जागरण संपादकीय: अमेरिका की मनमानी
यह संभव नहीं कि अमेरिका मनमानी करता रहे और भारत चुपचाप उसे सहता रहे। यदि अमेरिका ने अपना रवैया नहीं बदला तो भारत के साथ उसके संबंध और अधिक बिगड़ने तय हैं।
HighLights
आखिरकार अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने भी रूस से तेल आयात करने वाले भारत समेत पांच प्रमुख देशों पर सौ प्रतिशत टैरिफ लगाने वाले बिल को स्वीकृति दे दी। इससे पहले सीनेट भी इस विधेयक को मंजूरी दे चुकी है। यदि अमेरिकी राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर कर देते हैं तो भारत, चीन के अतिरिक्त हंगरी, स्लोवाकिया और अजरबैजान पर अमेरिकी टैरिफ और अधिक बढ़ जाएगा। देखना है कि यह सौ प्रतिशत होता है या उससे कम? देखना यह भी है कि अमेरिकी राष्ट्रपति इस विधेयक पर हस्ताक्षर करते हैं अथवा उसे रूस से तेल खरीदने वाले देशों को केवल दबाव में लेने का जरिया बनाना चाहते हैं। जो भी हो, यदि अमेरिका भारत पर मनमाने तरीके से टैरिफ लगाता है तो अपने अहंकार का ही परिचय देगा।
अमेरिकी राष्ट्रपति और उक्त विधेयक का समर्थन करने वाले पक्ष-विपक्ष के सांसदों का यह मानना है कि रूस से तेल खरीदने वाले देशों को टैरिफ के जरिये दंडित करने से वह यूक्रेन के खिलाफ अपना युद्ध जारी रखने में असमर्थ हो जाएगा। यह सही है कि रूस यूक्रेन के खिलाफ एक अंतहीन और एक तरह से निरर्थक लड़ाई लड़ रहा है, लेकिन यह कहना समस्या का सरलीकरण ही है कि यह युद्ध भारत, चीन जैसे देशों के कारण जारी है। क्या यह विचित्र नहीं कि अमेरिका अपने ही द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध को तो रोक नहीं पा रहा है और भारत, चीन आदि पर इसका दोष मढ़ रहा है कि वे यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में रूस की सहायता कर रहे हैं?
यह अच्छा हुआ कि भारत ने अमेरिका की मनमानी का परिचय देने वाले विधेयक पर दो टूक कहा कि वह अपने ऊर्जा हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। भारत ने यह कहने में भी संकोच नहीं किया कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा के लिए हरसंभव उपाय करेगा। इसका संकेत यही है कि यदि अमेरिका रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर सचमुच टैरिफ बढ़ाता है तो उसे इसका जवाब भी दिया जाएगा। यह संभव नहीं कि अमेरिका मनमानी करता रहे और भारत चुपचाप उसे सहता रहे। यदि अमेरिका ने अपना रवैया नहीं बदला तो भारत के साथ उसके संबंध और अधिक बिगड़ने तय हैं।
यह भी संभव है कि अमेरिका के साथ होने वाला व्यापार समझौता अंतिम रूप न ले सके। अमेरिका को यह समझना होगा कि ताली एक हाथ से नहीं बजती। यदि वह भारत से संबंध सुधारना चाहता है तो उसे मित्रवत व्यवहार करना होगा। उसे इसका भी आभास होना चाहिए कि यदि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर दे तो एक तो उसके ऊर्जा हित खतरे में पड़ जाएंगे और दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम और अधिक बढ़ जाएंगे। ध्यान रहे पश्चिम एशिया संकट के कारण ये पहले से ही बढ़े हुए हैं और यह संकट अमेरिका ने ही खड़ा किया है।
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