विचार: लाइलाज हुई दलबदल की बीमारी
भारतीय राजनीति में दलबदल एक गंभीर समस्या बन गया है, जहां 2022 से अब तक 111 सांसद-विधायक पार्टियां बदल चुके हैं, जो लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है।
HighLights
2022 से 111 सांसद-विधायक दलबदल कर चुके हैं।
एडीआर रिपोर्ट: दलबदल लोकतंत्र को लगातार खोखला कर रहा है।
राजनीतिक दलों में सत्तालोलुपता दलबदल की मुख्य वजह है।
राज कुमार सिंह। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का बिगुल अभी बजा भी नहीं कि उससे पहले नेताओं के दलबदल का सिलसिला चल निकला है। आने वाले दिनों में यह और तेज होगा। यह आंकड़ा विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को शर्मसार करने वाला होना चाहिए कि 2022 से अब तक 111 सांसद-विधायक दलबदल कर चुके हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर किसी चेहरे पर शिकन नजर नहीं आती। एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स यानी एडीआर के उपरोक्त आंकड़े बताते हैं कि राजनीतिक दलों-नेताओं की सत्तालोलुपता अब एक घातक बीमारी बनकर लोकतंत्र को खोखला कर रही है। दलबदल की बढ़ती बीमारी के लिए किसी एक दल को दोष नहीं दिया जा सकता, लेकिन इससे राजनीतिक लाभ उठाने से परहेज भी किसी ने नहीं किया।
भाजपा 12 साल से केंद्र में सत्तारूढ़ है। अधिकांश राज्यों में भी भाजपा या उसके गठबंधन राजग की सरकारें हैं। आम धारणा के अनुसार दलबदल के इस खेल से सर्वाधिक लाभान्वित भाजपा होनी चाहिए, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। अनुपात के स्तर पर पिछले चार साल में दलबदल के खेल से लाभान्वित दलों में भाजपा दूसरे नंबर पर है। इसका सर्वाधिक लाभ नगालैंड में सत्तारूढ़ नगा पीपुल्स फ्रंट यानी एनपीएफ को मिला है, जिसे इस अवधि में 32 विधायक मिले। दूसरे और तीसरे नंबर पर क्रमश: भाजपा और एनसीपीआइ रहीं। नगालैंड में यह खेल एनपीएफ में उससे ही विभाजित होकर बनी नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) के विलय के नाम पर खेला गया।
दलबदल के मामले में बंगाल दूसरे स्थान पर है, जहां 20 सांसदों ने दलबदल किया। विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा की शह पर तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 लोकसभा सदस्यों ने भी अपने दल से किनारा कर सीधे ‘कमल’ का दामन थामने के बजाय अल्पज्ञात एनसीपीआइ जैसा विकल्प चुना। चार राज्यसभा सदस्यों का भी तृणमूल से मोहभंग हो गया। त्रिपुरा में विधानसभा चुनाव लड़कर एक भी सीट न जीत पानेवाली एनसीपीआइ को अचानक 20 लोकसभा सांसद मिल जाना भारतीय लोकतंत्र का ‘करिश्मा’ ही कहा जा सकता है। इन दलबदलुओं पर अयोग्यता की तलवार लटकी है, लेकिन व्यवस्थागत विडंबना देखिए कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद ही लोकसभा अध्यक्ष ने इन्हें कारण बताओ नोटिस दिया।
महीनों पहले दलबदल का सुनियोजित खेल खेल चुके माननीयों को जवाब देने और उसके लिए दस्तावेज एकत्र करने के लिए अतिरिक्त समय देने की ‘उदारता’ भी स्पीकर ने दिखाई। कई बार तो ऐसे मामलों में अंतिम निर्णय संबंधित सदन का कार्यकाल समाप्त होने के बाद आता है। इसी साल आम आदमी पार्टी (आप) के सात राज्यसभा सदस्य भाजपा में शामिल हो गए। आप संयोजक अरविंद केजरीवाल के करीबी रहे और पंजाब के ‘सुपर सीएम’ कहे गए राघव चड्ढा काफी दिनों से बदले-बदले नजर आ रहे थे, लेकिन दलबदल के लिए दो-तिहाई सांसद जुटाने में समय लग गया। वैसे मौजूदा सांसद-विधायक ही नहीं, पूर्व सांसद-पूर्व विधायक या बड़े नेताओं का दिल बदलने का पता भी दूसरे दल का पटका गले में पहनने के बाद ही चलता है। नेताजी इस अवसरवाद को अक्सर देश, समाज और लोकतंत्र के हित में ‘जरूरी’ करार देते हैं।
