ममता बनर्जी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पहले निर्वाचन आयोग ने अंतरिम फैसले के जरिये उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न जब्त कर लिया और अब राज्य के दो विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनावों में से एक में उनकी प्रत्याशी ने अपना नाम वापस ले लिया। इससे यही पता चलता है कि पश्चिम बंगाल में 15 वर्षों तक शासन करने वालीं ममता बनर्जी सत्ता हाथ से जाते ही चौतरफा मुश्किलों से घिर गई हैं। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में पराजय के बावजूद तृणमूल कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी थी, लेकिन फिर बिखराव का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। पहले विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के अधिसंख्य विधायकों ने ममता बनर्जी और उनके भतीजे के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और फिर बीस लोकसभा सदस्य भी पार्टी से छिटक गए। आज स्थिति यह है कि ममता बनर्जी विधानसभा में भी अपना प्रभाव खो चुकी हैं और लोकसभा में भी। यह भी ध्यान रहे कि उनके कुछ राज्यसभा सदस्य भी पार्टी छोड़ चुके हैं।

यह संभवतः पहली बार है, जब किसी राज्य में लगातार तीन कार्यकाल पूरे करने वाली कोई पार्टी इस तरह बिखरी हो। राजनीति में कुछ भी हो सकता है, लेकिन इस समय ममता बनर्जी जिस तरह चौतरफा संकट से घिरी हुई हैं, उसे देखते हुए यह कहना कठिन है कि राजनीतिक रूप से उनकी वापसी हो सकती है। वैसे तो जैसे तृणमूल कांग्रेस में टूट-फूट हुई, वैसे ही महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ भी हो चुकी है, लेकिन इन दोनों दलों के मुकाबले ममता की पार्टी राजनीतिक रूप से कहीं अधिक सशक्त थी। ममता चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देंगी, लेकिन इसमें संदेह है कि उन्हें राहत मिल सकेगी।

तृणमूल कांग्रेस की दुर्गति यही बता रही है कि विचारधाराविहीन राजनीतिक दलों का भविष्य उज्ज्वल नहीं होता और जैसे ही वे सत्ता खोते हैं अथवा सत्ता पाने में सक्षम नहीं दिखने लगते, उनमें बिखराव शुरू हो जाता है। तृणमूल कांग्रेस में बिखराव का मूल कारण यह है कि परिवर्तन के नारे के साथ सत्ता में आईं ममता बनर्जी ने मनमाने तरीके से शासन चलाया। उन्होंने भ्रष्ट और अराजक तत्वों को संरक्षण प्रदान किया। इससे ऊबी जनता ने मौका मिलते ही उन्हें सबक सिखाया। ऐसा ही वामदलों के साथ हुआ था। दोनों में साझा यह है कि उन्होंने दमनात्मक तरीके से शासन चलाया। भले ही ममता बनर्जी अपनी पार्टी की दुर्गति के लिए भाजपा और चुनाव आयोग को दोष दें, लेकिन अपनी स्थिति के लिए वही जिम्मेदार हैं। तृणमूल कांग्रेस की दुर्गति से सत्ता में आकर मनमानी करने वाले राजनीतिक दलों को सबक लेना चाहिए।