संजय गुप्त। हाल में पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो और फिर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के प्रति जो नरमी दिखाई, वह इसी बात की पुष्टि करती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राष्ट्रीय हित सबसे अधिक महत्व रखते हैं। ट्रंप का यह कहना उल्लेखनीय तो है कि वे भारत से व्यापार समझौता करने के काफी करीब हैं और यह अलग किस्म का समझौता होगा, लेकिन आखिर उन पर कितना भरोसा किया जाए, क्योंकि वे पहले भी ऐसा कह चुके हैं। ट्रंप की नीतियां अनिश्चितता का परिचायक हैं।

वे कभी किसी देश और यहां तक सहयोगी देशों पर भी भारी टैरिफ या प्रतिबंध लगाने की धमकी देते हैं और फिर अपनी बात और फैसलों से पलट जाते हैं। उनके इस अस्थिर रवैये का सामना भारत भी करता आ रहा है, लेकिन भारत ने उनकी उलटी-सीधी बयानबाजी पर सदैव संयम और दृढ़ता दिखाने के साथ ही उनके दबाव में आने से इन्कार किया। ऐसा करके उसने अमेरिका और विश्व को यही संदेश दिया कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए किसी के दबाव में आने वाला नहीं है।

इसका बड़ा प्रमाण यह है कि भारत ने अमेरिका के इस दबाव के आगे झुकने से इन्कार किया कि वह रूस से तेल न खरीदे। इस मामले में भारत ने अमेरिकी धमकियों के जवाब में यही दोहराया कि वह अपने ऊर्जा हितों के लिए जो संभव है, वह करेगा। इसके बाद भी हमारे कुछ विपक्षी नेता और खासकर राहुल गांधी ने यह शोर मचाना नहीं छोड़ा कि मोदी सरकार ट्रंप के आगे नतमस्तक है अथवा उनके दबाव में है। पता नहीं अब वे क्या कहेंगे?

ट्रंप का यह कहना सकारात्मक अवश्य है कि वे भारत से व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने वाले हैं। उनके विदेश मंत्री का यह कहना भी महत्वपूर्ण है कि भारत रिफाइनिंग क्षेत्र की महाशक्ति है, पर इसका अर्थ अमेरिका का भारत के प्रति अचानक उदार हो जाना नहीं, बल्कि उसका ऊर्जा संकट से घिर जाना और उसके हल में भारत का मददगार दिखना है। चंद दिन पहले जो अमेरिका एक खास कानून बनाकर रूस से तेल खरीद के कारण भारत समेत पांच देशों पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने वाला था, उसने यकायक अपने कदम पीछे खींच लिए। इसका कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहराते ऊर्जा संकट में छिपा है।

ईरान के साथ अमेरिका के टकराव और यूक्रेन की ओर से रूस के तेल स्रोतों पर हमले से उत्पन्न ऊर्जा संकट ने अमेरिका सहित विश्व भर की चिंताएं बढ़ा दी हैं। कच्चे तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन गई है और वह भी ऐसे समय, जब वहां मध्यावधि चुनाव होने जा रहे हैं। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें भी ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट का कारण बन रही हैं। ऊर्जा संकट का सामना कर रहे अमेरिका ने यह पाया कि भारत इस संकट से उसे और विश्व को भी राहत दिला सकता है। उसे यह अहसास इसलिए हुआ, क्योंकि भारत की रिफाइनरियां कच्चे तेल का बड़े पैमाने पर शोधन कर सकती हैं।

इसी कारण भारत यूरोप समेत कई देशों को शोधित तेल का निर्यात कर रहा है। भारत से शोधित तेल खरीदने वाले देशों में रूस भी शामिल है। अमेरिका चाहता है कि भारत उसके आधिपत्य वाले वेनेजुएला के तेल स्रोतों से अधिकाधिक कच्चा तेल खरीदकर उसे शोधित कर उसका निर्यात करे। वेनेजुएला का कच्चा तेल कहीं अधिक गाढ़ा है। इसके शोधन की क्षमता बहुत कम देशों के पास है। भारत की कई रिफाइनरियां वेनेजुएला के गाढ़े कच्चे तेल का शोधन करने में सक्षम हैं। तथ्य यह भी है कि जहां अमेरिका में वर्षों से कोई नई रिफाइनरी नहीं लगी, वहीं यूरोपीय देशों ने अपनी कई रिफाइनरियां बंद कर दी हैं। ऐसे में अमेरिका समेत अन्य देशों की निगाह भारत की ओर है।

यदि भारत वेनेजुएला के ज्यादा से ज्यादा कच्चे तेल का शोधन करने लगता है तो शोधित तेल की वैश्विक आपूर्ति बढ़ सकती है। इसीलिए अमेरिकी विदेश मंत्री ने खास तौर पर जामनगर जाकर रिलायंस रिफाइनरी का दौरा किया। अब जब यह स्पष्ट है कि अमेरिका अपने ऊर्जा हितों की रक्षा के लिए भारत की ओर देख रहा है, तब भारत को उससे व्यापार समझौता करते समय अपने हितों की रक्षा के लिए और दृढ़ता दिखानी होगी। भारत की सफलता अमेरिका से व्यापार समझौता होने से नहीं, बल्कि इससे तय होगी कि इस समझौते की शर्तें कितनी अनुकूल हैं।

भारत को अमेरिकी शर्तों का मूल्यांकन अपने हितों के आधार पर करते हुए उसके समक्ष यह स्पष्ट करना होगा कि यदि वेनेजुएला का तेल प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध होगा, तभी वह उसका अधिक मात्रा में शोधन करेगा। यदि अमेरिका चाहता है कि भारत उसके ऊर्जा हितों की रक्षा में सहायक बने तो उसे भी भारतीय हितों की रक्षा के प्रति संवेदनशील होना होगा। इसकी अनदेखी न की जाए कि अमेरिका की मनचाही शर्तों के कारण ही महीनों की बातचीत के बाद भी व्यापार समझौता नहीं हो सका है। अमेरिका से व्यापार समझौते में भारतीय उद्योगों, किसानों, सेवा क्षेत्र और दीर्घकालिक आर्थिक हितों की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है।

अमेरिका के बदले रवैये को भारत को अपने लिए एक कूटनीतिक अवसर के रूप में देखना चाहिए। चूंकि ट्रंप स्वयं को एक कुशल सौदेबाज मानते हैं, इसलिए भारत को भी यह दर्शाना होगा कि उसका उद्देश्य उससे ऐसा व्यापार समझौता करना है, जो दोनों पक्षों के लिए समान रूप से लाभकारी हो। अंतरराष्ट्रीय समझौते इसी भावना के तहत होते हैं। भारत को इसलिए अडिग रहना होगा, क्योंकि अमेरिकी प्रशासन की नीतियां बदलती रहती हैं।

चूंकि दोनों देशों के बीच प्रौद्योगिकी, रक्षा, निवेश, व्यापार और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग के मजबूत आधार हैं, इसलिए भारत को एक ओर अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मजबूत बनाए रखना है तो दूसरी ओर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और आर्थिक हितों की रक्षा भी करनी है। ट्रंप का बदला रुख स्वागतयोग्य है, लेकिन उन पर न तो आंख मूंदकर भरोसा किया जा सकता है और न ही केवल उनके मन मुताबिक समझौता किया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में किसी नेता पर भरोसा महत्वपूर्ण तो है, परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है, उसके देश से दीर्घकालिक रिश्ते और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा।

sanjay gupta sir

(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)