आनंद कुमार। नई दिल्ली में भारत की अध्यक्षता में आयोजित 18वां ब्रिक्स सम्मेलन केवल एक बहुपक्षीय आयोजन नहीं था। यह बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिका और उसके कूटनीतिक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण संकेतक भी रहा। सम्मेलन में वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार, ग्लोबल साउथ की अधिक भागीदारी, तकनीक और महत्वपूर्ण खनिजों के बढ़ते रणनीतिक महत्व तथा आपूर्ति शृंखलाओं की मजबूती जैसे मुद्दे प्रमुख रहे। हालांकि भारत के लिए इस सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण पक्ष चीन के साथ संबंधों में स्थिरता के रूप में भी दिखा।

सम्मेलन के दौरान भारत का जोर इस पर रहा कि ग्लोबल साउथ वैश्विक संकटों का सबसे अधिक सामना करता है, लेकिन वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उसकी भूमिका अभी भी अपेक्षाकृत सीमित है। इस क्रम में नई दिल्ली घोषणापत्र का सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाना भी महत्वपूर्ण है। विस्तारित ब्रिक्स में ऐसे देश शामिल हैं, जिनके बीच राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक मतभेद हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है, रूस और पश्चिम के बीच गंभीर टकराव है तथा ईरान के पश्चिमी देशों के साथ संबंध तनावपूर्ण हैं। इसके बावजूद ब्रिक्स देश वैश्विक शासन, विकास, तकनीक और बहुपक्षीय सहयोग जैसे मुद्दों पर सहमति बनाने में सफल रहे। यह बताता है कि ब्रिक्स किसी एक विचारधारा या किसी विशेष देश के विरोध का मंच बनने के बजाय विभिन्न शक्तियों के बीच सहयोग का व्यावहारिक मंच बनने की क्षमता रखता है।

भारत-चीन संबंधों में आई नई हलचल को भी देखा जाना चाहिए। 2020 में पूर्वी लद्दाख में सैन्य टकराव के बाद दोनों देशों के संबंधों में गंभीर गिरावट आई थी। ऐसे में शी चिनफिंग की सात वर्ष बाद भारत यात्रा और प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी बातचीत इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि दोनों देश संबंधों को पूरी तरह टकराव के रास्ते पर जाने से रोकना चाहते हैं। मोदी और शी की बैठक में दोनों नेताओं ने संबंधों को दीर्घकालिक और रणनीतिक दृष्टि से देखने पर जोर दिया।

भारत ने यह स्पष्ट किया कि सीमा पर शांति और स्थिरता व्यापक द्विपक्षीय संबंधों की प्रगति के लिए आवश्यक है। चीन की ओर से भी भारत-चीन संबंधों को दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखने और साझा विकास पर सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया गया। यह भाषा अपने आप में कोई बड़ी सफलता नहीं है, लेकिन लंबे समय तक चले तनाव के बाद संवाद की वापसी का संकेत जरूर है। भारत-चीन संबंधों के मौजूदा चरण को ‘समझौते’ से अधिक ‘स्थिरीकरण’ कहना उचित होगा। दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर अनेक मतभेद अभी भी कायम हैं। चीन के साथ संबंधों में स्थिरता का अर्थ यह नहीं है कि भारत अपनी सुरक्षा तैयारियों को कम कर दे। भारत की रणनीति तो यह होनी चाहिए कि सीमा पर मजबूत सैन्य स्थिति बनाए रखते हुए राजनीतिक और राजनयिक संवाद को निरंतर जारी रखा जाए।

ब्रिक्स में प्रधानमंत्री मोदी, शी चिनफिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तस्वीरों को कुछ लोग भारत-रूस-चीन के किसी नए रणनीतिक त्रिकोण के संकेत के रूप में देख सकते हैं, लेकिन ऐसा निष्कर्ष जल्दबाजी होगा। तीनों देशों के हित और रणनीतिक प्राथमिकताएं काफी अलग हैं। भारत के अमेरिका के साथ भी संबंध हैं। चीन भारत का प्रमुख रणनीतिक प्रतिस्पर्धी है और रूस की चीन पर बढ़ती निर्भरता ने भारत-रूस-चीन त्रिकोण की पुरानी प्रकृति को बदल दिया है। ब्रिक्स ऐसा मंच है, जहां देशों को अपने सभी द्विपक्षीय मतभेद समाप्त किए बिना भी साझा मुद्दों पर सहयोग करने का अवसर मिलता है।

भारत और चीन सीमा पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, लेकिन वैश्विक शासन सुधार, विकास, जलवायु परिवर्तन, तकनीक और ग्लोबल साउथ के हितों पर सहयोग भी कर सकते हैं। यही बहुपक्षीय कूटनीति की वास्तविक शक्ति है। भारत की विदेश नीति के लिए यह लचीलापन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी मजबूत कर सकता है, रूस के साथ पारंपरिक संबंध बनाए रख सकता है, ईरान और पश्चिम एशिया के देशों से संपर्क बढ़ा सकता है और साथ ही चीन के साथ स्थिर संबंधों की कोशिश कर सकता है।

भारत-चीन संबंधों में आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। दोनों देशों के बीच व्यापार काफी बढ़ा हुआ है, लेकिन भारत के लिए व्यापार घाटा, बाजार पहुंच, तकनीकी निर्भरता और महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा गंभीर चिंता के विषय हैं। यह न भूला जाए कि राजनीतिक संबंधों में सुधार तभी टिकाऊ होगा जब आर्थिक संबंधों में भी अधिक संतुलन और पारदर्शिता आए। भारत को चीन के साथ आर्थिक संपर्क बढ़ाने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए, लेकिन महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण भी जारी रखना होगा। भारत और चीन के बीच कुछ मुद्दों पर मतभेद बने रहेंगे। वास्तविक चुनौती यह है कि इसे ऐसे संतुलित किया जाए कि वे सैन्य संकट में न बदलें।

इस क्रम में सात वर्ष बाद शी चिनफिंग की भारत यात्रा, मोदी से बातचीत, सीमा पर चीनी सैन्य तैनाती में कमी और विभिन्न संवाद तंत्रों की सक्रियता इसके संकेत हैं कि दोनों देश संबंधों में एक नई स्थिरता तलाश रहे हैं, लेकिन इसे अंतिम सफलता मानना उचित नहीं। यदि आने वाले महीनों में भारत और चीन सीमा पर तनाव को नियंत्रित रखते हुए सैन्य और राजनयिक संवाद जारी रखते हैं, आर्थिक मुद्दों पर व्यावहारिक बातचीत करते हैं और नेतृत्व स्तर पर नियमित संपर्क बनाए रखते हैं, तो दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा को अधिक पूर्वानुमेय बनाया जा सकता है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी उपयोगी होगी, क्योंकि इससे वह अपने आर्थिक विकास, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक भूमिका पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेगा। बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत के हित में इससे बेहतर स्थिति फिलहाल कोई दूसरी नहीं हो सकती।

(लेखक मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान में एसोसिएट फेलो हैं)