विचार: पॉक्सो अधिनियम में सुधार आवश्यक
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में किशोर संबंधों के संदर्भ में पोक्सो अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था, 'इस निर्णय की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए, ताकि इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए यथासंभव कदम उठाने पर विचार किया जा सके।
HighLights
न्यायालयों ने पॉक्सो अधिनियम के कठोर प्रयोग पर चिंता जताई।
किशोर संबंधों में अधिनियम के दुरुपयोग पर विचार करने का आग्रह।
'रोमियो-जूलियट प्रावधान' जैसे संशोधन का सुझाव दिया गया।
प्रो. ऋतु सारस्वत। हाल में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर निर्णय देते हुए पोक्सो अधिनियम, 2012 के कठोर अनुप्रयोग और भारत की सामाजिक वास्तविकताओं के बीच संबंध पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। यह मामला ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था, जिसके विरुद्ध पोक्सो अधिनियम के अंतर्गत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। लड़की के माता-पिता ने यह कहते हुए मामला दर्ज कराया था कि उनकी बेटी नाबालिग है, जबकि लड़की ने न्यायालय के समक्ष अपने साथी के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की थी।
न्यायालय ने सामाजिक परिस्थितियों, अशिक्षा और गरीबी जैसी कठोर वास्तविकताओं को ध्यान में रखते हुए कहा, 'पोक्सो अधिनियम का क्रियान्वयन कुछ तथ्यात्मक परिस्थितियों में ऐसे परिणाम उत्पन्न कर सकता है, जो न्याय के बजाय अन्याय को बढ़ावा देने वाले प्रतीत हों।' न्यायालय ने विधि आयोग से अधिनियम में संभावित संशोधनों पर विचार करने का अनुरोध किया, ताकि असाधारण परिस्थितियों में विशेष न्यायाधीशों को सजा निर्धारित करने में अधिक विवेकाधिकार देने की संभावना पर विचार किया जा सके।
कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय ने ‘उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनिरुद्ध एवं अन्य’ मामले में भी पोक्सो अधिनियम के दुरुपयोग से जुड़े प्रश्नों पर विचार किया था। यह मामला लगभग 12 वर्ष की एक लड़की की मां द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी से संबंधित था, जिसमें लड़की को घर से ले जाने का आरोप लगाया गया था। आरोपित को इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जमानत मिलने के बाद राज्य ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में किशोर संबंधों के संदर्भ में पोक्सो अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा था, 'इस निर्णय की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए, ताकि इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए यथासंभव कदम उठाने पर विचार किया जा सके। इन कदमों में अन्य उपायों के साथ-साथ एक ऐसे ‘रोमियो–जूलियट प्रविधान’ को शामिल करने की संभावना भी हो, जो किशोर संबंधों को इस कानून के कठोर प्रभाव से मुक्त करे। साथ ही ऐसी व्यवस्था बनाने पर भी विचार किया जाए, जिसके माध्यम से उन व्यक्तियों के विरुद्ध अभियोजन चलाया जा सके, जो इन कानूनों का उपयोग आपसी हिसाब चुकता करने अथवा बदला लेने के लिए करते हैं।' सर्वोच्च न्यायालय की यह चिंता स्वाभाविक है, क्योंकि विधिक व्यवस्था का मूल उद्देश्य समाज का संरक्षण और न्याय की स्थापना करना है।
किशोरावस्था में लिए गए निर्णयों और उनसे जुड़ी कानूनी प्रक्रिया का प्रभाव किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, शिक्षा और भविष्य पर पड़ सकता है। इसी संदर्भ में 2022 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ‘अतुल मिश्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं तीन अन्य’ मामले में कहा था कि किशोरावस्था में परस्पर आकर्षण के कारण लिए गए निर्णय आवेगपूर्ण और अपरिपक्व हो सकते हैं, लेकिन उन्हें केवल इसी आधार पर पाप या कलंकित नहीं माना जाना चाहिए।
पोक्सो अधिनियम के कठोर प्रविधानों को बिना परिस्थितियों पर पर्याप्त विचार किए लागू करने से किशोरों की प्रतिष्ठा और भविष्य को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। किशोरावस्था में एक-दूसरे के प्रति आकर्षण और भावनात्मक जुड़ाव विकसित होना स्वाभाविक है। इस अवस्था में विकसित होने वाला प्रत्येक संबंध किसी अनुचित मंशा का प्रमाण नहीं होता। कई बार किशोर भावनाओं और आकर्षण को समझते हुए एक-दूसरे के निकट आते हैं, जबकि संबंधों की जिम्मेदारियों और उनके दूरगामी परिणामों को समझने की उनकी क्षमता अभी विकसित हो रही होती है। इसलिए ऐसे संबंधों का मूल्यांकन करते समय केवल उम्र या संबंध की प्रकृति को आधार बनाने के बजाय उनकी परिस्थितियों, आपसी व्यवहार तथा दबाव अथवा शोषण की उपस्थिति को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
भारतीय समाज में किशोरों के प्रेम-संबंधों का प्रश्न व्यक्तिगत भावनाओं से कहीं आगे जाकर पारिवारिक मान्यताओं, सामाजिक प्रतिष्ठा और परंपरागत मूल्यों से जुड़ जाता है। एक ओर किशोरावस्था में विकसित होती भावनात्मक स्वतंत्रता और अपनी पसंद के अनुसार संबंध चुनने की आकांक्षा है तो दूसरी ओर परिवार और समुदाय की अपेक्षाएं, जिनमें जाति, पंथ और विवाह संबंधी परंपराओं की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इन दोनों के बीच टकराव की स्थिति में किशोरों के संबंध कभी-कभी पारिवारिक विवाद और सामाजिक तनाव का कारण बन जाते हैं। अनेक बार परिवार की असहमति ऐसे संबंधों को स्वीकार करने के बजाय उनका विरोध करने का रूप ले लेती है और मामला कानूनी टकराव तक पहुंच जाता है। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो उठता है कि बालकों को यौन शोषण और दुर्व्यवहार से संरक्षण देने के लिए निर्मित कानून का उपयोग वास्तविक अपराधों और पारिवारिक असहमति से उपजे विवादों के बीच अंतर को किस सीमा तक पहचान पाता है।
किशोरावस्था की भावनाओं को अपराध की भाषा में समझने से पहले उनकी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक वास्तविकताओं को समझना आवश्यक है। बाल संरक्षण का उद्देश्य किसी भी प्रकार के शोषण से बच्चों को सुरक्षित रखना है, लेकिन न्याय की प्रक्रिया में उनके भविष्य और गरिमा की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
(लेखिका समाजशास्त्री हैं)
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