विचार: प्रदूषण के खिलाफ लड़नी होगी साझा लड़ाई
विश्व स्वास्थ्य संगठन के वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों के अनुसार, पीएम 2.5 का वार्षिक औसत स्तर पांच माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए, जबकि उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में यह स्तर अक्सर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया जाता है।
HighLights
प्रदूषण केवल दिल्ली-एनसीआर नहीं, पूरे उत्तर भारत का संकट।
स्थानीय उपाय अपर्याप्त, एकीकृत क्षेत्रीय रणनीति की आवश्यकता।
पराली दहन, औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों का धुआं प्रमुख कारण।
डॉ. दीपक कोहली। सर्दियों की आहट के साथ ही उत्तर भारत के क्षितिज पर छाने वाली गहरी धुंध और धुएं की परत अब महज एक मौसमी घटनाक्रम तक सीमित नहीं नहीं रह गया, बल्कि यह करोड़ों नागरिकों के लिए एक गंभीर और जानलेवा जन-स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है। अक्टूबर से फरवरी के बीच दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआइ) अक्सर 400 से 450 के खतरनाक स्तर को पार कर जाता है।
जैसे ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता सूचकांक 'खराब' या 'गंभीर' श्रेणी में प्रवेश करता है, प्रशासनिक तंत्र में अचानक अप्रत्याशित गहमा-गहमी दिखाई देने लगती है। आनन-फानन में ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान यानी ग्रैप के विभिन्न प्रविधानों को लागू कर दिया जाता है। निर्माण कार्यों पर पाबंदी, निर्माण स्थलों पर एंटी-स्माग गन की तैनाती, डीजल जेनरेटरों के इस्तेमाल पर रोक और सड़कों पर पानी के छिड़काव जैसे उपाय कागजों और मीडिया की सुर्खियों में तैरने लगते हैं।
जबकि वायुमंडलीय विज्ञान और भूगोल के मौलिक नियमों की दृष्टि से देखें, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या केवल एक महानगर या कुछ चुनिंदा जिलों की सीमाओं में सिमटी दंडात्मक और तात्कालिक कार्रवाइयां इस विकराल वायुमंडलीय संकट का वास्तविक और स्थायी समाधान दे सकती हैं?
हवा, गैसों और सूक्ष्म कणों (पीएम 2.5 और पीएम 10) की कोई प्रशासनिक, राजनीतिक या भौगोलिक सीमा नहीं होती। उत्तर भारत के अनेक क्षेत्रों के आसमान में तैरने वाला जहर केवल वहां के स्थानीय वाहनों के धुएं या औद्योगिक चिमनियों का परिणाम नहीं है, बल्कि यह पूरे वृहद इंडो-गंगा मैदानी इलाकों के संयुक्त उत्सर्जन और वायुमंडलीय गतिशास्त्र से निर्धारित होता है। ऐसे में किसी एक शहर द्वारा अलग-थलग होकर उठाए गए एकांगी कदम इस बड़े संकट के सामने वैसे ही निष्प्रभावी साबित होते हैं, जैसे उफनती नदी के मुहाने पर पत्तों का बांध बनाना। हालिया वायु गुणवत्ता आंकड़ों का सूक्ष्म वैज्ञानिक विश्लेषण इस भ्रांति को पूरी तरह से तोड़ देता है कि प्रदूषण केवल दिल्ली-एनसीआर की विशिष्ट समस्या है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के वायु गुणवत्ता दिशानिर्देशों के अनुसार, पीएम 2.5 का वार्षिक औसत स्तर पांच माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए, जबकि उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में यह स्तर अक्सर 80 से 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया जाता है। दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में अब अकेले दिल्ली का नाम दर्ज नहीं है, बल्कि गंगा के मैदानी भूभाग में बसे तमाम शहर इस विषैले चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर, हापुड़ से लेकर हरियाणा के रोहतक, हिसार और राजस्थान के औद्योगिक शहर कोटा तक की वायु गुणवत्ता लगातार 'बेहद खराब' और 'अत्यंत गंभीर' स्तर पर बनी हुई है।
