विचार: अमेरिका में बढ़ता हिंदूफोबिया
अमेरिका में भारतीय-अमेरिकी समुदाय के खिलाफ बढ़ती नफरत और हिंदू मंदिरों पर हमलों की घटनाओं पर चिंता व्यक्त की गई है
HighLights
अमेरिका में भारतीय-अमेरिकी समुदाय के खिलाफ नफरत बढ़ रही है।
हिंदू मंदिरों पर हमले और तोड़फोड़ की घटनाएं चिंताजनक हैं।
हिंदूफोबिया को यहूदी-विरोध की तरह गंभीरता से लेना चाहिए।
विकास सारस्वत। हाल में भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने अमेरिका में भारतीयों के खिलाफ नस्ली नफरत से जुड़े सवाल पर यह कहकर किनारा किया कि हर देश में कुछ मूर्ख लोग होते हैं, पर पिछले दिनों वहां इलिनाय के आरोरा में श्री वेंकटेश्वर स्वामी यानी बालाजी मंदिर को निशाना बनाने वाले एक षड्यंत्र का जो भंडाफोड़ हुआ, उससे साफ होता है कि हालात कुछ और हैं।
इस षड्यंत्र का आरोपित एलेक्जेंड्रोस पापोरकिस भारतीय-अमेरिकी समुदाय के एक बड़े धार्मिक आयोजन को निशाना बनाने के लिए योजना बन रहा था। वह राइफल से लैस होकर मंदिर पहुंचा, पर वह जाम हो गई। वह दोबारा मंदिर जाकर हमले की तैयारी में था। उसके घर से एक श्वेत वर्चस्ववादी घोषणापत्र और नाजी सामग्री बरामद हुई। यह प्रकरण उस भयावह प्रवृत्ति का एक नमूना है, जिसके प्रति भारतीय-अमेरिकी समुदाय लंबे समय से चेतावनी देता आ रहा है।
आरोरा की घटना पहली वारदात नहीं है। पिछले वर्ष स्पेनिश फोर्क, ऊटा के इस्कान मंदिर में गोलीबारी हुई थी। अमेरिका में लंबे समय से हिंदू घृणा के संकेत सामने आ रहे हैं। न्यूयार्क के मेलविले स्थित स्वामीनारायण मंदिर में तोड़फोड़ हो या फिर कैलिफोर्निया के फ्रीमोंट और हेवर्ड मंदिरों पर हिंदू-विरोधी नारे लिखना, अमेरिका में हिंदुओं को डराना-धमकाना चिंताजनक रूप से सामान्य हो गया है। ये घटनाएं वहां के सबसे शांतिप्रिय प्रवासी समुदाय के खिलाफ बढ़ती नफरत का रूप ले चुकी हैं।
इन घटनाओं की रिपोर्टिंग का तरीका भी चिंतनीय है। जहां अमेरिकी नेता और मीडिया अन्य समूहों के प्रति पंथिक और नस्ली घृणा की निंदा करने में तुरंत आगे आते हैं, वहीं हिंदू संस्थानों पर होने वाले हमलों पर शायद ही कभी वैसा रोष देखने को मिलता हो। जो इस्लामिक कट्टरता स्पष्ट रूप से मजहबी कारकों से प्रेरित है, उस पर चर्चा तक को 'इस्लामोफोबिया' कह कर रोक दिया जाता है, पर हिंदू घृणा का सामान्यीकरण हो चुका है। हिंदू मंदिरों पर हमलों पर आधिकारिक बयान अक्सर उन्हें छिटपुट घटना बताते हैं।
अमेरिका के नागरिक अधिकार प्रतिष्ठानों की शब्दावली से 'हिंदूफोबिया' शब्द नदारद है। इसका एक बड़ा कारण यह भ्रम है कि सामाजिक-आर्थिक सफलता किसी अल्पसंख्यक समूह को पूर्वाग्रह से बचा लेती है। लगभग हर पैमाने पर हिंदू-अमेरिकी अमेरिका में सबसे सफल समूहों में से हैं। आंकड़े और अध्ययन यह दिखाते हैं कि भारतीय अमेरिकियों की औसत आय, शैक्षणिक योग्यता और चिकित्सा, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्र में पेशेवर प्रतिनिधित्व देश में अग्रणी है। अपराधों में उनकी संलिप्तता का स्तर भी बहुत कम है।
