विचार: वामपंथियों के शिकंजे में जकड़ी कांग्रेस
वामपंथियों से घिरे राहुल गांधी की रीति-नीति से कांग्रेस मध्यमार्गीय दल की अपनी छवि से मुक्त होने को है
HighLights
कांग्रेस का मध्यमार्गीय पहचान से वामपंथी विचारधारा की ओर बदलाव।
राहुल गांधी के आसपास वामपंथी नेताओं का बढ़ता प्रभाव।
पार्टी की नीतियों और कार्यशैली पर वामपंथ की गहरी छाप।
राजीव सचान। देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी वामपंथ के साथ समाजवाद से भी प्रभावित थे, लेकिन उन्होंने कांग्रेस पार्टी की छवि मध्यमार्गीय दल की बनाए रखी और इसी कारण सभी वर्गों के बीच उसका जनाधार था। इंदिरा गांधी ने भी मध्यमार्ग पर ही चलना पसंद किया। यह बात और है कि एक समय सत्ता बचाए रखने के लिए उन्होंने वामपंथियों का साथ लिया। इसके बदले में उन्होंने शिक्षा एवं अकादमिक संस्थान वामपंथियों के हवाले कर दिए, लेकिन वे जानती थीं कि कांग्रेस की शक्ति मध्यमार्गीय दल बने रहने में ही है। इंदिरा जी के बाद राजीव गांधी ने भी कांग्रेस को मध्यमार्ग में ही रखने की कोशिश की, पर उनके कुछ करीबी वामपंथी भी थे।
नरसिंह राव को अपनी अल्पमत सरकार चलाए रखने के लिए वाम दलों का साथ लेना पड़ा, लेकिन वे उनके प्रभाव-दबाव में नहीं आए और इसी कारण देश का कायाकल्प करने वाले आर्थिक सुधार लागू कर पाए। मनमोहन सिंह को भी वाम दलों का सहयोग लेना पड़ा, लेकिन वे एक सीमा से अधिक उनके दबाव में नहीं आए। उन्होंने अमेरिका से परमाणु समझौते पर वाम दलों के विरोध की परवाह नहीं की।
हालांकि इसी दौर में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की 'सुपर सरकार' कही जाने वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में वामपंथियों का बोलबाला था। इस परिषद में ज्यां द्रेज, हर्ष मंदर, अरुणा राय जैसे वामपंथी रुझान वाले शामिल थे और उनके प्रभाव में मनमोहन सरकार की कई नीतियां भी बनीं। जब घोषित और अघोषित रूप से कांग्रेस की कमान राहुल गांधी के हाथों में आई तो प्रारंभ में उनके करीबी कांग्रेस के दूसरी पीढ़ी के युवा नेता थे, लेकिन एक-एक करके वे उनका साथ छोड़ गए। इनका स्थान लेना शुरू किया वाम विचार वाले नेताओं ने।
अन्ना आंदोलन के समय जिन धुर वामपंथी प्रशांत भूषण ने आंदोलनजीवी के रूप में उभरे योगेंद्र यादव के साथ मिलकर कांग्रेस की ईंट से ईंट बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वे आज राहुल के प्रमुख सहयोगियों में से हैं। इन्हीं योगेंद्र यादव ने एक बार कहा था कि कांग्रेस को मर जाना चाहिए। हाल के वर्षों में राहुल के आसपास वामपंथी विचार वाले नेताओं की जुटान भी बढ़ी है और कांग्रेस में उनका प्रभाव भी।
वामपंथी छात्र नेता कन्हैया कुमार को कांग्रेस में आए लंबा समय हो गया है, लेकिन फिलहाल वे हाशिए पर दिखते हैं। उनकी जगह नई एंट्री नेहा बोरा की होती दिख रही है। बीते दिनों राहुल ने वोट चोरी के अपने शिगूफे के तहत जो धरना-प्रदर्शन किए, उसमें नेहा की खासी भूमिका रही। नेहा ने काकरोच जनता पार्टी के धरना-प्रदर्शन में भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। राहुल वाम रुझान वाले इस समूह को भी करीब लाने जा रहे हैं। राहुल ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में नेहा और प्रशांत भूषण को बोलने का खास तौर पर अवसर दिया। इससे यही लगा कि उन्हें अपने छात्र संगठन के नेताओं पर उतना भरोसा नहीं, जितना वामपंथी छात्र नेता नेहा पर है।
कन्हैया भाकपा के छात्र संगठन के नेता थे तो नेहा वामपंथी छात्र संगठन आइसा की अध्यक्ष हैं। यह संगठन भाकपा (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन से जुड़ा हुआ है। वामपंथ की यह धारा नक्सलबाड़ी के हिंसक संघर्ष से निकली मानी जाती है। इस दल ने हिंसक माओवादियों के खिलाफ सुरक्षा बलों के अभियानों को रोके जाने की मांग की थी और आइसा ने तो बाटला हाउस एनकाउंटर में मारे गए आतंकियों के लिए न्याय की मांग करते हुए जुलूस निकाला था। आपको यह याद ही होगा कि एक बार सलमान खुर्शीद ने कहा था कि उन्होंने जब बाटला हाउस में मारे गए युवकों के फोटो सोनिया जी को दिखाए तो उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।
भाकपा-माले लिबरेशन बिहार में कांग्रेस का सहयोगी और आइएनडीआइए का भी घटक है। इस तथ्य से अवगत होना भी आवश्यक है कि अन्य देशों की तरह भारत में भी इस्लामिस्टों और कम्युनिस्टों में जुगलबंदी है। इस जुगलबंदी के कई चेहरे भी राहुल के करीबियों में शामिल हो गए हैं। वामपंथी रुझान और सोच वाले नेता कांग्रेस में पहले भी रहे हैं, पर यह पहली बार है, जब उनकी अधिकता देखी जा रही है और इनमें धुर वामपंथी किस्म के लोग भी हैं।
समस्या यह नहीं कि राहुल गांधी के करीबियों में घोर वामपंथी भी हैं। समस्या यह है कि उनके भाषणों, नीतियों और कार्यशैली में इन धुर वामपंथियों की छाप गहरी होती जा रही है। राहुल गांधी अपनी विदेश यात्राओं में ऐसे कट्टर वामपंथियों से भी मिलने लगे हैं। वे अपने धरना-प्रदर्शन और रैलियों में घटक दलों और वामपंथी छात्र संगठनों के सहयोग से भीड़ तो जुटा सकते हैं, पर कांग्रेस का जनाधार शायद ही बढ़ा पाएं। उनके निशाने पर केवल अंबानी-अदाणी ही नहीं रहते। वे सरकारी कंपनियों के निजीकरण के भी कट्टर विरोधी हो गए हैं, जबकि राव और मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियों में सरकारी कंपनियों का विनिवेश भी शामिल था।
वामपंथियों की तरह अपनी नाकाम रीति-नीति पर अड़ने वाले राहुल ऐसी बातें भी भूल चुके हैं कि इंदिरा जी ने सावरकर के सम्मान में डाक टिकट जारी किया था। चूंकि राहुल के वामपंथी तौर-तरीकों से कांग्रेस अपनी मूल विचारधारा तजकर मध्यमार्गीय दल की छवि से पूरी तरह मुक्त होने को है, इसीलिए पुराने कांग्रेसी खुद को हाशिए पर पा रहे हैं।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)






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