हर्ष वी. पंत। संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिकी राष्ट्रपति का संबोधन एक अहम पड़ाव होता है कि यह महाशक्ति शेष विश्व को किस दृष्टि से देखती है। चूंकि राष्ट्रपति ट्रंप का दूसरा कार्यकाल अपारंपरिक एवं अप्रत्याशित पहलुओं से भरा रहा है, इसलिए उनके संबोधन को लेकर उत्सुकता स्वाभाविक थी। ट्रंप का संबोधन उनके दूसरे कार्यकाल की विदेश नीति के आधारभूत तर्कों की एक स्पष्ट और सटीक अभिव्यक्ति साबित हुआ। इसमें ट्रंप ने यह दर्शाने का प्रयास किया कि अमेरिका केवल 'अपनी महानता की वापसी' की ओर ही नहीं लौट रहा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अपनी शर्तों के अनुसार नया स्वरूप देने के प्रति संकल्पित भी है।

उनका मूल संदेश उनकी चिरपरिचित शैली के अनुरूप ही था कि किसी संस्थागत आम सहमति के बजाय अमेरिकी सैन्य एवं आर्थिक सामर्थ्य ही वैश्विक शांति की प्रमुख संरक्षक होगी। ट्रंप ने जिस तरह दुनिया को खतरों, कमजोर संस्थाओं और रणनीतिक होड़ से घिरे परिदृश्य के रूप में चित्रित किया, उसमें 'शक्ति के जरिये शांति' महज एक नारा नहीं, बल्कि वाशिंगटन के वैश्विक दृष्टिकोण को समझने का एक व्यावहारिक ढांचा बनकर उभरा।

ट्रंप के भाषण में ईरान का मुद्दा प्रमुखता से छाया रहा। उन्होंने तेहरान को दुनिया में आतंक का सबसे बड़ा प्रायोजक करार दिया और दोहराया कि अमेरिका किसी भी सूरत में ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। हालांकि उनकी आक्रामक बयानबाजी ने कूटनीति और टकराव दोनों ही विकल्पों को खुला रखा। जहां उन्होंने दो-टूक कहा कि ईरान के सामने विकल्प एकदम स्पष्ट हैं कि या तो वह वाशिंगटन की स्वीकार्य शर्तों पर समझौता करे या फिर अप्रत्याशित सैन्य बल के प्रहार का सामना करने को तैयार रहे। इस तीखी बयानबाजी के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठकों से इतर अमेरिकी और ईरानी राजनयिकों में संवाद भी जारी रहा।

यह ट्रंप की सौदेबाजी पर केंद्रित कूटनीति को ही उजागर करता है। उन्होंने पश्चिमी गोलार्ध को लेकर भी उतना ही कड़ा रवैया दिखाया। वेनेजुएला, निकोलस मादुरो और तेल संसाधनों के आलोक में 'जिसकी लाठी, उसकी भैंस' सरीखे नजरिये से उन्होंने यही संकेत दिया कि वाशिंगटन अब इस क्षेत्र को ऐसे दायरे के रूप में देख रहा है, जहां अमेरिकी वर्चस्व न केवल स्थापित होना चाहिए, बल्कि उसे सख्ती से लागू भी किया जाना चाहिए। उन्होंने क्यूबा को एक विफल कम्युनिस्ट देश के रूप में चित्रित किया। मेक्सिको को भी इसी व्यापक सुरक्षा ढांचे के दायरे में रखा।

कुछ समय से ट्रंप की छवि ऐसे व्यक्ति की बन गई है, जो अपनी पीठ स्वयं थपथपाने को लेकर कोई संकोच नहीं करते। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भी उन्होंने यही दोहराया कि एक के बाद एक युद्ध, टकराव और तनाव दूर करने में उनकी कितनी अहम भूमिका रही। इस कड़ी में उन्होंने कंबोडिया-थाईलैंड, कोसोवो-सर्बिया, रवांडा-कांगो, भारत-पाकिस्तान, आर्मेनिया-अजरबैजान और गाजा के विवादों को ऐसे उदाहरणों के रूप में गिनाया, जिनका उनके शासनकाल में स्थायी समाधान हुआ या युद्धविराम संभव हो सका।

आर्कटिक और ग्रीनलैंड ट्रंप की नई नीति में अंतर्निहित भू-राजनीतिक दृष्टिकोण के सबसे मुखर उदाहरण के रूप में सामने आए। अमेरिका की सैन्य मौजूदगी बढ़ाने और डेनमार्क एवं ग्रीनलैंड के साथ नए सुरक्षा समझौतों पर ट्रंप का आग्रह आर्कटिक की बढ़ती सामरिक अहमियत का परिचायक रहा। स्पष्ट है कि अमेरिका के लिए यह क्षेत्र अब एक सीमांत परिधि से परे वृहद-शक्ति प्रतिस्पर्धा, समुद्री आवाजाही, संवेदनशील अवसंरचना और उत्तरी अमेरिका की संप्रभु रक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है।

ट्रंप का संबोधन शीतयुद्ध के बाद आकार लेने वाली वैश्विक व्यवस्था की स्थापित मान्यताओं पर एक तीखा प्रहार भी था। वे संयुक्त राष्ट्र को ऐसी संस्था मानते हैं, जो कट्टर वामपंथी एजेंडे के चंगुल में फंसी हुई है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कराधान और साझा नियामक ढांचे थोपने से जुड़ी कोशिशों को भी आड़े हाथों लिया। वैश्विक कार्बन टैक्स का विरोध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई पर अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों को सिरे से खारिज करना उनकी उसी नीति को ही दर्शाता है कि ऐसे सभी मामलों में निर्णयन को लेकर वाशिंगटन की पूर्ण स्वतंत्रता अक्षुण्ण रहनी चाहिए, जिन्हें अमेरिका अपनी राष्ट्रीय शक्ति की धुरी मानता है।

मानवाधिकार परिषद और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय पर ट्रंप के तीखे हमलों ने भी यह साफ कर दिया कि वे ऐसी संस्थाओं के प्रभाव एवं अधिकार को किस हद तक अस्वीकार करते हैं। उनके संबोधन में तेल संसाधनों, विवादों के समाधान और ड्रग कार्टेल्स पर नकेल कसने संबंधी कई दावे संदेहास्पद भी रहे। आखिर किसी संघर्ष के 'समाप्त' होने का एलान करने और एक स्थायी राजनीतिक समाधान निकालने के बीच का फर्क समझना बेहद जरूरी है। इसी तरह, ऊर्जा क्षेत्र में वर्चस्व के दावों को भी राजनीतिक बयानबाजी के बजाय वास्तविक वैश्विक भंडारों और उत्पादन के धरातल पर परखे जाने की जरूरत है।

कुल मिलाकर, इस संबोधन की अहमियत किसी एक दावे में नहीं, बल्कि उस समग्र दृष्टिकोण में निहित है, जिसने इसे आकार दिया। इसमें ट्रंप ने एक ऐसे अमेरिका की तस्वीर पेश की, जो अपनी सैन्य और आर्थिक ताकत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति सशंकित भी। साथ ही किसी बाहरी बंदिश को स्वीकार करने को तैयार नहीं और अपने रणनीतिक हितों की पूर्ति के लिए पहले से कहीं अधिक तत्पर है। इस पूरे भाषण का मर्म अमेरिकी वर्चस्व की नए सिरे से पुनर्स्थापना पर केंद्रित रहा। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए इसके दूरगामी और गहरे निहितार्थ हैं। अमेरिका रणनीतिक दबाव को ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का प्राथमिक आधार समझता है। संभव है कि वह अपने मित्र राष्ट्रों, बहुपक्षीय मंचों और प्रतिद्वंद्वियों पर ऐसा दबाव और बढ़ाए। सवाल यह नहीं है कि क्या अमेरिका आज भी एक महाशक्ति है, बल्कि अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वह अपनी शक्ति का एक सुदृढ़ एवं दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाने में कैसे उपयोग करेगा।

(लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं)