निकोलस क्रिस्टोफ। दुनिया भर में अमेरिकी मध्यावधि चुनावों की चर्चा है। माना जा रहा है कि निरंतर बढ़ रही महंगाई और रहन-सहन की बढ़ती लागत इन चुनावों का मुख्य मुद्दा बनने जा रही है। हालांकि दैनिक जीवन से जुड़ी इन चिंताओं एवं चुनौतियों से कहीं अधिक इन चुनावों में अमेरिकी राष्ट्र-राज्य के वे सिद्धांत और रणनीतियां दांव पर होंगी, जिन्होंने कई पीढ़ियों के दौरान अमेरिका को विश्व का सिरमौर बनाया। इस लिहाज से ये मध्यावधि चुनाव एक संभावित ऐतिहासिक मोड़ साबित होने जा रहे हैं। इस संदर्भ में उन पहलुओं पर विचार करना जरूरी है, जो अमेरिका के उत्थान, शक्ति-सामर्थ्य में विस्तार और उसकी अदम्य जिजीविषा को रेखांकित करते हैं।

इस कड़ी में पहला बिंदु आता है शिक्षा एवं अनुसंधान का। अमेरिका ने 19वीं सदी में ही व्यापक सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की मजबूत नींव रखी। इसी नींव के दम पर यहां दुनिया के उत्कृष्ट विश्वविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र आकार लेते गए, जिन्हें राष्ट्रीय धरोहर माना जाता है। इन्हीं संस्थानों ने अपनी क्षमताओं से वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा में अमेरिका को निर्णायक बढ़त दिलाई। इसके बावजूद, अमेरिकी संसद (कांग्रेस) में रिपब्लिकन सांसदों के मौन समर्थन से राष्ट्रपति ट्रंप समूची शिक्षा व्यवस्था को तहस-नहस करने पर आमादा हैं।

ट्रंप शिक्षा विभाग को भंग करने, छात्रों को मिलने वाली वित्तीय सहायता में कटौती करने और नेशनल साइंस फाउंडेशन तथा नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हेल्थ जैसी शीर्ष संस्थाओं के बजट पर कैंची चलाने की कोशिश कर रहे हैं। शीर्ष अमेरिकी शिक्षण संस्थानों के विरुद्ध उनका आक्रामक रुख एक बड़े खतरे की घंटी है। वे कभी इनका अनुदान रोककर, कभी उनकी कर रियायतें खत्म कर, तो कभी विदेशी विद्यार्थियों के प्रवेश नियमों को अत्यंत कड़ा करके इन संस्थानों को हाशिए पर धकेलने की कोशिश में लगे हैं। जानकार इन कदमों को अमेरिका के लिए आत्मघाती मान रहे हैं।

अमेरिका को महान बनाने में प्रवासियों का भी अहम योगदान रहा है, पर ट्रंप उनकी राह में कांटे बिछाने पर तुले हैं। हर दौर में दुनिया के कोने-कोने से आए प्रवासियों ने अमेरिका को समृद्ध बनाया। इनमें से अधिकांश दाने-दाने को मोहताज होकर और बिना अंग्रेजी जाने यहां आए थे, लेकिन महज एक पीढ़ी में ही अपनी मेहनत से उन्होंने अपना सामाजिक-आर्थिक स्तर ऊंचा उठा लिया। खुद मेरे पिता भी 1952 में ऐसी ही परिस्थितियों में अमेरिका आए थे। ज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में यदि आज अमेरिका अग्रणी है, तो इसका एक बड़ा कारण यही रहा कि हम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं और कर्मठ लोगों को यहां आकर्षित करने में सफल रहे। ट्रंप के दौर में यह रुझान कमजोर हो रहा है। अमेरिका आ रहे विदेशी छात्रों की संख्या निरंतर घट रही है।

