विचार: सही इतिहास लेखन की जरूरी पहल
एनसीईआरटी की नई सामाजिक विज्ञान पाठ्यपुस्तक भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की महत्वपूर्ण पहल है, जो उपेक्षित राजवंशों और सांस्कृतिक प्रतिरोध को स्थान देती है
HighLights
एनसीईआरटी की नई पुस्तक भारतीय इतिहास का समग्र पुनर्लेखन।
उपेक्षित भारतीय राजवंशों और सांस्कृतिक प्रतिरोध पर विशेष ध्यान।
वामपंथी इतिहासकारों के पूर्वाग्रही नैरेटिव को सशक्त चुनौती।
प्रणय कुमार। हाल में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने कक्षा नौ की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक ‘अंडरस्टैंडिंग सोसायटी एंड बियांड, भाग-2’ जारी की। यह इतिहास के पुनर्पाठ और पुनर्लेखन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। यह दिल्ली-केंद्रित इतिहास से बाहर निकलकर भारत की ऐतिहासिक परंपराओं, उपेक्षित राजवंशों और सांस्कृतिक प्रतिरोध की गाथाओं को स्थान देती है।
कथित ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के नाम पर इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में दिल्ली सल्तनत के गुलाम, खिलजी, तुगलक, सैयद और लोदी वंशों तथा मुगलों को अधिक स्थान मिलता रहा, जबकि अहोम, मेवाड़, मराठा और विजयनगर जैसे साम्राज्यों को क्षेत्रीय इतिहास कहकर सीमित कर दिया गया।
जिस अहोम साम्राज्य ने छह शताब्दियों तक स्वतंत्रता बनाए रखी, जिस मेवाड़ ने स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया, जिस मराठा शक्ति ने मुगल साम्राज्य के पतन में भूमिका निभाई और जिस विजयनगर साम्राज्य ने दक्षिण भारत में कला, साहित्य और स्थापत्य को समृद्ध किया, उन्हें इतिहास में अपेक्षित स्थान क्यों नहीं मिला? चोल, चालुक्य, पाल, प्रतिहार, राष्ट्रकूट और काकतीय राजवंशों की उपेक्षा क्यों हुई?
भारत का इतिहास केवल विदेशी आक्रमणों और पराजयों का वृत्तांत नहीं है। यह हजार वर्षों तक चले संघर्ष, प्रतिरोध, बलिदान और सांस्कृतिक स्वाभिमान की गाथा भी है। जिस इस्लामी आक्रमण की आंधी ने पश्चिम एशिया की प्राचीन सभ्यताओं के राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वरूप को बदल दिया, उसके सामने भारत ने अपनी सभ्यतागत निरंतरता कैसे बनाए रखी? इसके पीछे हमारी सामरिक शक्ति, सामाजिक संरचना, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक प्रतिरोध की कौन-सी धाराएं सक्रिय थीं?
इन प्रश्नों का उत्तर तलाशना इतिहास लेखन का अनिवार्य दायित्व है। अपने गौरव, संघर्ष और स्वाभिमान को इतिहास में स्थान देना आखिर अनुचित कैसे हो सकता है? नई पुस्तक में महाराणा प्रताप, दिवेर का युद्ध, सरायघाट में लचित बरफुकन के नेतृत्व में मुगलों की पराजय, मराठों के स्वराज और सिख गुरुओं के बलिदान इसी दृष्टि को पुष्ट करते हैं। रानी नायकी देवी, रानी रुद्रमा देवी और रानी अब्बक्का की वीरता का उल्लेख बताता है कि विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक विस्तार के विरुद्ध हमारी महिलाओं ने भी अदम्य साहस का परिचय दिया।
हर बार की तरह वामपंथी इतिहासकारों को इस नई पुस्तक में सम्मिलित कथ्यों और तथ्यों से भी आपत्ति है, क्योंकि ये उनके नैरेटिव को चुनौती देते हैं। विडंबना देखिए कि इन वामपंथी इतिहासकारों द्वारा जहां एक ओर रामायण और महाभारत को गल्प बताने, पुराणों को इतिहास न मानने और भारतीय ज्ञान-परंपरा को कालबाह्य सिद्ध करने का पुरजोर प्रयास होता है तो दूसरी ओर अपनी वैचारिक सुविधा के अनुसार साहित्यिक संदर्भों को ऐतिहासिक प्रमाण बनाकर प्रस्तुत किया जाता है।
यही दोहरापन देवी दंतेश्वरी, देवी भवानी और अन्य धार्मिक परंपराओं से जुड़ी तलवारों के उल्लेख पर भी दिखाई देता है। बस्तर के राजा, विजयनगर के कुमार कंपन और छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़ी ऐसी परंपराओं को अंधविश्वास कहकर खारिज करने वाले वामपंथी भूल जाते हैं कि इतिहास केवल युद्धों, संधियों और राजवंशों का विवरण नहीं, बल्कि उन आस्थाओं और प्रतीकों का अध्ययन भी है, जिन्होंने समाज को संघर्ष की प्रेरणा दी।
इसे दोहरेपन की पराकाष्ठा ही कहेंगे कि जहां यूरोपीय परंपरा में जान आफ आर्क की धार्मिक प्रेरणा अथवा राजा आर्थर की तलवार एक्सकैलिबर से जुड़ी किंवदंतियों का अध्ययन सांस्कृतिक विरासत के रूप में किया जा सकता है, वहीं भारतीय इतिहास में मां दुर्गा, काली और भवानी से जुड़ी आस्था का उल्लेख अवैज्ञानिकता बन जाता है।
नई पुस्तक मंदिरों के विध्वंस के साथ उनके पुनर्निर्माण को भी सामने लाती है। राजा टोडरमल, राजा मान सिंह और देवी अहिल्याबाई होलकर के योगदान से स्पष्ट होता है कि मंदिरों का पुनर्निर्माण केवल स्थापत्य का पुनरुद्धार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता और सामूहिक आस्था की पुनर्प्रतिष्ठा भी था। सूरदास, तुलसीदास, कबीर और मीराबाई जैसे संतों तथा चैतन्य महाप्रभु के आंदोलन ने कठिन परिस्थितियों में सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखा। जब आस्था के केंद्रों पर संकट था, तब भक्ति की धारा ने जनमानस को जोड़े रखा।
यह भी प्रतिरोध था, जिसे इतिहास से अलग करके नहीं देखा जा सकता। यह पुस्तक भारतीय शासन-परंपराओं, प्राचीन गणराज्यों, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और भारतीय ग्रंथों में निहित विचारों को आधुनिक लोकतंत्र तथा संवैधानिक व्यवस्था से जोड़ती है। ‘सत्यमेव जयते’ जैसे प्रतीक और संसद के नए भवन में स्थापित सेंगोल का उल्लेख इसी दृष्टि का उदाहरण है। यह पुस्तक इतिहास के एकपक्षीय आख्यान को व्यापक बनाने का प्रयास करती है।
वामपंथी इतिहासकारों ने दशकों तक जिन प्रश्नों को हाशिये पर रखा, उन्हें सामने लाना आवश्यक था। एनसीईआरटी ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है। इतिहास का उद्देश्य किसी एक विचारधारा के अनुकूल अतीत गढ़ना नहीं, बल्कि साक्ष्यों के आधार पर अतीत को उसके समग्र स्वरूप में समझना है।
(लेखक शिक्षाविद् एवं सामाजिक संस्था "शिक्षा-सोपान" के संस्थापक हैं)




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