राजकुमार सिंह। भूपेश बघेल की जगह सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाने से राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िग के बीच अंतर्कलह थामने में कांग्रेस आलाकमान को कितनी सफलता मिलेगी यह तो समय ही बताएगा, लेकिन कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने ही पंजाब के चुनावी समर में अपनी कमान राजस्थानी सेनापतियों को सौंप दी है। पायलट की तरह भाजपा के प्रभारी सतीश पूनिया भी राजस्थान के ही हैं।

पंजाब में सत्ता के सभी खिलाड़ी अपने दांव बड़ी सावधानी से चल रहे हैं। दिल्ली की सत्ता से बेदखल आम आदमी पार्टी के पास अब पंजाब की सत्ता ही बची है तो हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना के बाद कांग्रेस को भी वहां सत्ता में वापसी की संभावनाएं दिख रही हैं। पंथक राजनीति करने वाला शिरोमणि अकाली दल खुद को पंजाब की सत्ता का स्वाभाविक दावेदार मानता है तो देश के दो-तिहाई राज्यों की सत्ता पर काबिज भाजपा को भी इस सीमावर्ती संवेदनशील राज्य की सत्ता चाहिए। भाजपा-अकाली मिल कर कई बार पंजाब पर राज कर चुके हैं, पर फिलहाल रास्ते अलग-अलग हैं। ‘वारिस पंजाब दे’ अपने अलगाववादी एजेंडा को उभारने की फिराक में हैं।

बेशक विधानसभा चुनाव अगले साल फरवरी में हैं, लेकिन चुनावी बिसात बिछाई जाने लगी है। सात राज्यसभा सदस्यों के दलबदल से जहां आप को झटका लगा है, वहीं भाजपा के हौसले बुलंद हुए हैं कि सत्तारूढ़ दल छोड़कर इन सांसदों ने उसका दामन थामा। अपने छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की दूसरी बार पंजाब विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष पद पर जीत से भी भाजपा के हौसले बुलंद हैं, क्योंकि पंजाब में सत्तारूढ़ आप का छात्र संगठन दूसरे और सत्ता की प्रबल दावेदार कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआइ तीसरे स्थान पर रहा। जुलाई में जंतर-मंतर पर ‘जेन-जी’ आंदोलन से बदले माहौल में यह जीत भाजपा के लिए और भी राहतकारी है।

शिरोमणि अकाली दल के छात्र संगठन सोई द्वारा एबीवीपी को समर्थन के भी चुनावी अर्थ निकाले जा रहे हैं। ध्यान रहे प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद अकाली दल प्रधान सुखबीर सिंह बादल परिसीमन विधेयक के समर्थन का एलान भी कर चुके हैं। इस घटनाक्रम को भाजपा-अकाली गठबंधन की संभावना के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। सत्ता संघर्ष आप और कांग्रेस के बीच ही सिमट जाने का जोखिम भाजपा और अकाली दल में से कोई नहीं उठाना चाहेगा। 2022 के विधानसभा चुनाव अकेले लड़ कर दोनों दल अपनी-अपनी ताकत भी आंक चुके हैं। अकाली दल तीन सीट जीत पाया तो भाजपा दो।

विवादास्पद कृषि कानूनों के मुद्दे पर दोनों की दशकों पुरानी दोस्ती टूट गई। आप के अप्रत्याशित उभार ने अकाली दल और भाजपा को राज्य की राजनीति में तीसरे और चौथे स्थान पर धकेल दिया। पिछले लोकसभा चुनाव में ‘वारिस पंजाब दे’ के नाम पर अमृतपाल सिंह की जीत ने भी खासकर भाजपा और अकाली दल की चिंताएं बढ़ाई हैं। इसलिए विधानसभा चुनाव पंजाब की राजनीतिक दिशा तय करने में बेहद महत्वपूर्ण हो सकते हैं। सत्तारूढ़ आप को मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस चुनौती दे सकता है, लेकिन दोनों में अंतकर्लह कम नहीं।

पिछले विधानसभा चुनाव से पहले अपना चुनावी खेल खुद बिगाड़ लेने वाली कांग्रेस ने इस बार प्रदेश प्रभारी बदल कर पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी और प्रदेश अध्यक्ष राजा वड़िग के बीच अंतर्कलह थामने की कोशिश की है। दलित कार्ड खेलते हुए कांग्रेस ने चन्नी को पिछली बार मुख्यमंत्री बनाया था, लेकिन वह दोनों विधानसभा सीट से चुनाव हार गए। दोनों ही इस समय लोकसभा सदस्य हैं। बड़ी संख्या में दलित कांग्रेस को वोट देते रहे हैं। इसीलिए कांग्रेस चन्नी को यथासंभव संतुष्ट करने की कोशिश कर रही है।

मायावती की बसपा का अकेले चुनाव लड़ने का एलान भी कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं। 2022 का विधानसभा चुनाव बसपा शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन कर 20 सीटों पर लड़ी थी और नवांशहर की सीट जीत भी गई थी। संस्थापक काशीराम का गृह राज्य होने और देश में सबसे ज्यादा 32 प्रतिशत दलित आबादी होने के बावजूद बसपा का पंजाब में कभी बड़ी राजनीतिक ताकत न बन पाना एक राजनीतिक पहेली है। भाजपा की सारी उम्मीदें पंजाब में बहुकोणीय चुनावी मुकाबले की संभावना पर टिकी हैं, लेकिन उसका लाभ मिलने की कोई गारंटी नहीं। सत्ता के लिए मुख्य मुकाबला आप और कांग्रेस के बीच होने से रोकने के लिए भी भाजपा-अकाली गठबंधन जरूरी लगता है।

सभी 117 सीटों पर अकेले दम लड़ने की हुंकार भरनेवाली भाजपा 40-45 सीटों से कम पर शायद ही माने। सीमावर्ती संवेदनशील राज्य के रूप में पंजाब की बहुआयामी चुनौतियों के मद्देनजर भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के गठबंधन को राज्य के व्यापक हित में माननेवाले भी कम नहीं। सुखबीर सिंह बादल का अकाली दल जहां मुख्यत: ग्रामीण क्षेत्रों और सिख समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं भाजपा शहरी क्षेत्रों और हिंदू समुदाय का। इसीलिए माना जाता है कि दोनों के बीच गठबंधन की बहाली से पंजाब में राजनीतिक के साथ-साथ सामाजिक एकता भी मजबूत होगी। पंजाब आतंकवाद की अंधेरी सुरंग से तो निकल आया है, लेकिन अभी भी अनेक विघ्नसंतोषी तत्व फिर माहौल बिगाड़ने के खतरनाक मंसूबे पाले हुए हैं, जिन्हें नाकाम करना सामूहिक जिम्मेदारी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)