संजय गुप्त। पिछले दिनों एक अंग्रेजी दैनिक की इस खबर ने यह जो हंगामा खड़ा कर दिया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कई निर्णयों से दो अन्य चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने असहमति जताई थी और दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव से अपनी शिकायत भी दर्ज कराई थी, उसे चुनाव आयोग की ताजा बैठक ने शांत करने का भी काम किया और उन सवालों के जवाब भी दिए, जो उक्त खबर को लेकर उठे थे और जिनके आधार पर विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ-साथ मोदी सरकार पर निशाना साधने में जुट गया था। चूंकि चुनाव आयोग की बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दोनों मुख्य चुनाव आयुक्त भी शामिल हुए, इसलिए इन अफवाहों पर विराम भी लगा कि तीनों में अनबन है। इस बैठक के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति से यह साफ हुआ कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को जो चिट्ठी लिखी थी, वह आयोग की किसी नीति से संबंधित नहीं, बल्कि आयोग में डेपुटेशन पर आए एक अधिकारी के कामकाज से संबंधित थी।

प्रेस विज्ञप्ति में यह भी स्पष्ट किया गया कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर को लेकर जो भी फैसले लिए गए, वे आम सहमति से लिए गए। चुनाव आयोग ने यही बात पिछले दिनों भी कही थी। उस पर यकीन न करने का कोई कारण नहीं था, क्योंकि चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार फैसले या तो सहमति से लिए जाते हैं या फिर बहुमत से। जहां तक असहमति की बात है तो किसी भी संस्था में विचार-विमर्श के दौरान मतभेद होना स्वाभाविक हैं। इन मतभेदों को तूल देने का कोई औचित्य नहीं बनता था, लेकिन ऐसा ही किया गया। चुनाव आयोग की ताजा प्रेस विज्ञप्ति यह भी बता रही है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कथित तौर पर फार्म-6 में बदलाव को लेकर आपत्ति जताने की बात सही नहीं थी। इसका आधार इसलिए भी नहीं बनता था, क्योंकि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान हुए एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फार्म-6 में जो अतिरिक्त घोषणापत्र जोड़ा गया, वह वैध है। आखिर जिस बदलाव को सुप्रीम कोर्ट ने वैध और आवश्यक माना, उसे लेकर कोई चुनाव आयुक्त आपत्ति कैसे जता सकता था?

चुनाव आयोग का एक प्रमुख काम देश के हर योग्य मतदाता को वोट देने के लिए अधिकृत करना और अयोग्य मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाना भी है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि मौजूदा मतदाता सूचियों में अनेक ऐसे नाम हैं, जो या तो कहीं स्थानांतरित हो चुके हैं या फिर जिनका निधन हो चुका है। इसी तरह तमाम नामों का दोहराव भी है। मतदाता सूचियों में अनेक नाम घुसपैठियों के भी हैं। यह एक तथ्य है कि पिछले दशकों में देश में बड़े पैमाने पर घुसपैठ हुई है और घुसपैठियों ने छल-छद्म से आधार एवं अन्य दस्तावेजों के अलावा मतदाता पहचान पत्र भी हासिल कर लिए हैं। देश के सीमांत राज्यों में ऐसा अधिक हुआ है और इसका कारण यह है कि इन राज्यों के राजनीतिक दलों ने घुसपैठियों को मतदाता बनाने का काम जानबूझकर किया है, ताकि चुनावी लाभ हासिल किया जा सके।

मोदी सरकार सत्ता में आने के बाद से लगातार यह स्पष्ट करती रही है कि वह घुसपैठियों को बाहर निकालेगी। यह तभी संभव है, जब उनकी पहचान होगी। यह ठीक है कि चुनाव आयोग का काम ऐसे लोगों की पहचान करना नहीं है और न ही सरकार ने चुनाव आयोग को यह कहा है कि वह इनकी पहचान करे, लेकिन यह देखना तो उसका दायित्व है ही कि मतदाता सूची में शामिल नाम भारतीय नागरिकों के हों। यदि यह सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग लोगों से आवश्यक दस्तावेज दिखाने को कहता है और इस क्रम में उन्हें नोटिस भेजता है तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता। चुनाव आयोग को यह देखना ही चाहिए कि कोई भी ऐसा नागरिक मतदाता न बनने पाए, जो भारत का नागरिक न हो। इसके लिए चुनाव आयोग को फार्म-6 के जरिये लोगों से आवश्यक जानकारी मांगनी होगी और उनके दस्तावेजों का परीक्षण भी करना होगा, क्योंकि अनेक लोगों ने फर्जी पहचान पत्र हासिल कर रखे हैं या उन्हें गलत तरीके से बनवा लिया है।

एसआईआर की प्रक्रिया बिहार विधानसभा चुनाव से शुरू हुई थी। इसके बाद चुनाव वाले राज्यों बंगाल, केरल, तमिलनाडु में भी हुई। केरल और तमिलनाडु में इसे लेकर कोई विवाद सामने नहीं आया। यह भी उल्लेखनीय है कि इन दोनों राज्यों में क्रमशः कांग्रेस और टीवीके ने जीत हासिल की। इन राज्यों के बाद कुछ अन्य राज्यों में भी एसआईआर की प्रक्रिया हुई। शेष राज्यों में वह जारी है। एसआईआर को लेकर विवाद का कारण यह है कि पिछले लगभग दो दशकों से यह प्रक्रिया संपन्न ही नहीं की गई। इसे समय-समय पर किया जाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इससे ही मतदाता सूचियां शुद्ध हो सकती हैं।

यह अच्छा हुआ कि तीनों चुनाव आयुक्तों ने बैठक करके एसआईआर को लेकर उठे सवालों का भी जवाब दिया और यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया को लेकर जो समस्याएं आ रही हैं, उनका समाधान इस तरह किया जाएगा, जिससे लोगों को कम से कम परेशानी हो। अब यदि इसके बाद भी विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मोर्चा खोले रखता है और वह उनके खिलाफ सड़कों पर उतरकर धरना-प्रदर्शन करता है तो उसका कोई मतलब नहीं होगा। विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर वाले राज्यों में लाखों मतदाताओं के नाम अनुचित तरीके से काटे गए, तो सवाल यह है कि ये लोग अपना विरोध जताने सड़क पर क्यों नहीं आते? प्रश्न यह भी है कि विपक्ष ऐसे लोगों को सामने क्यों नहीं लाता?

यह संभव है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा अभी भी खटखटाया जाए। एक याचिका तो दाखिल भी हो चुकी है। आगे जो भी हो, इसकी अनदेखी न की जाए कि इसके पहले चुनाव आयोग की ओर से कराए जा रहे एसआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जो भी दलीलें दी गईं, वे सब खारिज कर दी गईं। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार स्पष्ट किया है कि एसआईआर कराना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है। इसके बाद भी विपक्षी दल मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करने के लिए चुनाव आयोग पर निशाना साधते रहते हैं।

(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)