षम बनाएगा।


शिक्षा की असली परीक्षा तब होती है, जब जीवन हमारे सामने कोई ऐसी परिस्थिति रखता है जिसका उत्तर किसी पुस्तक के अध्याय में सीधे नहीं मिलता। संकट के समय व्यक्ति को निर्णय लेना पड़ता है। असफलता के समय स्वयं को संभालना पड़ता है। भ्रम की स्थिति में सही और गलत के बीच चुनाव करना पड़ता है। दबाव में भी मूल्यों पर टिके रहना पड़ता है। ऐसे समय में केवल डिग्री काम नहीं आती। काम आता है वह विवेक, धैर्य, अनुशासन और समस्या समाधान की क्षमता, जो शिक्षा ने व्यक्ति के भीतर विकसित की है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में सफलता नहीं हो सकता। उसका उद्देश्य जीवन की परीक्षा के लिए भी तैयार करना है।

(लेखक प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी, निदेशक- एनसीईआरटी- नई दिल्ली)