विराग गुप्ता। शरद पूर्णिमा को भारत रत्न नानाजी देशमुख की जयंती समारोह का आयोजन हो रहा है। देश की वर्तमान चुनौतियों से निपटने के लिए समाज, सरकार, विपक्ष और उद्योगपति नानाजी के व्यक्तित्व और कृतित्व से प्रेरणा ले सकते हैं। जेन-जी के आंदोलन और सड़कों पर हो रहे विरोध प्रदर्शन की सर्वाधिक चर्चा है। नानाजी ने जेपी के साथ मिलकर आपातकाल के खिलाफ युवाओं के सबसे बड़े आंदोलन से सत्ता परिवर्तन को सफल बनाया था। जनता पार्टी की सरकार में उन्होंने मंत्री पद लेने से इनकार करने के बाद सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया था। चित्रकूट में दीनदयाल शोध संस्थान और ग्रामोदय विश्वविद्यालय के माध्यम से उन्होंने गांवों के सशक्तीकरण से विकसित भारत का रोडमैप बनाया था। उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित 80 गांवों को मुकदमेबाजी से मुक्त देखकर पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम बहुत प्रभावित हुए थे। उनके अनुसार पिछली सदी के आठवें दशक के बाद मानवीय स्पर्श से जुड़ी सामाजिक व्यवस्था कमजोर होने के साथ अदालतों में मुकदमेबाजी बढ़ गई।

वर्ष 2006 में भारत की आबादी लगभग 117 करोड़ थी और अदालतों में 2.87 करोड़ मुकदमे लंबित थे। उसके 20 साल बाद आबादी लगभग 25 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन मुकदमों की संख्या 5.84 करोड़ यानी दोगुनी से ज्यादा हो गई है। मुकदमों की बढ़ती संख्या से तीन निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहला, सरकारी अधिकारी अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में विफल हैं, जिसकी वजह से न्यायपालिका की भूमिका बढ़ती जा रही है। दूसरा, पुलिस सुधार नहीं होने से गिरफ्तारी और जमानत से जुड़े मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। तीसरा, संविधान लागू होने के 76 साल बाद भी न्यायिक व्यवस्था में जरूरी सुधार नहीं हुए। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल के अनुसार मुकदमेबाजी के बढ़ते बोझ से उत्पादकता घटने के साथ विदेशी निवेश भी प्रभावित होता है। केंद्र सरकार ने जनविश्वास कानून के माध्यम से अनेक अपराधों को अनापराधिक बनाने के साथ तीन नए आपराधिक कानूनों को लागू किया है। डिजिटल दुनिया में संवाद, संचार, भुगतान, व्यापार सभी कुछ तेजी से हो रहा है, लेकिन हमारी न्यायिक व्यवस्था अभी भी कछुए की रफ्तार से आगे बढ़ रही है। सड़कों पर बढ़ रही अराजकता और अदालतों में हावी हो रहे भीड़तंत्र को रोकने के लिए पुलिस और न्यायिक सुधार जरूरी हैं।

चीन से बढ़ते आयात और अमेरिका के दबाव से स्वदेशी अर्थव्यवस्था पर बेहद दबाव है। गांवों को विवादों से मुक्त कराने के साथ नानाजी ने शिक्षा, स्वास्थ्य और कुटीर उद्योगों के विकास से आत्मनिर्भरता बढ़ाने के प्रकल्पों को सशक्त किया था। इसके लिए उन्होंने स्वदेशी पूंजी, ग्रामीण श्रम, आधुनिक विज्ञान और जनसहयोग को परस्पर जोड़ने का यत्न किया था। चार दशक पहले उन्होंने उद्योगपतियों को बुदेलखंड के चित्रकूट जैसे पिछड़े क्षेत्र में निवेश और आधुनिक तकनीक लाने के लिए प्रेरित किया। नानाजी ने देश के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय का नाम महात्मा गांधी के नाम पर रखा। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़कर उन्होंने भूमिहीनों और वंचित वर्ग का सशक्तीकरण किया। जयप्रकाश नारायण और उनकी पत्नी प्रभावती के नाम से गोंडा में उन्होंने जयप्रभा ग्राम का नामकरण किया। उनका बचपन भुखमरी और संघर्षों में बीता, पर वे हिंसक और माओवादी नहीं बने। जन-आंदोलनों से चुनावी राजनीति और सत्ता परिवर्तन के बारे में नानाजी की सफलता से सभी दलों के नेता प्रेरणा ले सकते हैं।

वर्ष 2017 में नानाजी की स्मृति में जारी डाक टिकट के अनुसार समाज में परस्पर सहयोग से ही ग्रामोदय हो सकता है। वंचित वर्ग के लिए सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाएं जरूरी हैं, लेकिन चुनावी लाभ के लिए रेवड़ियां और स्वावलंबन के बजाय रीलबाजी की बढ़ती संस्कृति विकसित भारत की राह में बड़ा रोड़ा है। भारत की शासन व्यवस्था में विदेशी ताकतों के हस्तक्षेप को कम करने के लिए एफसीआरए कानून को सख्त बनाया जा रहा है, लेकिन विदेशी सोशल मीडिया कंपनियों के माध्यम से चुनावी राजनीति और जन-आंदोलनों को संचालित करने से रोकने के लिए कानूनों को लागू नहीं किया जा रहा है। सोशल मीडिया और आनलाइन गेमिंग से बच्चों की सुरक्षा और ई-कामर्स के फास्टफूड के दौर में उनका खानपान स्वस्थ रखना परिवारों के लिए बड़ी चुनौती है, जिस पर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। यूपीआई, ओटीटी, ई-कॉमर्स, सीसीटीवी, स्पेस सैटेलाइट जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विदेशी कंपनियों का वर्चस्व चिंताजनक है। डाटा सेंटरों से पर्यावरण क्षति के बारे में भी सही विमर्श और कानूनों का अनुपालन जरूरी है। डाटा सुरक्षा कानून लागू नहीं होने और भारी मुनाफा कमा रही विदेशी टेक कंपनियों से टैक्स नहीं वसूलने से साइबर अपराधों के साथ आर्थिक असमानता बढ़ रही है। नानाजी ने चुनावी राजनीति से सत्ता परिवर्तन के बाद यह महसूस किया कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए गांव और समाज को सशक्त करना जरूरी है। संविधान और कानून के शासन में जेन-जी के भरोसे को बनाए रखने के लिए नानाजी के सपनों के अनुसार न्यायिक तंत्र में जमीनी सुधार की जरूरत है।

(लेखक विधि मामलों के जानकार हैं)