अमेरिका को सिरमौर राष्ट्र बनाने वाला एक प्रमुख स्तंभ वे अलिखित लोकतांत्रिक मर्यादाएं और स्थापित परंपराएं भी रहीं, जो राजनीति, आर्थिकी और समाज को संचालित करती आई हैं। ट्रंप के उभार से पहले तक मेरा मानना था कि कानून और संविधान ही अमेरिका के मुख्य सुरक्षा-कवच हैं, मगर ट्रंप ने जिस तरह संसद और अदालतों को धता बताते हुए अपनी मनमर्जी चलाई, उससे मैं इस नतीजे पर पहुंचने को विवश हूं कि लोकतंत्र और आर्थिक स्थिरता को टिके रहने के लिए नैतिक परंपराओं की नींव भी उतनी ही आवश्यक है। यहां बात बुनियादी आचार संहिता की है कि राष्ट्रपति जनमत के फैसले को स्वीकार करेंगे, प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध प्रतिशोध की राजनीति नहीं करेंगे और बात-बात पर हर किसी के विरुद्ध गैर-जिम्मेदाराना व्यापार युद्ध शुरू करने से बचेंगे।

निजी लाभ के लिए भी ट्रंप ने सभी सीमाओं को पार कर दिया है। उनके लोभ की कोई सीमा नहीं दिख रही। दोबारा सत्ता में आने के पहले ही साल ट्रंप ने करीब 2.2 अरब डालर कमाए, जिसमें से अधिकांश कमाई उनके परिवार के क्रिप्टो-वेंचर्स से हुई। देखा जाए तो उन्होंने रोजाना 60 लाख डालर से ज्यादा बटोरे। एमेजान द्वारा मेलानिया ट्रंप की डाक्यूमेंट्री के प्रदर्शन अधिकार के लिए कथित रूप से चार करोड़ डालर के भुगतान की खबरों ने मुझे पिछली सदी के अंतिम पड़ाव पर इंडोनेशिया के घटनाक्रम की याद दिला दी, जब वहां के राष्ट्रपति की पत्नी मैडम तिएन अपने भारी कमीशन के चलते 'मैडम टेन (तिएन) परसेंट' के नाम से कुख्यात हो गई थीं।

इस समय व्हाइट हाउस से घनघोर अहंकार, निरंकुश सत्ता और अनैतिक घपलों-घोटालों का जो विचलित करने वाला घटनाक्रम सामने आ रहा है, वह प्रशासन, नागरिक समाज और अर्थव्यवस्था को खोखला ही करने में लगा है। अपने पत्रकारीय जीवन का एक बड़ा हिस्सा मैंने दोयम दर्जे के तमाम तानाशाहों की रिपोर्टिंग में ही बिताया है तो इस कारण यह मेरे लिए अपरिचित नहीं, लेकिन इसे अपने देश में ही घटित होते देखना हृदयविदारक और बेहद गहरी टीस देने वाला है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने स्वयं अपने एवं विश्व समुदाय के लाभ के लिए जो नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था बनाई थी, उसे भी ट्रंप ने ध्वस्त कर दिया। जबकि इस व्यवस्था का उद्देश्य ही समूचे विश्व के लिए शांति, मुक्त व्यापार, आर्थिक संपन्नता और लोक-स्वास्थ्य का संरक्षण करना था। इस नीतिगत विध्वंस का सीधा फायदा महामारियों से बचाव में ढील, भुखमरी-गरीबी और पुतिन जैसे शासकों को मिला है। कल्पना कीजिए कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यदि अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट अपने सबसे विश्वस्त सहयोगी ब्रिटेन की पीठ में छुरा घोंपकर हिटलर के खेमे में जा खड़े होते तो क्या होता? यूक्रेन से मुंह मोड़कर रूस की तरफदारी करने का ट्रंप का यह पैंतरा कुछ ऐसा ही है।

प्रतीत होता है कि ट्रंप के स्तर पर अभी और पतन देखना बाकी है। इस तरह देखें तो चुनावी बिसात में दांव पर लगी वास्तविक चुनौतियां यही हैं। क्या हम चुपचाप अपनी हार स्वीकार कर लेंगे या अपने राष्ट्र को इस पतन से उबारकर वापस पटरी पर लाने का प्रयास करेंगे?

(लेखक न्यूयार्क टाइम्स के स्तंभकार हैं)