विचार: जिम्मेदार नागरिक निर्माण में शिक्षा का महत्व
यह लेख शिक्षा, परिवार और शिक्षकों की जिम्मेदार नागरिक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालता है। नई शिक्षा व्यवस्था को केवल नौकरी के लिए नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन, मूल्यों और राष्ट्र निर्माण के लिए सक्षम नागरिक तैयार करना चाहिए।
HighLights
परिवार की बच्चों में संस्कार डालने में सबसे पहली भूमिका।
शिक्षा का लक्ष्य आत्म-अनुशासन, आंतरिक बोध पैदा करना।
राष्ट्र निर्माण के लिए जिम्मेदार, कर्तव्यनिष्ठ युवा आवश्यक हैं।
दिनेश प्रसाद। बच्चों में संस्कार केवल विद्यालय नहीं डाल सकता। परिवार की भूमिका सबसे पहली है। विद्यार्थी माता-पिता के व्यवहार से सीखता है। यदि घर में दूसरों के प्रति सम्मान है तो विद्यार्थी सम्मान सीखता है। यदि घर में अनुशासन है तो विद्यार्थी अनुशासन सीखता है। यदि घर में केवल अधिकारों की बात होती है और कर्तव्यों की नहीं, तो उसका प्रभाव भी बच्चे पर पड़ता है। विद्यालय इस सीख को व्यवस्थित और व्यापक दृष्टि देता है। शिक्षक केवल विषय का ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं है, वह बच्चों के विचारों को दिशा देने वाला मार्गदर्शक भी है। इसलिए विद्यालय में नागरिक बोध, संवैधानिक मूल्यों, पर्यावरणीय चेतना, डिजिटल नागरिकता, सामाजिक जिम्मेदारी और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवन से जोड़कर समझाना आवश्यक है। नई शिक्षा व्यवस्था के सामने यही बड़ी चुनौती और अवसर है- बच्चे को केवल भविष्य की नौकरी के लिए नहीं, बल्कि भविष्य के नागरिक के रूप में तैयार करना।
आज के संदर्भ में 'नियंत्रण' शब्द को दमन के अर्थ में नहीं, बल्कि आत्मनियंत्रण के अर्थ में समझना होगा। बाहरी नियंत्रण की अपनी सीमा होती है। कानून व्यक्ति को कुछ करने से रोक सकता है, लेकिन हर परिस्थिति में उसके साथ कोई कानून या प्रहरी नहीं हो सकता। वहां व्यक्ति का विवेक और उसका संस्कार ही काम आता है। यही शिक्षा की सबसे बड़ी शक्ति है। जिस युवा में आत्मअनुशासन है, उसे हर कदम पर निर्देश देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। जिसे सही और गलत का बोध है, वह अकेले में भी सही निर्णय लेने का प्रयास करता है।
जिसे अपने कर्तव्य का ज्ञान है, वह केवल दंड के भय से जिम्मेदार नागरिक नहीं बनता। इसलिए शिक्षा का अंतिम लक्ष्य बाहरी अनुशासन नहीं, आंतरिक अनुशासन पैदा करना होना चाहिए। ऐसे में जेन जी और जेन अल्फा के सामने आने वाली दुनिया अवसरों से भरी है, लेकिन चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं। एआइ से रोजगार का स्वरूप बदल रहा है, इंटरनेट मीडिया विचारों को प्रभावित कर रहा है और डिजिटल दुनिया बच्चों के सीखने के तरीके को बदल रही है। ऐसे समय में हमें यह तय करना होगा कि हम अपने बच्चों को केवल तकनीक चलाना सिखाएंगे या तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करना भी सिखाएंगे, केवल अधिकार मांगना सिखाएंगे या कर्तव्य निभाना भी, केवल सफल होना सिखाएंगे या सही बने रहना भी।
वस्तुत: राष्ट्र निर्माण केवल बड़ी परियोजनाओं से नहीं होता। वह करोड़ों नागरिकों के छोटे-छोटे जिम्मेदार व्यवहार से होता है। और इन जिम्मेदार नागरिकों का निर्माण विद्यालय की कक्षाओं, परिवार के संस्कारों और समाज के वातावरण में होता है। लिहाजा अधिकार उन्हें सशक्त बनाएंगे, कर्तव्य उन्हें जिम्मेदार बनाएंगे, संस्कार उन्हें सही दिशा देंगे और मूल्य उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी अपने निर्णय पर टिके रहने की शक्ति देंगे। इन सबको एक सूत्र में पिरोने का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा ही है। क्योंकि अंततः राष्ट्र का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि हमारी अगली पीढ़ी कितनी शिक्षित है, बल्कि इससे तय होगा कि वह अपनी शिक्षा का उपयोग किसके लिए करती है- केवल स्वयं के लिए या समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए। यही वह अंतर है जो एक सक्षम पीढ़ी को एक जिम्मेदार पीढ़ी में बदलता है। और विकसित भारत के लिए हमें केवल सक्षम नहीं, जिम्मेदार, संस्कारित और कर्तव्यनिष्ठ युवा भारत चाहिए।
(लेखक- प्रो. दिनेश प्रसाद सकलानी)






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