वर्ष 2014 में केंद्रीय सत्ता से विदाई और ऐतिहासिक चुनावी पराभव के बाद दल बदलने वाले कांग्रेसियों की संख्या राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे हजारों में बताते हैं। नेहरू-गांधी परिवार के करीबी बताए जाने वालों ने भी मुश्किल वक्त में ‘हाथ’ का साथ छोड़ने में संकोच नहीं किया। इस सूची में ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और आरपीएन सिंह, मिलिंद देवड़ा, अशोक चव्हाण और सुरेश पचौरी जैसे नाम शामिल हैं। पीढ़ियों से कांग्रेसी रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री तक हाथ का साथ छोड़ने लगे, तब अवसरवाद के जरिये विचारधारा की विपन्नता ही बेनकाब होती है। जिस दल में गए, उससे भी यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ की राजनीति करनेवाले ये ‘भ्रष्ट’ कांग्रेसी पटका बदलने भर से ‘राष्ट्रवादी’ बन गए या फिर खुद उसने सत्ता की खातिर विचारधारा को तिलांजलि दे दी? जब भी किसी बड़े नेता ने पार्टी छोड़ी तो कांग्रेस ने बताया कि उसे क्या-क्या दिया गया।
सवाल अनुत्तरित है कि जो कुछ उन्हें दिया गया, क्या वे उसके लायक थे या नहीं? ये सवाल तब और महत्वपूर्ण हो जाते हैं, जब आंकड़े बताते हैं कि 2014 के बाद दलबदल करने वाले कांग्रेसियों में लगभग 35 प्रतिशत तो सांसद-विधायक ही शामिल रहे। इनमें से 35 प्रतिशत विधायक भाजपा में गए। कांग्रेस के लगभग 20 प्रतिशत चुनावी उम्मीदवारों ने भी पार्टी छोड़ी। तथ्य यह भी है कि कांग्रेस छोड़ने वाले सभी नेता भाजपा में नहीं गए। महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुष्मिता देव और फिल्म अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने तृणमूल कांग्रेस चुनी। शत्रुघ्न अभी तृणमूल में ही हैं, मगर सुष्मिता का नया ठिकाना एनसीपीआइ है। भाजपा पर अपने नेताओं को तोड़ने के आरोप लगाने वाली कांग्रेस भी दूसरे दलों के नेताओं को लेती रही है। महाराष्ट्र कांग्रेस के बड़े नेता नाना पटोले पूर्व भाजपाई हैं। भाजपा में वापस लौट आए कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार को भी कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव तो लड़वाया ही।
दरअसल राजनीति में सत्तालोलुपता एक वास्तविकता बन गई है। ज्यादातर नेता सिर्फ सत्ता में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हिस्सेदारी के आश्वासन अथवा फिर उसकी संभावना पर ही दलबदल या पालाबदल करते हैं, जैसे कि महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे एंड कंपनी या अजीत पवार खेमे ने किया। वैसे, बड़े नेताओं के दलबदल की चर्चा तो अक्सर होती रहती है, लेकिन अब यह बीमारी स्थानीय निकाय से लेकर विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनावों तक फैल गई है। स्पष्ट है कि जब तक राजनीतिक दल तात्कालिक लाभ के लिए दलबदलुओं पर दांव लगाते रहेंगे, दलबदल की बीमारी राजनीतिक व्यवस्था और लोकतंत्र को खोखला करती रहेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)











