राजीव सचान। किसी प्रकरण को अपने एजेंडे के हिसाब से तूल देकर अथवा उसकी अनदेखी कर समाज की चिंतनधारा को प्रभावित करने का काम किस तरह होता है और उसके लिए नैरेटिव गढ़ने वाला इकोसिस्टम कैसे काम करता है या नहीं करता, इसका ताजा उदाहरण है कि केरलम के उस मौलाना के प्रति नरम रवैया, जिसने कहा था कि महिलाएं घर से बाहर निकलीं तो तबाही होगी। तालिबानी सोच वाले ये मौलाना हैं शेख अबूबकर अहमद। उन्हें केरल का ग्रैंड मुफ्ती कहा जाता है। उनकी हैसियत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उनके समर्थकों के दबाव के चलते केरलम के उस बिग टीवी को माफी मांगनी पड़ी, जिसने इस मुद्दे पर चर्चा की थी।

दबाव इतना था कि टीवी चैनल ने माफी मांगने के साथ ही इस बहस का वीडियो भी हटा दिया। इतना ही नहीं, उक्त बहस को संचालित करने वाली चैनल की पत्रकार अपर्णा के खिलाफ एफआइआर भी दर्ज कर दी गई-इस आरोप में कि उन्होंने माहौल बिगाड़ने और दंगे भड़काने का काम किया। यह तब हुआ, जब अपर्णा ने भी माफी मांग ली थी। यह सब कांग्रेस के शासन वाले केरलम में हुआ। गौर करें कि कांग्रेस के सर्वमान्य नेता राहुल गांधी ने कुछ दिनों पहले ही मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए पितृसत्ता से लड़ने और उसे ध्वस्त करने की जरूरत जताई थी, लेकिन अबूबकर के बयान पर उन्हें सांप सा सूंघ गया। सनद रहे कि केरलम की कांग्रेस सरकार मुस्लिम लीग के समर्थन से चल रही है और प्रियंका गांधी वाड्रा उस वायनाड से सांसद हैं, जो लीग का गढ़ है।

हालांकि केरलम के मुख्यमंत्री ने मौलाना अबूबकर के बयान से असहमति जताई, लेकिन राहुल गांधी के मौन रहने के चलते कांग्रेस के किसी केंद्रीय नेता ने मौलाना के खिलाफ मुंह खोलने का साहस नहीं दिखाया। जो केरलम प्रगतिशीलता के लिए जाना जाता है और जहां की तमाम महिलाएं कामकाजी हैं, उसके ग्रैंड मुफ्ती अबूबकर ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर नहीं जाना चाहिए। उन्होंने महिलाओं की तुलना सोने के गहनों से की थी, जिन्हें डिब्बे में सुरक्षित रखा जाता है। वैसे यह वह केरलम भी है, जहां इजरायल पर भीषण हमला करने वाले हमास के नेता का भाषण प्रसारित हुआ और जहां के अनेक युवा इस्लामिक स्टेट और अलकायदा में शामिल होने जा चुके हैं।

अबूबकर के घनघोर पितृसत्तावादी सोच और अपर्णा के खिलाफ एफआइआर दर्ज किए जाने पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के वे पैरोकार भी करीब-करीब मौन ही रहे, जिन्होंने किसी अन्य पंथ के धर्मगुरु के ऐसे ही बयान पर आसमान सिर पर उठा लिया होता। मीडिया के एक बड़े हिस्से ने भी इस मामले को महत्व देना जरूरी नहीं समझा। कोई भी समझ सकता है कि इसीलिए कि यह प्रकरण उनके नैरेटिव के मनमाफिक नहीं था। उन्हें इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ा कि ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने आए मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने केरलम दौर पर अबूबकर से भेंट करना आवश्यक समझा। उनके अबूबकर से मिलने पर हैरानी भी नहीं, क्योंकि उन्होंने जिहादी सोच वाले जाकिर नाइक को अपने यहां शरण दे रखी है।

जिस इकोसिस्टम को मौलाना अबूबकर के महिलाओं को पर्दे और घर में रखने वाले बयान पर कोई खास परेशानी नहीं हुई, वह जेएनयू के उन प्रोफेसर को लेकर भी नरम है, जिन पर विश्वविद्यालय की 11 छात्राओं ने यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। ये आरोप करीब चार महीने पहले लगाए गए थे, लेकिन कहीं कोई कार्रवाई नहीं हुई। एक तो शायद इसलिए कि प्रोफेसर मणिपुर से कांग्रेस के सांसद हैं और जेएनयू में वामपंथियों का बोलबाला है। कांग्रेस और वामपंथियों की जुगलबंदी किसी से छिपी नहीं।

आरोपित प्रोफेसर के खिलाफ कोई कार्रवाई न होते देखकर दिल्ली महिला आयोग ने जेएनयू कुलपति को नोटिस देकर विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति की ओर से की गई कार्रवाई के सिलसिले में तीन दिन के भीतर रिपोर्ट मांगी है। आयोग ने आरोपों का स्वतः संज्ञान लिया। इस मामले में जेएनयू की आंतरिक शिकायत समिति क्यों मौन धारण किए रही, यह एक रहस्य है। यह रहस्य के साथ ही एक विडंबना भी है, क्योंकि इस समिति की अध्यक्ष एक महिला प्रोफेसर हैं। इस प्रकरण पर कांग्रेस और वामपंथी नेताओं के साथ इन दलों के छात्र संगठन भी चुप्पी साधे हुए हैं और मीडिया का एक हिस्सा भी इस मामले की चर्चा करने से बचता ही दिख रहा है। स्पष्ट है कि इसीलिए यह मामला उसके एजेंडे को सूट नहीं कर रहा है। इसी तरह का एक मामला सुप्रीम कोर्ट की ओर से काकरोच जनता पार्टी के संसद चलो मार्च में हिंसा के लिए जिम्मेदार तत्वों पर दर्ज की गई सभी एफआइआर वापस लिए जाने का भी है।

सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक अतीत वालों को छोड़कर शेष सबको माफी दे दी। सबने इस फैसले पर संतोष जताया। किसी ने सवाल नहीं खड़ा किया कि आखिर सुप्रीम कोर्ट ने कैसे जाना कि हिंसा केवल आपराधिक अतीत वालों ने की? यह क्या दिखाता है? यह नैरेटिव बनाने वाले इकोसिस्टम की ताकत दिखाता है। देश में वह इकोसिस्टम हावी है, जो अपनी पसंद के किसी मुद्दे को खास दिशा देने या किसी विशेष विचारधारा को स्थापित करने के लिए एक उद्योग की तरह काम करता है और इस तरह लोगों के सोचने के तरीके को प्रभावित करता है।

(लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं)