जागरण संपादकीय: कोचिंग पर निर्भरता
आखिर जब पाठ्यक्रम एक है तो स्कूली और प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नों का स्तर अलग-अलग क्यों? निःसंदेह यह अंतर इसलिए आया, क्योंकि शिक्षा बोर्डों का उद्देश्य अधिक से अधिक छात्रों को 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं में सफल बनाना होता है और वह भी अच्छे नंबरों से।
HighLights
शिक्षा मंत्रालय कोचिंग पर निर्भरता घटाने की कर रहा पहल।
11वीं-12वीं कक्षाओं में पठन-पाठन का स्तर सुधारना होगा।
स्कूल पाठ्यक्रम को प्रतियोगी परीक्षाओं के अनुरूप बनाना आवश्यक।
शिक्षा मंत्रालय नीट, जेईई और ऐसी ही अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में कोचिंग पर निर्भरता घटाने के लिए जो पहल करने जा रहा है, उसमें सफलता तब मिलेगी, जब स्कूली स्तर पर और विशेष रूप से 11वीं एवं 12वीं की कक्षाओं में पठन-पाठन का स्तर उन्नत होगा। यह निजी के साथ सरकारी स्कूलों में भी उन्नत होना चाहिए। और भी अच्छा होगा कि आठवीं के बाद ही जब छात्र विज्ञान एवं गणित विषयों का चयन करते हैं, तभी से उनके पाठ्यक्रम और प्रश्नपत्रों का स्तर ऐसा किया जाए, जिससे वे आगे चलकर नीट और जेईई जैसी परीक्षाओं में कोचिंग का सहारा लेने के लिए विवश न हों।
एक समय था, जब इंटरमीडिएट के छात्रों को इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में शामिल होने के लिए किसी कोचिंग की जरूरत नहीं पड़ती थी, लेकिन धीरे-धीरे स्थितियां बदलीं और फिर कोचिंग के चलन ने एक बड़े उद्योग का रूप ले लिया। इसका कारण हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट के पठन-पाठन के स्तर में कमी के साथ यह भी रहा कि इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्नों का स्तर कठिन होता गया। समझना कठिन है कि जिस स्तर के प्रश्न उक्त परीक्षाओं में पूछे जाते हैं, उसी स्तर के प्रश्न 11वीं और 12वीं परीक्षाओं में क्यों नहीं शामिल किए जा सकते?
आखिर जब पाठ्यक्रम एक है तो स्कूली और प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्नों का स्तर अलग-अलग क्यों? निःसंदेह यह अंतर इसलिए आया, क्योंकि शिक्षा बोर्डों का उद्देश्य अधिक से अधिक छात्रों को 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं में सफल बनाना होता है और वह भी अच्छे नंबरों से। यह किसी से छिपा नहीं कि आजकल कुछ शिक्षा बोर्डों की परीक्षाओं में 90 प्रतिशत अंक लाना बहुत आम हो गया है। शिक्षा बोर्डों और साथ ही विद्यालयों का उद्देश्य छात्रों को केवल स्कूली परीक्षाओं में पास होने लायक ही नहीं, बल्कि मेडिकल, इंजीनियरिंग आदि क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम बनाना भी होना चाहिए।
यह अच्छा हुआ कि शिक्षा मंत्रालय ने यह समझा कि इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों को तैयार करने में एनसीईआरटी के साथ दूसरे शिक्षा बोर्डों के पाठ्यक्रम को भी आधार बनाने की आवश्यकता है, लेकिन इस आवश्यकता की पूर्ति तब होगी, जब केंद्रीय और राज्यों के शिक्षा बोर्डों के पाठ्यक्रम में साम्य होगा। शिक्षा मंत्रालय को यह भी समझना होगा कि केवल इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश परीक्षाओं में बैठने वाले छात्रों को ही कोचिंग संस्कृति से बचाने की आवश्यकता नहीं है। यह आवश्यकता अन्य परीक्षाएं देने वाले छात्रों के संदर्भ में भी है। इसी के साथ उसे ट्यूशन संस्कृति पर भी विराम लगाने पर विचार करना चाहिए।


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