विचार: फिर उठा वैवाहिक दुष्कर्म का प्रश्न
हमें यह समझना होगा कि हर सामाजिक समस्या का समाधान कानून के माध्यम से तलाशना उचित नहीं है
HighLights
सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया।
केंद्र सरकार ने वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध बनाने का विरोध किया है।
मौजूदा कानून महिला यौन हिंसा से संरक्षण देते हैं, नए कानून पर विचार।
प्रो. ऋतु सारस्वत। हाल में 'ऋषिकेश साहू बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य' मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़े एक ऐसे प्रश्न को सामने रखा, जिसका उत्तर केवल कानून की किसी एक धारा में तलाशना आसान नहीं है। अदालत यह विचार कर रही थी कि जब तक विवाह के भीतर पति द्वारा पत्नी के साथ बनाए यौन संबंध को दुष्कर्म की श्रेणी से बाहर रखने वाले कानूनी अपवाद की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक क्या उसी अपवाद के रहते किसी पति के खिलाफ दुष्कर्म के आरोप में अभियोजन चलाया जा सकता है? यहां एक ओर विवाह के भीतर महिला की सहमति, गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता का प्रश्न है तो दूसरी ओर किसी व्यक्ति को उस कृत्य के लिए दंडित किए जाने का प्रश्न भी है, जिसे कानून उस समय अपराध के दायरे से बाहर रखता है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई ने इसी टकराव को फिर से हमारे सामने ला दिया है।
वर्ष 2017 में दिल्ली हाई कोर्ट के सामने वैवाहिक दुष्कर्म के अपवाद को चुनौती देने वाली दो याचिकाएं पहुंचीं। इन पर दिए गए फैसले में एक ही पीठ के दो न्यायाधीशों की राय अलग-अलग थी। न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने कहा, 'विवाह में प्रवेश करने वाली महिला अपने पति के अधीन नहीं हो जाती और न ही वह हर परिस्थिति में यौन संबंध के लिए अपनी स्थायी सहमति देती है।' दूसरी ओर न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी में लाने से असहमति जताते हुए कहा, 'यह अपवाद कहता है कि पति और पत्नी के बीच यौन कृत्य दुष्कर्म नहीं है।' न्यायालय की इन दोनों राय के बीच केंद्र सरकार एक अलग दृष्टिकोण रखती है। 2024 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दाखिल अपने हलफनामे में वैवाहिक दुष्कर्म के अपवाद को हटाने का विरोध किया। सरकार ने माना कि 'पति को निश्चित रूप से पत्नी की सहमति का उल्लंघन करने का कोई मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन विवाह जैसी संस्था के भीतर होने वाले कृत्य को भारत में मान्य 'दुष्कर्म' के अपराध के रूप में देखना अत्यधिक कठोर और इसलिए असंगत माना जा सकता है।'
सरकार ने आगे कहा, 'विवाह से महिला की सहमति समाप्त नहीं होती और उसकी सहमति के उल्लंघन के परिणाम दंडनीय होने चाहिए। ऐसे मामलों से निपटने के लिए भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 में पहले से ही ऐसे कानूनी प्रविधान मौजूद हैं।' घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा-3 के अनुसार महिला के साथ किया गया ऐसा यौन व्यवहार, जो उसकी इच्छा के विरुद्ध हो, उसे अपमानित करे या उसकी गरिमा का उल्लंघन करे, यौन हिंसा के दायरे में आता है। यानी विवाह के भीतर महिला के साथ होने वाली यौन हिंसा के लिए कानून में पहले से स्पष्ट प्रविधान मौजूद हैं। ऐसी स्थिति में महिला को संरक्षण देने के साथ-साथ न्यायालय से विभिन्न प्रकार की राहत पाने का अधिकार भी है।
यह समझना होगा कि जिस कानून को बनाने की बात की जा रही है, उसका भारतीय सामाजिक परिप्रेक्ष्य में गंभीर प्रभाव हो सकता है। वैवाहिक दुष्कर्म का प्रश्न उतना सहज नहीं है, जितना इसे केवल महिलाओं की गरिमा की रक्षा के आधार पर सहज बनाने का प्रयास किया जा रहा है। आखिर बंद दरवाजे के भीतर जो कुछ घटित हुआ, उसकी सत्यता की पुष्टि किस आधार पर होगी? क्या मात्र पत्नी का कथन पति को अपराधी घोषित कर देगा? आखिर पति स्वयं को निर्दोष कैसे सिद्ध करेगा? वैवाहिक दुष्कर्म को सामान्य दुष्कर्म के समान अपराध की श्रेणी में रखने की मांग पर इसलिए केवल भावनात्मक दृष्टि से विचार करना पर्याप्त नहीं होगा। दोनों परिस्थितियों के बीच मौजूद सामाजिक और व्यावहारिक अंतर को भी समझना होगा। महिला के साथ यौन हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती, लेकिन इसके साथ यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि बंद कमरे में घटित किसी घटना को किस प्रकार परिभाषित किया जाएगा, उसके वास्तविक स्वरूप का निर्धारण किस आधार पर होगा और उसका कानून से समाधान करने के क्या सामाजिक परिणाम होंगे? जब पहले से मौजूद कानून महिला को यौन हिंसा से संरक्षण और न्यायिक राहत देने की व्यवस्था करते हैं, तब एक नए आपराधिक प्रविधान की आवश्यकता और उसके दूरगामी प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
पारिवारिक विवादों में आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति से इन्कार नहीं किया जा सकता। इसलिए महिला की शिकायत को गंभीरता से लेने के साथ यह भी विचार करना होगा कि प्रस्तावित कानून का स्वरूप कहीं ऐसे मामलों में नए विवादों और उसके संभावित दुरुपयोग की गुंजाइश तो पैदा नहीं करेगा। किसी महिला के कथन को केवल उसके महिला होने के कारण स्वतः सत्य नहीं मान लिया जाना चाहिए। सत्य और असत्य का संबंध किसी व्यक्ति के लिंग से नहीं, बल्कि तथ्यों से होता है।
हर सामाजिक समस्या का समाधान कानून के माध्यम से तलाशना उचित नहीं है। आवश्यकता ऐसे सामाजिक ढांचे के निर्माण की है, जहां पुरुषों को महिलाओं की गरिमा, सहमति और यौन स्वायत्तता का सम्मान करना सिखाया जाए, न कि हर समस्या का समाधान उन्हें कठघरे में खड़ा करने में तलाशा जाए।
(लेखिका समाजशास्त्री हैं)
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