फार्मा कंपनियों की अनैतिक गतिविधियां विश्व भर में चिंता का कारण हैं। इन कंपनियों के अनुचित तौर-तरीके भारत में भी चर्चा के केंद्र में आते रहे हैं। कुछ समय पहले एक याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से फार्मा कंपनियों के अनैतिक आचरण पर रोक लगाने की जो मांग की गई थी, उसके चलते सरकार ने इन कंपनियों की मार्केटिंग संबंधी रीति-नीति तय करने के लिए तीन सदस्यों वाली समिति गठित करने का फैसला लिया। यह समिति दो माह में अपनी रिपोर्ट देगी।

यह पहली बार नहीं, जब सुप्रीम कोर्ट ने फार्मा कंपनियों के उन तौर-तरीकों को गंभीरता से लिया हो, जिनके चलते लोगों को महंगी दवाएं खरीदने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कुछ ही समय पहले उसने सवाल किया था कि आखिर 27 सौ की किसी दवा की कीमत मरीज तक पहुंचते-पहुंचते 27 हजार की कैसे हो जाती है? सुप्रीम कोर्ट ने इसे डकैती की संज्ञा दी थी। इस डकैती के मूल में फार्मा कंपनियों के अनैतिक तरीके और उनकी बेलगाम मुनाफाखोरी है। इसमें कुछ डाक्टर, निजी अस्पताल भी भागीदार बनते हैं और इसकी कीमत चुकाते हैं आम लोग।

फार्मा कंपनियों के अनुचित-अनैतिक तरीकों पर रोक लगाने के लिए सरकार ने कुछ समय पहले दिशानिर्देश जारी किए थे, जैसे कि ये कंपनियां डाक्टरों को महंगे उपहार या नकदी नहीं दे सकतीं, मनोरंजन या सेमिनार के नाम पर देश-विदेश की सैर नहीं करा सकतीं। इसके अतिरिक्त दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के उपाय करने और आधिकारिक अनुमति के पहले किसी दवा का प्रचार न करने के भी निर्देश दिए गए थे, लेकिन इन निर्देशों का कोई असर नहीं हुआ।

कुछ डाक्टरों-निजी अस्पतालों और फार्मा कंपनियों का अनैतिक गठजोड़ टूटा नहीं। इसके नतीजे में जेनरिक दवाओं का अपेक्षित प्रचार-प्रसार भी नहीं हो पाया। इन सबका दुष्परिणाम आम लोग उठा रहे हैं। वे स्वास्थ्य रक्षा के लिए डाक्टरों की लिखी महंगी दवा खरीदते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वह दवा उनकी सेहत में सुधार करे ही। कई बार ब्रांडेड यानी महंगी दवा का मतलब अच्छी गुणवत्ता वाली दवा नहीं भी होता।

इससे खराब बात और कोई नहीं हो सकती कि फार्मा कंपनियों की अनैतिकता के चलते लोगों की जेब तो हल्की हो ही, उनकी सेहत भी न सुधरे। यह एक तथ्य है कि अपने देश में प्रायः अनेक दवाओं की गुणवत्ता दोयम दर्जे की पाई जाती है। इसका मतलब है कि जिन नियामक-निगरानी संस्थाओं पर दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने और साथ ही उनके मूल्यों का उचित निर्धारण करने की जिम्मेदारी है, वे अपना काम सही ढंग से नहीं कर पा रही हैं। ऐसे में जो समिति गठित होने जा रही है, उसकी सिफारिशों को वैधानिक रूप दिया जाए, ताकि फार्मा कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगे।