विचार: फूहड़ और विषाक्त होती राजनीति
भारतीय राजनीति हर दिन स्तरहीन होती जा रही है और भाषा की मर्यादा की कोई परवाह नहीं कर रहा है।
HighLights
राहुल गांधी के मंच पर पीएम मोदी की मिमिक्री पर विवाद।
भारतीय राजनीति में भाषाई मर्यादा का लगातार हो रहा उल्लंघन।
आईटी सेल और डिजिटल मीडिया राजनीति को बना रहे विषाक्त।
राजीव सचान। इंदौर में राहुल गांधी का छात्रों की गूंज कार्यक्रम इसलिए अधिक चर्चा में रहा, क्योंकि इसमें एक कामेडियन को बुलाकर उससे प्रधानमंत्री मोदी की मिमिक्री कराई गई। राहुल गांधी इस कामेडियन के सहयोगी के रूप में उत्साहित होकर उसका साथ देते नजर आए। नेताओं, अभिनेताओं और अन्य नामचीन लोगों की मिमिक्री कोई नई-अनोखी बात नहीं है, लेकिन यह अजीब ही कहा जाएगा कि राहुल गांधी ने छात्रों के मुद्दों को उजागर करने के लिए अपने मंच पर एक कामेडियन को बुलाकर प्रधानमंत्री की मिमिक्री कराना पसंद किया।
इस मिमिक्री के जरिये प्रधानमंत्री की विदेश नीति की रीति-नीति का मजाक उड़ाया गया। इसी क्रम में एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री की ओर से एक बुर्जुग महिला को कुर्सी देने के आग्रह का भी मजाक उडाया गया। यह निहायत भोंडा और जुगुप्सा पैदा करने वाला रहा। आखिर किसी बुर्जुग महिला को कुर्सी उपलब्ध कराने के सहज मानवीय व्यवहार का मजाक कैसे उड़ाया जा सकता है, लेकिन कांग्रेस को इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा।
आजकल कामेडी के नाम पर भोंडेपन की हद पार होने लगी है, लेकिन नेता-प्रतिपक्ष के मंच से ऐसा होना यह बताता है कि राजनीति किस तेजी के साथ स्तरहीन होती जा रही है। यह स्तरहीनता राजनीति को फूहड़ और विषाक्त ही बना रही है। इसमें सभी दलों का योगदान है, किसी का कम तो किसी का ज्यादा। राजनीतिक दल अब विरोधी दल को प्रतिस्पर्धी के स्थान पर शत्रु के रूप में देखने लगे हैं। उनके बीच का यह शत्रुभाव अब समाज में भी घर करने लगा है। राहुल गांधी के मंच से पहली बार प्रधानमंत्री और उनकी विदेश नीति का भद्दे तरीके से मजाक नहीं उड़ाया गया। कुछ समय पहले भी ऐसा ही हुआ था और तब इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी का अमर्यादित तरीके से उल्लेख किया गया था। यह उल्लेख कांग्रेस के पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने किया था और उनके ऐसा करने पर राहुल गांधी हंसते हुए दिखाई दिए थे।
कांग्रेस ने इस प्रसंग का भी बचाव किया था। यह किसी से छिपा नहीं कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री के खिलाफ किस तरह तू-तड़ाक वाली भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं। वह उन्हें चोर, डरपोक आदि कह चुके हैं। इसके अतिरिक्त ऐसे शब्दों का भी इस्तेमाल कर चुके हैं कि वह मुझसे आंख नहीं मिला सकता... डरता है। जब भाजपा राहुल गांधी के ऐसे कृत्यों और कथनों का विरोध करती है तो कांग्रेसजन उनका जोर-शोर से समर्थन करने के लिए आगे आ जाते हैं। इस पर कई बार भाजपा नेताओं की ओर से भी राहुल गांधी पर अमर्यादित टिप्पणियां की जाती हैं। इस तरह भारतीय राजनीति हर दिन पहले से अधिक स्तरहीन होती जा रही है और भाषा की मर्यादा की कोई परवाह नहीं कर रहा है।
आम तौर पर पहले चुनावों के दौरान ही राजनीतिक दलों के बीच एक-दूसरे के प्रति तीखी बयानबाजी होती थी और इस क्रम में कई बार अमर्यादित और अशालीन टिप्पणियां कर दी जाती थीं, लेकिन अब ऐसा सदैव होता रहता है और यहां तक कि संसद के भीतर भी। संसद के बाहर इसके कैसे दुष्परिणाम देखने को मिल रहे हैं, इसका उदाहरण है बिहार में कांग्रेस और राजद के मंच से प्रधानमंत्री की मां को गाली दिया जाना। कांग्रेस ने गाली देने वाले का बचाव तो नहीं किया, लेकिन उसे भाजपा का ही एजेंट करार दिया।
पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर काकरोच जनता पार्टी के धरना-प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कैमरे के सामने जमकर भद्दी गालियां दी गईं। इस दौरान गालियों वाले पोस्टर भी नजर आए। गालियां देने वालों में लड़के-लड़कियां, दोनों थे। किसी भी विरोधी राजनीतिक दल ने इन गालियों का विरोध नहीं किया। काकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ताओं ने इन गालियों को हल्के मजाक की संज्ञा दी।
नारीवादियों ने प्रश्न किया कि क्या बुरा इसलिए लग रहा है कि जेन-जी लड़कियों ने मां-बहन की गालियां दीं? कुल मिलाकर गालीबाजी का बचाव ही किया गया। राजनीतिक मंचों पर भाषाई मर्यादा का उल्लंघन तो कभी-कभार ही देखने को मिलता है, सोशल मीडिया कहे जाने वाले डिजिटल मीडिया प्लेटफार्मों पर यह हर दिन देखने को मिल रहा है। राजनीतिक दलों के आईटी सेल वालों के बीच विरोधी दलों के नेताओं के खिलाफ भद्दी भाषा का इस्तेमाल करने और उनका भोंडे तरीके से मजाक उड़ाने की होड़ लगी है। इस काम में एआई का जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है।
डिजिटल मीडिया पहले से ही विषाक्त था, राजनीतिक दलों के आईटी सेल वालों ने उसे और विषाक्त कर दिया है। चूंकि राजनीतिक दलों के आईटी सेल वाले विरोधी दलों के नेताओं का मान-मर्दन करने में कोई संकोच नहीं कर रहे हैं, इसलिए इन दलों के खुले-छिपे समर्थक मर्यादा की सारी हद पार किए जा रहे हैं। वे विरोधी दलों के नेताओं को नीचा दिखाने के लिए फर्जी खबरें, फोटो और वीडियो थोक के भाव बना रहे हैं।
भाषाई मर्यादा का उल्लंघन केवल कांग्रेस और भाजपा के नेताओं की ओर से ही नहीं किया जा रहा है। ऐसा ही अन्य दलों के नेताओं या उनके आईटी सेल वालों की ओर से भी किया जा रहा है। इन दिनों उत्तर प्रदेश में भाजपा और सपा समर्थक ऐसा ही करने में लगे हुए हैं। अन्य चुनाव वाले राज्यों में भी ऐसा ही होता हुए दिखे तो हैरानी नहीं।
(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)

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