उत्तर भारत का एक क्षेत्र भौगोलिक रूप से एक विशाल प्राकृतिक कटोरे के समान है। सर्दियों के आगमन के साथ जब तापमान में गिरावट आती है, तो हवा का घनत्व बढ़ जाता है और उसकी गति मंद पड़ जाती है। वैज्ञानिक भाषा में इसे थर्मल इन्वर्जन या वायुमंडलीय व्युत्क्रमण कहते हैं, जिसमें गर्म हवा की ऊपरी परत ठंडी और भारी हवा को नीचे धरातल के पास ही दबाकर रख लेती है। इस प्राकृतिक जाल में जब उद्योगों, वाहनों, धूल और पराली का धुआं आकर मिलता है, तो यह संपूर्ण बेल्ट एक विशालकाय गैस चैंबर का रूप धारण कर लेती है। जब संकट का क्षेत्र संपूर्ण उत्तर भारत है, तो इसका समाधान किसी एक नगर निगम या राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में हो ही नहीं सकता। इसके लिए संपूर्ण एयरशेड पर आधारित एक एकीकृत और समेकित क्षेत्रीय रणनीति की आवश्यकता है।
वार्षिक वायुमंडलीय संकट का एक प्रमुख और विवादास्पद जैविक कारक कृषि अवशेषों यानी पराली का दहन है। पराली दहन से होने वाला उत्सर्जन उत्तर-पश्चिमी हवाओं की सवारी करता हुआ पूरे उत्तर भारत के आसमान को अपने आगोश में ले लेता है। चूंकि पराली संकट कृषि अर्थशास्त्र, ऊर्जा नीति और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से जुड़ा एक बहुआयामी मुद्दा है, इसलिए इसमें केंद्र सरकार का सीधा, आर्थिक और नीतिगत हस्तक्षेप अनिवार्य है। इसके लिए फसल विविधीकरण से लेकर उचित प्रौद्योगिकियों के लिए भारी सब्सिडी और बायो-मेथेनेशन प्लांट्स जैसा स्थायी बुनियादी ढांचा समय की आवश्यकता है, लेकिन यह भी ध्यान रहे कि प्रदूषण में केवल पराली का योगदान नहीं है। प्रदूषण की समस्या से ग्रस्त दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान की सरकारों के बीच आवश्यक तालमेल का अभाव भी स्थितियों को बिगाड़ता है।
संकट की दस्तक और उसके गहराते ही राजनीतिक दल और विभिन्न राज्य सरकारें दोषारोपण का खेल शुरू कर देती हैं। जबकि वायु प्रदूषण जैसी राष्ट्रीय आपदा पर दलीय राजनीति से ऊपर उठकर साझा राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देना आज की सबसे बड़ी मांग है। इस दिशा में प्रदूषण रोधी उपाय करने वाली संस्थाएं केवल कागजी दिशा-निर्देश जारी करने तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें एक सशक्त, स्वायत्त और कठोर निर्णय लेने वाले नियामक के रूप में धरातल पर उतरना होगा। पड़ोसी राज्यों के बीच औद्योगिक मानकों, सार्वजनिक परिवहन के विद्युतीकरण, स्वच्छ ईंधन के अनिवार्य उपयोग और कचरा प्रबंधन जैसे प्रदूषण नियंत्रण उपायों को एकसमान गंभीरता और अनुशासन के साथ लागू किया जाना चाहिए।
स्पष्ट है कि जब तक संपूर्ण उत्तर भारत के वायुमंडलीय एयरशेड की सीमाओं को पूरी तरह ध्यान में रखते हुए एक समेकित वैज्ञानिक कार्ययोजना तैयार नहीं की जाती और भू-स्थानिक मानिटरिंग तथा एयरोसोल आप्टिकल डेप्थ के सटीक आंकड़ों के आधार पर पारदर्शी निर्णय नहीं लिए जाते, तब तक इस विषैले चक्रव्यूह से बाहर निकलना असंभव है। वायु प्रदूषण को अब मात्र एक मौसमी परेशानी के रूप में देखना बंद करना होगा। इसे एक गंभीर पारिस्थितिकीय और जन-स्वास्थ्य आपातकाल माना जाए।(लेखक पर्यावरण मामलों के जानकार एव वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं)

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