आर्थिक अनिश्चितता और राजनीतिक लोकलुभावनवाद के दौर में असाधारण सफलता दबी हुई कुंठाओं और ईर्ष्या को जन्म दे सकती है। दक्षिणपंथी “मागा” वालों की बयानबाजी में उच्च कौशल वाले प्रवासियों की सफलता को आर्थिक खतरे और सांस्कृतिक विस्थापन के चश्मे से देखा जाने लगा है। इससे खास तौर पर अमेरिकी हिंदुओं के खिलाफ स्थानीय लोगों की नाराजगी भड़कती है। हिंदुओं की सफलता उनका सुरक्षा कवच बनने के बजाय शत्रुता का कारण बन रही है। आर्थिकी से उत्पन्न ईर्ष्या के साथ एक पुराना और गहरा सांस्कृतिक पूर्वाग्रह भी घृणा का कारण है।
आधुनिक और परिष्कृत जीवनशैली के आवरण के पीछे अमेरिकी समाज के एक वर्ग में बहुईश्वरवाद और मूर्ति पूजा के प्रति द्वेष स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह पूर्वाग्रह मंदिर निर्माणों के खिलाफ होने वाले विरोध और हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को 'डरावना' बताने में खुलकर सामने आता है। टेक्सास के शुगरलैंड में भगवान हनुमान की 90 फीट ऊंची प्रतिमा का विरोध तो अपने चरम पर पहुंच गया था। बहुईश्वरवाद के प्रति घृणा ही उस दोहरे रवैये को जन्म देती है, जिसके चलते अमेरिकी समाज कट्टर इस्लामी मान्यताओं के प्रति तो कुछ नरमी बरतता है, पर हिंदुओं के प्रति किसी तरह की सहानुभूति दिखाने से कतराता है।
भारतीय मूल के रूढ़िवादी ईसाई टिप्पणीकारों ने पश्चिमी पादरियों के पूर्वाग्रहों को हवा देकर इस माहौल को और जहरीला बनाया है। अमेरिकी मुख्यधारा की राजनीति भी इस पंथिक संकीर्णता से अछूती नहीं। चुनावी दौर में कई रिपब्लिकन समर्थकों ने विवेक रामास्वामी से हिंदू होने को लेकर सवाल पूछे। ऐसी अभद्रता तो भारतीय राजनीति में भी नहीं दिखती। इसी तरह जेडी वेंस की पत्नी उषा वेंस को ईसाइयत न अपनाने पर भी कठघरे में खड़ा किया गया। स्थिति विकट बनाने में शैक्षणिक और मीडिया हलकों की भी खासी भूमिका है।
विश्वविद्यालय परिसरों और राजनीतिक संगोष्ठियों में भारतीय शासन पर होने वाली आलोचना प्रायः हिंदू विरोध में बदल जाती है। डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व जैसे आयोजनों के माध्यम से कुछ शिक्षाविदों ने विश्वविद्यालय को हिंदू विरोध का मंच बना दिया। जब हिंदू छात्र या पेशेवर लोग अपनी विरासत का बचाव करने का प्रयास करते हैं तो उन पर कट्टरवादी होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट जैसे समाचार पत्र भारत की नीतियों का विरोध हिंदू विरोधी कार्टून और रूपकों के माध्यम से करते रहे हैं।
अमेरिका में पाकिस्तानी, बांग्लादेशी एवं खालिस्तान समर्थकों ने भी आनलाइन सक्रियता से हिंदुओं के प्रति द्वेष भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। डिजिटल मीडिया के एल्गोरिदम ने इस आग को और भड़काया है। हिंदू धर्म के प्रति कम जानकारी होने से अमेरिकी जनता ऐसे समन्वित डिजिटल अभियानों से प्रभावित होती है। इसी कारण भारतीय हिंदू समुदाय कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। चूंकि हिंदू समुदाय कमजोर अल्पसंख्यक के पारंपरिक पश्चिमी खांचे में फिट नहीं बैठता, इसलिए उसकी चिंताओं को अनदेखा किया जाता है।
इलिनाय की घटना दर्शाती है कि हिंदू घृणा या हिंदूफोबिया के प्रति उदासीनता छोड़ इस प्रवृत्ति को यहूदी-विरोध यानी एंटी-सेमिटिज्म की तरह गंभीरता से लिया जाए, अन्यथा यहूदी-द्वेष की तर्ज पर कोई बड़ी त्रासदी भयावह इबारत लिखेगी, जिसका कलंक उस अमेरिका को भुगतना पड़ेगा, जो दुनिया भर को मानव अधिकारों की दुहाई देता है।
(लेखक गंगा शोध केंद्र के निदेशक हैं)







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