कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत अन्य विपक्षी नेताओं की याचिका पर चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल शपथपत्र पर विपक्ष की प्रतिक्रिया उसकी खीझ को ही अधिक प्रकट कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के इस शपथपत्र पर सभी याचिकाकर्ताओं को दस दिन में अपना जवाब दाखिल करने को कहा है, लेकिन इनमें से कुछ ने तुरंत बयान देना जरूरी समझा। इतना ही नहीं, उन्होंने चुनाव आयोग पर यह आरोप भी मढ़ दिया कि उसने भ्रामक तथ्य पेश किए हैं।

कांग्रेस तो एक कदम बढ़कर कोर्ट के बाहर भी चुनाव आयोग के शपथपत्र के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी कर रही है। यह और कुछ नहीं, खुद ही अदालत बनने की हास्यास्पद कोशिश है। लगता है उसे सुप्रीम कोर्ट पर भी यकीन नहीं। आखिर जो मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है, उसका फैसला वही करेगा, न कि याचिका दायर करने वाले।

क्या यह विचित्र नहीं कि विपक्षी दल और विशेषकर कांग्रेस इस मामले में वकील और जज, दोनों की भूमिका निभाने को उतावली है? क्या उसने तय कर लिया है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ भी हो, वह वोट चोरी का अपना राग अलाप कर लोगों को गुमराह करने की कोशिश करती रहेगी? यदि नहीं तो क्या उसे पता नहीं कि चुनाव आयोग के हलफनामे के जवाब में उसे अपनी दलीलें सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखनी हैं, न कि मीडिया के सामने?

वास्तव में विपक्षी दल इसलिए बेचैन हो उठे हैं, क्योंकि चुनाव आयोग ने अपने शपथपत्र में यह कहा कि मतदाता सूचियों के शुद्धीकरण यानी एसआइआर को लेकर सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए और फार्म 6 में कोई वैधानिक बदलाव नहीं किया गया। शपथपत्र यह भी कहता है कि इसे तीनों आयुक्तों की सहमति से तैयार किया गया है और आयोग के अंतिम फैसलों पर उन सभी के हस्ताक्षर होते हैं।

शपथपत्र से यह भी साफ होता है कि किसी आयुक्त द्वारा उठाई गई आपत्ति आयोग का अंतिम औपचारिक फैसला नहीं होता और दोनों चुनाव आयुक्तों ने एक अधिकारी के आंतरिक कार्य आवंटन संबंधी जिस आदेश की शिकायत कैबिनेट सचिव से की थी, उसे कभी लागू ही नहीं किया गया। एक तरह से यह शपथपत्र एक मीडिया रपट की ओर से बनाई गई उस धारणा को ध्वस्त कर रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार दोनों चुनाव आयुक्तों को किनारे कर मनमाने तरीके से फैसले कर रहे हैं।

शायद इसी कारण विपक्ष ऐसी व्यर्थ की बातें कर अपनी बौखलाहट निकाल रहा है कि यह शपथपत्र केंद्र सरकार के दबाव में तैयार किया गया है। एक कांग्रेस सांसद तो यह कह रहे हैं कि यदि सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों ने सहमति से भी लिए हैं तो क्या हम उन्हें मान लेंगे? लगता है वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले को न मानने का मन बना रहे हैं।