राजीव सचान। विपक्ष और विशेष रूप से कांग्रेस ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर और साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ फिर से अपना अभियान तेज कर दिया है। उसका साथ कुछ अन्य विपक्षी दल भी दे रहे हैं। हालांकि पिछले दिनों तीनों चुनाव आयुक्तों ने एक साथ बैठक कर इस धारणा को एक बड़ी हद तक ध्वस्त किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर-तरीकों से दोनों चुनाव आयुक्त नाखुश हैं, लेकिन विपक्ष इसे एक बड़ा मुद्दा मानने से पीछे नहीं हटा रहा है।

विपक्षी दल यह सिद्ध करने में लगे हुए हैं कि एसआइआर के जरिये उन मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं, जो हमारे वोटर हैं। वे यह साबित करने की कोशिश तो खूब कर रहे हैं, लेकिन यह नहीं बता पा रहे हैं कि आखिर उन्हें कैसे पता चल जा रहा है कि जिनके नाम कथित तौर पर जानबूझकर वोटर लिस्ट से हटाए जा रहे हैं, वे उन्हें ही वोट देते हैं?

एसआईआर के खिलाफ तभी अभियान छेड़ दिया गया था, जब बिहार में यह प्रक्रिया शुरू हुई थी। कांग्रेस और विपक्षी दलों ने दिल्ली से लेकर पटना तक एसआईआर के खिलाफ धरना-प्रदर्शन किया और राहुल गांधी ने तो तेजस्वी यादव संग बिहार में वोटर अधिकार यात्रा भी निकाली, लेकिन बिहार के लोगों ने इसका संज्ञान ही नहीं लिया कि उनके वोट अधिकार में कटौती की जा रही है। बिहार में एसआईआर के खिलाफ छेड़े गए अभियान की हवा कांग्रेस नेता शकील अहमद के इस बयान ने भी निकाली थी कि यदि 65 लाख वोटरों के नाम गलत तरीके से काटे गए तो 65 लोग भी सड़कों पर यह कहने क्यों नहीं आए कि वे जीवित हैं, वैध मतदाता हैं और फिर भी उनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए।

इसके बाद बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरलम और असम में एसआईआर शुरू हुआ। बंगाल में तो इसका विरोध देखने को मिला, पर अन्य राज्यों में उसके खिलाफ कोई खास प्रतिक्रिया नहीं हुई। इन राज्यों में से तमिलनाडु में नई बनी पार्टी टीवीके जीती और केरलम में कांग्रेस। चुनाव बाद केरलम कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्नीथला ने कहा था कि एसआइआर प्रक्रिया बहुत मददगार साबित हुई, क्योंकि इससे मृत व्यक्तियों और माकपा से जुड़े बोगस वोटों को हटाया गया। इसके चलते चुनाव निष्पक्ष हो सके। इसके बाद जब अन्य राज्यों में एसआइआर की प्रक्रिया शुरू हुई और उत्तर प्रदेश में दो करोड़ से अधिक वोट कटने की खबर आई तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि इससे भाजपा को हर सीट पर लगभग 61 हजार वोटों का नुकसान होगा।

यदि कहीं एसआइआर प्रक्रिया को लेकर सवाल हैं तो बंगाल में। यहां के 37 लाख लोगों के मामले में यह तय होना है कि वे वैध मतदाता हैं या नहीं? इनकी सुनवाई का निपटारा धीमी गति से हो रहा है और यह चिंता का विषय है, लेकिन यह मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है और वह इसकी सुनवाई भी कर रहा है। इससे इन्कार नहीं कि एसआइआर प्रक्रिया जटिल है और उसमें कई गड़बड़ियां भी हो जा रही हैं। इसके साथ ही लोगों को पुराना विवरण और आवश्यक दस्तावेज देने में परेशानी का सामना भी करना पड़ रहा है, लेकिन आम जनता की ओर से यह सुनने को नहीं मिल रहा है कि इस प्रक्रिया के जरिये वोट चोरी की जा रही है, जैसा कि विपक्षी दल और खासकर कांग्रेस प्रचारित कर रही है।

यह भी उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार एसआईआर को उचित ठहराया है, लेकिन विपक्ष को चैन नहीं। वह सुप्रीम कोर्ट की भी सुनने को तैयार नहीं। चुनाव आयोग का कहना है कि वोटर लिस्ट से जो नाम हटाए गए हैं, वे मृत, विस्थापित लोगों या फिर उनके हैं, जिनके नाम दो जगह दर्ज थे, लेकिन विपक्ष यह समझने को तैयार नहीं। उसे लगता है कि वोट चोरी का जुमला जनता को आकर्षित कर रहा है और वह एसआईआर के खिलाफ अपने अभियान से राजनीतिक लाभ उठाने में समर्थ रहेगा, लेकिन इसके आसार कम ही हैं। आसार इसी के अधिक हैं कि जैसे राफेल सौदे में दलाली के आरोपों ने कोई असर नहीं दिखाया था, वैसे ही वोट चोरी का नारा भी भोथरा ही साबित होगा।

राहुल गांधी की मानें तो वोट चोरी 2024 के लोकसभा चुनाव से ही हो रही है, लेकिन यदि ऐसा है तो चार सौ पार का नारा दे रही भाजपा 240 पर ही कैसे सिमट गई थी और कांग्रेस 99 सीटों पर कैसे पहुंच गई थी? हैरानी नहीं कि एसआईआर के खिलाफ अभियान उसी तरह निरर्थक साबित हो, जैसे ईवीएम के खिलाफ छेड़ा गया अभियान। वास्तव में ऐसा कोई अभियान किसी भी राजनीतिक दल को लाभ नहीं दे सकता, जिसे आम जनता का समर्थन प्राप्त न हो।

जब तक जनता को यह नहीं लगता कि सचमुच वैध वोटरों के नाम इस तरह काटे जा रहे हैं कि विपक्ष को नुकसान हो, तब तक कांग्रेस और अन्य दल कितना भी गर्जन-तर्जन कर लें, उनकी दाल गलने वाली नहीं है। शायद कांग्रेस को इसका आभास भी है और इसीलिए खीझ में आकर उसके कार्यकर्ता मुख्य चुनाव आयुक्त को भला-बुरा कहने के साथ ही आगरा में उनके पैतृक आवास जाकर वहां अभद्र नारे लिख रहे। इसी तरह वे उनकी आईएएस बेटी को भी निशाना बना रहे हैं, जो गौतमबुद्ध नगर की डीएम हैं। विपक्ष यह ध्यान रखे तो बेहतर कि किसी भी मुद्दे पर आक्रामकता अभद्रता में बदल जाए तो वह उलटा ही असर करती है।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)