संजय गुप्त। सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या का विवरण रह-रहकर सामने आता ही रहता है। जब ऐसा होता है तो किसी न किसी स्तर पर चिंता व्यक्त की जाती है और फिर सब कुछ पहले की तरह ही चलने लगता है। देखना है कि हाल में आई एक रिपोर्ट पर देश के नीति-नियंता केवल प्रतिक्रिया ही व्यक्त करते हैं या फिर स्थितियों में सुधार के लिए कोई ठोस प्रयत्न भी करेंगे? इस रिपोर्ट के अनुसार देश के उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या 65 लाख से अधिक हो गई है। उच्च न्यायालयों में इतनी बड़ी संख्या में मुकदमों के लंबित होने का मतलब है कि हमारी न्यायिक व्यवस्था देश की प्रगति में आड़े आ रही है।

यह सभी को विदित होना चाहिए कि किसी भी देश और विशेष रूप से विकासशील देश में यदि त्वरित न्याय नहीं होगा तो सामाजिक स्तर पर तो कुंठा बढ़ेगी ही, नियम-कानूनों का समय पर सही तरह पालन भी नहीं हो पाएगा। यह स्थिति केवल जनता को निराश करने का ही काम नहीं करती, बल्कि आर्थिक प्रगति में अवरोध भी बनती है। समस्या केवल यह नहीं है कि उच्च न्यायालयों में बड़ी संख्या में मुकदमे लंबित हैं, समस्या यह भी है कि उच्चतम न्यायालय में भी लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है और निचली अदालतों में भी। एक और विडंबना यह है कि एनसीएलटी और न्यायाधिकरणों मे भी लंबित मामले बढ़ रहे हैं।

यह कहना अनुचित नहीं होगा कि इनमें सरकार और कंपनियों अथवा शेयरधारकों के बीच के विवादित मसले जिस तरह उलझते और लंबे खिंचते रहते हैं, उससे भी स्थितियां बद से बदतर होती दिख रही हैं। कुल मिलाकर न्याय के किसी भी मंच पर समय पर न्याय मिलता कठिन होता जा रहा है।

हाई कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या रेखांकित करने वाली रिपोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में ऐसी याचिकाएं आती रहती हैं, जिनमें उच्च न्यायालयों को मामले के शीघ्र निस्तारण का निर्देश देने की मांग की गई होती है। यह रिपोर्ट यह भी बता रही है कि उच्च न्यायालयों में सबसे अधिक लंबित मामले इलाहाबाद हाई कोर्ट और राजस्थान हाई कोर्ट में हैं। कुछ ऐसा ही हाल बंबई, मद्रास, कर्नाटक और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट समेत अन्य उच्च न्यायालयों का भी है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट में प्रत्येक न्यायाधीश की बेंच को औसतन डेढ़-दौ सौ मामलों की सुनवाई करनी होती है, लेकिन लंबित मामलों की भारी संख्या एक समस्या बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट की समस्या यह है कि वह उच्च न्यायालयों को किसी मामले की शीघ्र सुनवाई के लिए निर्देश नहीं दे सकता। इसका कारण यह है कि यदि वह कुछ मामलों में ऐसा करेगा तो उसके यहां ऐसी याचिकाओं का तांता लग जाएगा, जिनमें मामलों के शीघ्र निस्तारण की मांग की जाएगी।

अच्छा होगा कि हमारे नीति-नियंता यह समझें कि वर्तमान न्याय प्रणाली आम जनता से लेकर कारपोरेट जगत और यहां तक कि शासन-प्रशासन की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही है। समस्या केवल इतनी ही नहीं है कि न्यायाधीशों की कमी है। समस्या न्यायालयों में संसाधनों के अभाव की भी है। एक अन्य समस्या न्यायिक तौर-तरीकों की भी है। इन तरीकों के चलते ही तारीख पर तारीख का सिलसिला कायम हो जाता है। इस समस्या का समाधान तब तक नहीं होगा, जब तक सरकार, न्यायाधीश और वकील उसके निस्तारण के लिए आपस में मिलकर सक्रिय नहीं होते।

इस समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीशों के साथ कार्यपालिका और विधायिका के शीर्ष पदों पर बैठे लोग भी अपनी चिंता व्यक्त कर चुके हैं, लेकिन देश की व्यवस्था से जुड़े तीनों अंग अर्थात न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच समस्या के समाधान के उपायों पर सहमति नहीं बन पा रही है। सभी को समय पर न्याय सुलभ कराने में धन के अभाव से अधिक राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव जिम्मेदार है। यदि न्यायपालिका और कार्यपालिका समय पर न्याय देने के उपायों को लेकर सहमति नहीं कायम कर पातीं तो न्यायिक तंत्र में सुधार होना कठिन ही है।

आज जब देश तेजी से आगे बढ़ रहा है और मोदी सरकार ने भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का एक लक्ष्य रखा है, तब त्वरित न्याय देने वाली प्रक्रिया का निर्माण किया जाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है। न्याय प्रणाली में सुधार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि ऐसे लंबित मामलों की संख्या भी बढ़ रही है, जो एक-डेढ़ या दो दशक पुराने हैं। कई मामलों में यह सामने आ चुका है कि लोग बिना दोषसिद्धि के ही वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं और बाद में निर्दोष साबित होते हैं। कुछ चर्चित मामले भी वर्षों तक लंबित बने रहते हैं। उनके निस्तारण में देरी का मामला रह-रहकर चर्चा में भी आता है, लेकिन अंतिम फैसले की कोई सूरत नहीं नजर आती।

इसका कोई औचित्य नहीं कि एक गंभीर समस्या को लेकर हर स्तर पर चिंता तो जताई जाए, लेकिन उसका कोई समाधान न निकले। यह एक तथ्य है कि लंबित मुकदमों के बोझ को लेकर चिंता जताने का सिलसिला पिछले लगभग दो दशकों से कायम है, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही है। यह सच्चाई चिंतित करने वाली है कि सभी अदालतों और न्यायाधिकरणों में लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ते-बढ़ते पांच करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है। यदि किसी मामले से पांच लोग भी जुड़े हों तो इसका मतलब है कि लगभग 25 करोड़ मुकदमेबाजी में फंसे हैं। तथ्य यह भी है कि तमाम लंबित मामलों और खासकर न्यायाधिकरणों में लंबित मामलों में लाखों करोड़ रुपये की धनराशि भी फंसी हुई है।

देश और समाज के हित में न्यायपालिका और कार्यपालिका को मिलकर बिना किसी देरी के कोई ऐसा ठोस रास्ता निकालना होगा, जिससे लंबित मुकदमे जल्दी निपटें। मुकदमों के एक निश्चित समयसीमा में निस्तारण करने की किसी व्यवस्था का निर्माण आज की अनिवार्य आवश्यकता है। यह समझा जाना चाहिए कि यदि न्याय मिलने में देरी का सिलसिला कायम रहता है तो इससे हर स्तर पर समस्याएं बढ़ेंगी और वे देश का मार्ग अवरुद्ध कर भारत के विकसित राष्ट्र बनने में बाधाएं भी खड़ी करेंगी।

sanjay gupta sir

(लेखक दैनिक जागरण के प्रधान संपादक हैं)