मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया में छूट गए मतदाताओं का पता लगाकर उनके नाम वोटर लिस्ट में शामिल करने के लिए विशेष अभियान की चुनाव आयोग की तैयारी के बाद भी विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करने में जुटा है।

समझना कठिन है कि इससे उसे क्या हासिल होगा, क्योंकि वह एसआईआर का भी विरोध कर रहा है। एसआईआर के विरोध का सीधा अर्थ है कि विपक्ष मतदाता सूचियों को सही करने के पक्ष नहीं। क्या यह विचित्र नहीं कि एक ओर वह मतदाता सूचियों में त्रुटियों की शिकायत भी कर रहा है और दूसरी ओर उन्हें दूर करने के लिए एसआईआर भी नहीं होने देना चाहता।

उसके इस रवैये से तो यही लगता है कि उसका एक मात्र उद्देश्य चुनाव आयोग को बदनाम करना और उसकी विश्वसनीयता संदिग्ध बनाना है। संकीर्ण राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए अनर्गल आरोपों के सहारे किसी संवैधानिक संस्था की साख से खिलवाड़ करना एक तरह से लोकतंत्र को कमजोर करने वाला ही कृत्य है।

लोकतंत्र अपनी संस्थाओं के जरिये सशक्त होता है। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं कि लोकतंत्र की दुहाई दे रहे विपक्षी दल एक तरह से उसकी जड़ों पर ही प्रहार करने का काम कर रहे हैं।

इस सच से मुंह मोड़ने का कोई मतलब नहीं कि करीब दो दशक से मतदाता सूचियों को सही न किए जाने के चलते उसमें तमाम गड़बड़ियां घर कर गई हैं। इन्हें एसआईआर के जरिये ही दूर किया जा सकता है और इस प्रक्रिया का पालन करना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है। इसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बार-बार स्पष्ट किया है।

इससे इनकार नहीं कि जहां लगभग 90 करोड़ मतदाता हों, वहां मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने की प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ियां हो सकती हैं, लेकिन इसके आधार पर यह निष्कर्ष निकालना लोगों को गुमराह करना ही है कि चुनाव आयोग दल विशेष के पक्ष में काम कर रहा है।

विपक्ष चुनाव आयोग पर ऐसे आरोप तो बढ़-चढ़कर लगा रहा है, लेकिन एसआईआर की प्रक्रिया में उसका सहयोग करने के लिए तैयार नहीं। इसी तरह वह एसआईआर कर रहे कर्मियों की गलतियों को तो तूल दे रहा है, लेकिन इसकी अनदेखी कर रहा है कि चुनाव आयोग उन्हें ठीक करने के भी कदम उठा रहा है और इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट भी उसे आवश्यक निर्देश दे रहा है।

आखिर जिस प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट सही मान रहा है, उसे गलत ठहराने का क्या औचित्य? अब जब विपक्षी दल चुनाव आयोग को लांछित करने के अपने एकसूत्रीय कार्यक्रम में जुट गए हैं, तब आयोग को भी देखना होगा कि वह उनके दुष्प्रचार की काट कैसे करे? उसके सामने इसके अलावा और कोई उपाय नहीं कि वह अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए सक्रियता दिखाए।