विकास सारस्वत। लंबे समय के बाद पिछले कुछ दशकों में हिंदू अपने उत्सवों को बिना बाधा, हर्ष और उल्लास के साथ मना रहे हैं, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि कुछ लोगों के लिए ये उत्सव हुल्लड़ और शोर-शराबे का बहाना बन गए हैं। कुछ उत्सवों के दौरान ऐसे दृश्य आम हैं, जहां घंटों रास्ता रोकने वाली शोभायात्राएं, तेज आवाज में बजता संगीत, अश्लील गाने और नृत्य, राहगीरों के साथ दुर्व्यवहार न केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न बनते हैं, बल्कि इन उत्सवों की शुचिता एवं पवित्रता का मानभंग भी करते हैं। इन आयोजनों में कलात्मकता का अभाव भी दिखाई देता है। एक बड़े क्षेत्र में हिंदू जनजीवन एक उच्च संस्कृति के उत्थान की बाट जोह रहा है।

इस क्रम में आवश्यकता इसकी है कि सार्वजनिक उत्सवों में भी यह नई उच्च संस्कृति परिलक्षित हो। उच्च संस्कृति का अर्थ ऐसी संस्कृति से नहीं है, जो केवल संग्रहालयों, सभागारों या समाज के छोटे वर्ग तक सीमित हो। उच्च संस्कृति वह है, जिसकी अभिव्यक्ति पौराणिक कथाओं, सभ्यतागत प्रतीकों और दर्शन सार को सौंदर्यबोध के साथ मर्यादित रूप में प्रकट करे। ऐसी संस्कृति जो अर्थपूर्ण और सभ्य हो, जो रुचियों को परिष्कृत करे, भावनाओं का उत्सर्ग करे, ध्यान और संवेदनशीलता विकसित करे और समाज को स्वयं के बारे में एक गरिमापूर्ण दृष्टि दे। ऐसा नहीं है कि लोकप्रिय संस्कृति अपने आप में अशिष्ट होती है और केवल कुलीन संस्कृति ही श्रेष्ठ होती हो। उत्तरी हरियाणा की रागिनी से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश का कजरी या चैती गायन या फिर मिथिला की कोहबर और बुंदेली फाग, ये सभी भावपूर्ण और मर्यादित कलाएं रही हैं।

ऐसा ही बृज के चरकुला, हरियाणा के घूमर और मिथिला की झिझिया नृत्य परंपराओं के बारे में कहा जा सकता है, पर यह सत्य है कि तमाम लोक नृत्य और संगीत या तो लुप्त हो रहे हैं या उनमें अश्लीलता का पुट बढ़ने के कारण उनका मूल स्वरूप नष्ट हो रहा है। यह स्थिति दुखद है, क्योंकि उच्च संस्कृति इंद्रियों को उत्तेजित मात्र नहीं करती, बल्कि उनको अनुशासित और उर्ध्वगामी बनाती है। हिंदू सभ्यता के संदर्भ में तो यह और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हिंदू सौंदर्यबोध केवल वस्तुओं को सुंदर बनाने तक सीमित नहीं रहा।

हिंदू चिंतन में रस की अवधारणा है, जो सामान्य भावनाओं को कलात्मक अनुभूति में बदल देती है। भारतीय कला की इसी विशेषता पर बल देते हुए संस्कृति और कला के पुरोधा आनंद कैंटिश कुमारस्वामी ने लिखा है कि भारतीय कला का उद्देश्य केवल मूर्त वस्तुओं की अच्छी नकल करना नहीं, बल्कि उसके माध्यम से उच्च आदर्शों और गहरे सत्य को प्रकट करना है। उनके मतानुसार कलाकार के लिए दृश्य सुंदरता शाश्वत को प्रकट करने का अनुशासित माध्यम है।

श्री अरविंद ने कला के पतन के विषय में चेतावनी देते हुए कहा था कि अनुशासन खो देने पर कला 'तुच्छ, भड़कीली, इंद्रियप्रधान, सस्ती और अशिष्ट' बन सकती है। उनके लिए श्रेष्ठ कला बुद्धि, भावना और चरित्र को ऊपर उठाने वाली शक्ति थी। बकौल श्री अरविंद किसी समाज का सौंदर्यबोध केवल स्वाद का विषय नहीं होता, बल्कि वह धीरे-धीरे उस समाज का चरित्र बन जाता है। कुछ धार्मिक उत्सवों में अश्लील नाच-गाने की घटनाएं श्री अरविंद की चेतावनी को ही चरितार्थ करती हैं।

उत्सवों का स्वरूप कितना सुंदर हो सकता है, उसका एक सुंदर उदाहरण बीते दिनों गुरुवायूर में होने वाले जन्माष्टमी उत्सव के दौरान दिखा। केरलम में इस उत्सव में पुष्परचनाओं, दीप प्रज्वलन, कृष्ण गोपिका नृत्य, उरियाडी यानि मटकी फोड़ने की रस्म, शोभायात्रा, भक्ति-संगीत और पारंपरिक वाद्यवृंद ने मिलकर ऐसा जादू रचा, जिसमें उत्सव, भक्ति और सौंदर्य का अद्भुत मिश्रण था। ऐसा नहीं है कि गुरुवायूर ने कोई आधुनिक उपाय खोजा। वहां पारंपरिक तौर-तरीकों को ही अपनाया गया।

इन्हीं पारंपरिक तत्वों के समायोजन से गणपति शोभायात्रा में अभंग, शास्त्रीय और लोक संगीत, सुव्यवस्थित वाद्यवृंद, ध्वज-पताकाएं एवं प्रामाणिक हिंदू प्रतीकों पर आधारित सज्जा और पौराणिक कथाओं पर आधारित नाट्य प्रस्तुतियां संभव हैं। जन्माष्टमी में नृत्य, कीर्तन, कविता, नाटक, चित्रकला, कथा-वाचन और कलात्मक प्रकाश-सज्जा हो सकती है। नवरात्रि भी केवल कानफोड़ू संगीत के बजाय कर्णप्रिय संगीत, नृत्य, साहित्य, वेशभूषा और देवी-परंपरा के अर्थ को समझने वाला नौ दिनों का सांस्कृतिक पर्व बन सकता है।

प्रश्न यह है कि इस परिवर्तन का नेतृत्व कौन करे? इसकी जिम्मेदारी सरकार पर नहीं छोड़ी जा सकती और न ही यह आशा की जा सकती है कि अपने आप कोई नई संस्कृति जन्म लेगी। इसके लिए मंदिरों, धार्मिक संस्थाओं, सांस्कृतिक संगठनों, विश्वविद्यालयों, कलाकारों और जागरूक सामाजिक नेतृत्व को आगे आना होगा। बड़े मंदिर न्यास और धार्मिक संगठन विशेष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि उनके पास संसाधन और प्रभाव, दोनों हैं। वे संगीत, नृत्य, नाटक, चित्रकला, उत्सव-सज्जा और शोभायात्रा में नवाचार को प्रोत्साहित कर सकते हैं।

सरकार और नगरपालिकाएं आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करा सकती हैं, किंतु रचनात्मक नेतृत्व समाज के भीतर से आना होगा। संपन्न भक्त और सांस्कृतिक न्यास भी अपना धन केवल विशाल पंडालों और कानफोड़ू संगीत पर न लगाकर कलाकारों और नई सांस्कृतिक रचनाओं को संरक्षण देने में लगा सकते हैं। उद्देश्य यह नहीं कि हिंदू उत्सवों को गंभीर शास्त्रीय संगीत समारोह बना दिया जाए या फिर उन्हें हास्य, रंग, खेल और सरल-सहज भक्ति से विहीन किया जाए। उद्देश्य उन्हें अधिक सुंदर, कल्पनाशील और सौम्य बनाना होना चाहिए। किसी सभ्यता की गंभीरता तब दिखाई देती है, जब वह उन रूपों को गंभीरता से लेने लगती है, जिनके माध्यम से वह स्वयं को व्यक्त करती है। हिंदू उच्च संस्कृति के पुनर्निर्माण में लोक-जीवन को ऊपर उठाने का प्रयास होना चाहिए।

(लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)