जगमोहन सिंह राजपूत। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन यानी ओईसीडी के अंतरराष्ट्रीय छात्र मूल्यांकन कार्यक्रम (पीसा) की इन दिनों पूरी दुनिया में चर्चा है। समूह में सम्मिलित देशों के अतिरिक्त शिक्षा सुधार में रुचि लेने वाले देशों में भी इसकी चर्चा हो रही है। रिपोर्ट 15-वर्ष आयु वर्ग के 91 देशों और अर्थव्यवस्थाओं के 7,60,000 बच्चों की 2025 में अर्जित उपलब्धियों का अध्ययन एवं विश्लेषण प्रस्तुत करती है। यह गणित, विज्ञान एवं अन्य विषयों को पढ़ने की क्षमताओं पर केंद्रित है। पीसा की प्रक्रिया वर्ष 2000 में प्रारंभ हुई थी।

भारत ने केवल 2009 में ही इसमें भाग लिया और उस अध्ययन को तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश के बच्चों पर केंद्रित किया गया। उसमें भारत का शैक्षिक स्तर 73 और 74वें क्रम पर रहा। इससे देश की किरकिरी हुई और तत्कालीन सरकार ने इसमें भागीदारी पर विराम लगा दिया। भले ही भारत ने 2025 के कार्यक्रम में भाग न लिया हो, लेकिन इसके परिणामों का अध्ययन अत्यंत लाभदायक हो सकता है, क्योंकि जिस तेजी से इतिहास के इस मोड़ पर शैक्षिक परिवर्तन हो रहे हैं, वह कल्पनातीत है। ऐसे में सारी व्यवस्था और उसकी कार्यसंस्कृति में त्वरित सुधार ही गतिशीलता बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं।

वर्ष 2025 की इस रिपोर्ट को वर्तमान परिस्थितिजन्य और शिक्षणशास्त्रीय परिवर्तन को ध्यान में रखकर देखें तो स्पष्ट हो जाएगा कि पीसा रिपोर्ट के निष्कर्ष में कुछ भी अनपेक्षित नहीं। इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस वर्षों में पढ़ने या कहें कि पढ़ने के कौशल में रुचि में 28 पाइंट का औसत घटाव हुआ है। यह वैसा ही है, जैसा भारत में हर सतर्क और सजग अध्यापक देख रहा है। वैसे यह घटाव केवल ओईसीडी देशों में ही था। बाकी में इसमें पहले जैसा ही ठहराव मिला।

संभवतः उन देशों में मोबाइल, इंटरनेट और एआई का प्रवेश सीमित रहा होगा। रिपोर्ट में यह तथ्य भी दोहराया गया कि संसाधनों की कमी और सक्षम तथा प्रशिक्षित अध्यापकों का अभाव अभी भी एक विश्वव्यापी समस्या है। कहीं कम कहीं ज्यादा। बच्चों की रुचियां भी तेजी से बदल रही हैं। उनके तनाव के मोर्चे बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में उन्हें प्रशिक्षित और संवेदनशील अध्यपक ही नहीं, अपितु उचित छात्र-अध्यापक अनुपात में परामर्शदाता भी चाहिए, जो अधिक समय देकर उन्हें सही दिशा में सोचने और समझने के साथ ही उनमें संवेदनशीलता के भाव को विकसित करा सकें।

पीसा रिपोर्ट ने विज्ञान से प्राप्त तथ्यों और साक्ष्यों के सूक्ष्म विश्लेषण की क्षमता के आकलन का भी प्रयास किया। यह भी देखा है कि अपने समक्ष अपार सूचना भंडार में से सही और गलत का भेद करने के कौशल की क्या स्थिति है। यह न भूला जाए कि आने वाली पीढ़ी को जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं के समाधान ढूंढ़ने होंगे। यह सोच भारत में पाठ्यक्रम तैयार करने वाले विशेषज्ञों को भी अपनाना चाहिए। आज भी भारत में ऐसे संस्थान खुलते जा रहे हैं, जो दशकों पहले की आवश्यकतानुसार तैयार हुए पाठ्यक्रम ही पढ़ा रहे हैं। पीसा रिपोर्ट के निष्कर्ष देखकर मेरे जैसे अध्यापकों को अपनी स्थिति और कमियों को लेकर चिंताग्रस्त होना स्वाभाविक है।

टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेज के एक सर्वेक्षण के अनुसार देश के 48 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में एक अध्यापक एक साथ कई कक्षाओं को पढ़ाता है, क्योंकि अध्यापकों की कमी है। इस कमी के बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों के 54 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों के 47 प्रतिशत अध्यापक अपने वर्ग को चुनावों, जनगणना जैसे प्रशासनिक कार्यों में लगाए जाने को बच्चों के लिए अहितकर मानते हैं। ऐसी परिस्थितियां स्कूलों की कार्यसंस्कृति में हताशा, निराशा और अपमान भाव को जन्म देती हैं। क्या शिक्षा के मूल अधिकार अधिनियम में यह उत्तरदायित्व निहित नहीं है कि सुयोग्य, निष्ठावान तथा संवेदनशील अध्यापक मिलना भी बच्चे का मूल अधिकार है?

केंद्र सरकार ने 1986/92 की शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के समय ‘आपरेशन ब्लैकबोर्ड’ नाम से एक परियोजना चलाई थी। इसमें लक्ष्य यह रखा गया था कि एक-कमरे-एक अध्यापक वाले हर स्कूल को त्वरित गति से कम से कम दो कमरे-दो अध्यापक वाले स्कूलों में परिवर्तित किया जाए। इसका सारा व्यय केंद्र सरकार ने उठाया। ये दोनों लक्ष्य प्राप्त कर लिए गए थे। हालांकि व्यवस्थागत शिथिलता का परिणाम यह है कि आज भी भारत में एक लाख से अधिक एक-अध्यापक वाले स्कूल हैं। परिणामस्वरूप लोग निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं और इसमें निजी स्कूलों की मनमानी लगातार बढ़ रही है। सरकारी स्कूलों की साख घटी है और वहां वही बच्चे पढ़ रहे हैं, जिनके पास और कोई विकल्प नहीं है। पिछले दशक में एक लाख के करीब सरकारी स्कूल बंद हुए हैं।

पीसा रिपोर्ट के रुझानों से भारत भी अछूता नहीं है। इसलिए हमारे नीति-नियंताओं को भी इस पर विचार करना चाहिए। इससे उपजी सामान्य समझ तो यही कहती है कि योग्य अध्यापकों की आवश्यकता की सदा महत्ता रही है। बस अब अध्यापक के उत्तरदायित्व की दिशा बच्चे की मानसिक और संवेदनात्मक अवस्था को स्वस्थ बनाए रखने जैसी आवश्यकताओं की ओर भी मोड़नी होगी। इसके लिए अध्यापक प्रशिक्षण संस्थानों में त्वरित आमूलचूल परिवर्तन आरंभ करने होंगे।

(लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)