विचार: मजबूत होता सामाजिक सुरक्षा कवच
भविष्य निधि वह भरोसा है कि वर्षों के परिश्रम की पूंजी जरूरत पड़ने पर कामगार और परिवार के साथ खड़ी होगी।
HighLights
वेतन सीमा ₹15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 की गई।
51 लाख अतिरिक्त कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आएंगे।
भविष्य की वित्तीय सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।
कुमार रोहित। केंद्र सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के तहत अनिवार्य कवरेज के लिए वेतन सीमा को ₹15,000 रुपये से बढ़ाकर ₹25,000 रुपये कर दिया है। कामगारों की सामाजिक सुरक्षा के विस्तार की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम है। सरकार के अनुसार, इससे करीब 51 लाख अतिरिक्त कर्मचारी अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा यानी भविष्य निधि के दायरे में आ सकेंगे। इससे कर्मियों के भविष्य निधि में नियोक्ताओं के अंशदान में भी वृद्धि होगी। महीने की पहली तारीख को वेतन मिलते ही एक आम कामगार के सामने कई जरूरतें कतार में खड़ी होती हैं। जैसे कि घर का किराया, राशन, बच्चों की स्कूल फीस, बिजली-पानी के बिल और घर के दूसरे खर्च। आज की कमाई से आज का घर चलाना उसकी पहली चिंता होती है, लेकिन एक सवाल हर महीने उसके साथ घर लौटता है कि कल का क्या होगा? बीमारी आ गई, काम प्रभावित हुआ या उम्र ढलने लगी तो परिवार का सहारा कौन बनेगा? सामाजिक सुरक्षा का असली अर्थ इसी अनिश्चितता को कम करना और मेहनतकश व्यक्ति को भविष्य के प्रति भरोसा देना है।
इस बदलाव की जरूरत को समझने के लिए पिछले एक दशक में हुए परिवर्तनों पर नजर डालना पर्याप्त है। अनिवार्य कवरेज की मौजूदा सीमा वर्ष 2014 में ₹15,000 रुपये निर्धारित की गई थी। तब से भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार और जीवन-यापन की लागत बढ़ी है। विनिर्माण, लाजिस्टिक्स और सेवा क्षेत्र में काम शुरू करने वाले ऐसे कर्मचारियों की संख्या बढ़ी है, जिनकी मासिक आय ₹15,000 रुपये से अधिक है। पुरानी सीमा के कारण इनमें से एक वर्ग अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर रह जाता था। यह अंतर केवल वेतन का नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का भी था। एक ही कार्यस्थल पर काम करने वाले दो कर्मचारियों की आय में मामूली अंतर होने पर उनके सामाजिक सुरक्षा कवरेज में अंतर पैदा हो रहा था। नई सीमा अधिक संख्या में युवा और मध्य आय वर्ग के कामगारों को औपचारिक सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ने का अवसर देती है। इससे सामाजिक सुरक्षा का दायरा व्यापक होने के साथ कामगारों के भविष्य का संस्थागत आधार भी मजबूत होगा।
इस बदलाव का व्यावहारिक पक्ष भी है। जैसे कि भविष्य निधि में कर्मचारी का अंशदान होने से उसके हाथ में आने वाले मासिक वेतन में कुछ कमी हो सकती है, लेकिन भविष्य निधि की मूल अवधारणा ही वर्तमान आय के एक हिस्से को भविष्य की वित्तीय सुरक्षा में बदलने की है। कर्मचारी के अंशदान के साथ नियोक्ता का योगदान भी जुड़ता है और समय के साथ यही राशि सेवानिवृत्ति के बाद उसका आर्थिक संबल बनती है। इसके साथ पेंशन और कर्मचारी बीमा से जुड़े प्रविधान सामाजिक सुरक्षा को व्यापक आधार देते हैं। यहीं सामाजिक सुरक्षा का अर्थ केवल बचत से आगे बढ़कर सम्मान और आत्मनिर्भरता से जुड़ जाता है। कामगार अपने श्रम से केवल परिवार की आज की जरूरतें ही पूरी नहीं करते, वे यह भी चाहते हैं कि नियमित आय सीमित होने पर उनके पास अपना सहारा हो। ऐसे समय में संस्थागत सुरक्षा व्यक्ति और उसके परिवार को आर्थिक कठिनाइयों से उबरने में सहारा देती है। इस अर्थ में सामाजिक सुरक्षा राज्य, नियोक्ता और श्रमिक की साझा जिम्मेदारी है, जिसमें आज का श्रम भविष्य की सुरक्षा का आधार बनता है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा का विस्तार केवल कवरेज बढ़ाने से पूरा नहीं होगा। कामगारों को इसका लाभ आसानी और सम्मान के साथ मिले, यह भी उतना ही जरूरी है। पिछले वर्षों में ईपीएफओ की सेवाओं में डिजिटल माध्यमों, यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (यूएएन) और आनलाइन सेवाओं का विस्तार हुआ है। इससे भविष्य निधि और पेंशन से जुड़ी अनेक प्रक्रियाएं सहज हुई हैं। तकनीक की सफलता तभी है, जब वह कामगारों के लिए व्यवस्था भी सरल बनाए।
जैसे-जैसे अधिक कामगार औपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनेंगे, वैसे-वैसे ऐसी संस्थागत व्यवस्थाओं की जरूरत बढ़ेगी, जो वर्तमान रोजगार से आगे उनके भविष्य को भी सुरक्षा दें। भविष्य निधि सिर्फ जमा की गई रकम नहीं, बल्कि उस भरोसे का नाम है कि वर्षों की मेहनत की कमाई जरूरत के समय कामगारों और उनके परिवार के साथ खड़ी होगी। किसी देश की आर्थिक प्रगति को केवल जीडीपी, नए कारखानों या निवेश से नहीं मापा जा सकता। यह भी देखना होगा कि उस प्रगति में योगदान देने वाले लोगों के जीवन में कितनी सुरक्षा और स्थिरता आई है। आर्थिक विकास और सामाजिक सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं। जब कामगारों के भविष्य को संस्थागत सुरक्षा मिलती है, तब श्रम की गरिमा और आर्थिक विकास का संबंध भी मजबूत होता है। वेतन सीमा को ₹25,000 रुपये तक बढ़ाने का महत्व इसी व्यापक संदर्भ में है। यह अधिक कामगारों को औपचारिक सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाने का अवसर है। इसकी सार्थकता केवल इस बात से नहीं तय होगी कि कितने नए खाते जुड़े, बल्कि इससे भी कि कितने कामगार अपने भविष्य को लेकर अधिक निश्चिंत हुए। मेहनत की कमाई का मूल्य केवल आज का घर चलाने में नहीं है। उसकी एक हिस्सेदारी उस भविष्य के लिए भी हो, जब उम्र, बीमारी या कोई बदलाव जीवन की दिशा बदल दे। सामाजिक सुरक्षा आज की मेहनत का इनाम है। यही मेहनत की कमाई का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।
(लेखक अपर केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त हैं)
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