यह स्वागतयोग्य है कि लंबी प्रतीक्षा के बाद केंद्र सरकार की पहल पर छह राज्य महत्वाकांक्षी किशाऊ बांध परियोजना पर सहमत हुए। गृहमंत्री अमित शाह की उपस्थिति में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने इस परियोजना से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस परियोजना को लेकर हिमाचल की सहमति इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह विपक्ष शासित राज्य है। उसकी सहमति इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि पिछले कुछ समय से कांग्रेस हर मामले में विरोध के लिए विरोध की राजनीति का परिचय देती चली आ रही है। उसके नेतृत्व वाली हिमाचल सरकार की सहमति यह बताती है कि लोक कल्याण के विषयों पर दलगत राजनीतिक हितों से ऊपर उठने की आवश्यकता होती है।

यह अच्छा हुआ कि हिमाचल सरकार ने इस परियोजना के लिए सहमति दी। अभी तक वित्तीय अंशदान के अतिरिक्त इस परियोजना पर सहमति न बन पाने का एक कारण दलगत राजनीति भी रहा। यह जहां संतोषजनक है कि आखिरकार इस परियोजना का रास्ता साफ हो गया, वहीं इसकी अनदेखी भी न की जाए कि इसका प्रस्ताव स्वतंत्रता के पहले किया गया था। किसी परियोजना का आठ दशक से अधिक की देरी से शुरू हो पाना यही बताता है कि भारतीय लोकतंत्र में किस तरह कुछ आवश्यक काम भी अटक जाते हैं। ऐसा लोकतंत्र की अति के चलते होता है। इस अति के चलते ही आम तौर पर हर योजना-परियोजना का विरोध होता है और इसके चलते विकास के अनेक कार्यक्रम देर से शुरू हो पाते हैं।

आम तौर पर पहले राजनीतिक दल किसी परियोजना के विरोध में उतरते हैं, फिर सामाजिक या पर्यावरण समूह। इसके साथ ही उन्हें अदालतों में भी चुनौती दी जाती है। ऐसी परियोजनाओं की गिनती करना कठिन है, जिनके अमल में दशकों की देरी हुई। कुछ तो कभी आगे बढ़ ही नहीं सकीं। जो आगे बढ़ीं, उनकी लागत बढ़ी। किशाऊ बांध परियोजना पर हुआ समझौता उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से में पेयजल और सिंचाई के संकट को दूर करने में सहायक बनेगा। इससे स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन भी सुनिश्चित हो सकेगा।

यह उत्तराखंड के देहरादून और हिमाचल के सिरमौर जिले की सीमा पर टोंस नदी पर निर्मित की जाने वाली एक राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है। चूंकि टोंस यमुना की प्रमुख सहायक नदी है, इसलिए उसमें प्रवाह बनाए रखना आसान होगा और उसे साफ करने में भी मदद मिल सकती है। किशाऊ बांध परियोजना पर छह राज्यों के बीच हुआ समझौता यह बता रहा है कि केंद्र सरकार किस तरह विभिन्न राज्यों के बीच समझौते कराने को लेकर सक्रिय है। पिछले कुछ समय में केंद्र सरकार की सक्रियता के चलते कई राज्यों में नदी जल बंटवारे संबंधी समझौते हुए हैं। यह सिलसिला कायम रहना चाहिए।