शंकर शरण। विश्व राजनीति में एकाएक रोचक मोड़ आ गया है। अमेरिका द्वारा ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश विफल रहने, पश्चिमी एशिया में अमेरिका के मित्र देशों पर ईरान द्वारा लगातार चोट करने, उसी दौरान मक्का समझौते द्वारा तुर्किये, पाकिस्तान और सऊदी अरब का 'इस्लामी नाटो' जैसा मोर्चा बनाने, फिर यमन में हूती विद्रोहियों का हाथ ऊपर हो जाने और समुद्र में एक महत्वपूर्ण तेल मार्ग पर कब्जा कर लेने, हूतियों द्वारा सऊदी अरब पर ड्रोन हमले के खतरे और इस पर अमेरिका का निर्विकार हो जाना, जबकि सऊदी अरब के साथ उसकी रक्षा संधि है-ये सभी घटनाएं महत्वपूर्ण हैं। कई तो अप्रत्याशित भी। इन सबका कुछ सप्ताहों में इकट्ठे घट जाना विश्व राजनीति में एक नए मोड़ का संकेत है। अमेरिका ने पश्चिमी एशिया में अपनी सैनिक रणनीतिक नीति एकाएक बदल ली। वहां के मामलों में अपना सक्रिय सैनिक हस्तक्षेप छोड़ या रोक दिया है। इससे वहां तमाम मुस्लिम देशों के बीच संबंध अनिश्चित जैसे हो गए हैं। इसका रोचक प्रमाण स्वयं सऊदी अरब की स्थिति है। इस्लाम का केंद होने के कारण तरह-तरह के उग्र इस्लामी तत्व उस पर कब्जे या प्रभाव की चाह रखते रहे हैं, पर लंबे समय से उसकी सत्ता अमेरिकी समर्थन से सुरक्षित रही है, पर अब वह अपर्याप्त लग रहा है। हूतियों द्वारा सऊदी अरब पर चोट पर अमेरिकी प्रशासन न केवल शांत है, बल्कि हूतियों से वार्ता करना चाह रहा है।

'इस्लामी नाटो' बनने के बावजूद सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों द्वारा चोट कराना क्या दर्शाता है? यही कि पूरे मुस्लिम जगत में अनिश्चितता आ गई है। सऊदी अरब के बाद दूसरे सबसे महत्वपूर्ण मुस्लिम देश ईरान की स्थिति एक तरफ मजबूत तो दूसरी ओर कमजोर भी हुई है। उसकी सैनिक-रणनीतिक हैसियत पहले से बढ़ी लगती है, क्योंकि उसने अमेरिकी सैन्य प्रहार झेलकर अपना शासन बचाए रखने में सफलता पाई। साथ ही होर्मुज तेल मार्ग पर अपना नियंत्रण पहले से अधिक बढ़ा लिया है, किंतु उसकी अंदरूनी स्थिति बहुत खराब हुई है। हमास की ताकत में भारी गिरावट है, जो अब तक ईरान का अघोषित हाथ जैसा रहा है। इजरायल ने हमास को काफी कुछ ध्वस्त कर दिया है। यह स्थायी भी हो सकता है।

इसलिए भी, क्योंकि कई मुस्लिम देश भी हमास को नापसंद करते हैं। इस तरह इजरायल की स्थिति पहले से सुधरी है, जबकि उस देश को मिटा देना ईरानी शासक घोषित लक्ष्य रखते हैं। आने वाले दिनों में इजरायल की स्थिति और मजबूत होने की संभावना है, क्योंकि सऊदी अरब अपनी रक्षा के लिए उसका साथ लेना चाहता है। तकनीकी, आर्थिक और सामरिक, तीनों क्षेत्रों में उसकी ताकत काफी कुछ अपने बल पर है। जिस इजरायल को दो दशक पहले आसपास के तमाम मुस्लिम देशों से घोषित खतरा रहता रहा, वह आज अनेक शत्रुओं से मुक्त जैसी स्थिति में है। वस्तुत: ईरान के अलावा इजरायल पर हमले करने की चाह रखने वाला शायद ही कोई मुस्लिम देश है। इसका अर्थ यह भी है कि अरब देशों की इस्लामी एकता और अंतरराष्ट्रीय दबदबे की पिछली राजनीति नष्टप्राय हो चुकी है। हालिया वर्षों में ईरान के अलावा कोई भी मुस्लिम देश इजरायल के खात्मे की बात करने वाला नहीं रह गया है।

पश्चिमी एशिया में अभी अमेरिकी उदासीनता झलकने के बाद से वहां रणनीतिक खालीपन जैसा आया है। उसे भरने न तो चीन, न रूस, न नाटो आता दिखाई दे रहा है। तब ईरान वहां अकेले कोई दबदबा बनाए, इसे आसपास के सभी मुस्लिम देश नामंजूर करेंगे। ईरान की बढ़त जितनी दिख रही है, उतनी बनी रहना भी संदिग्ध है। इसके कारण बाह्य और अंदरूनी, दोनों हैं। ईरान की सत्ता जगजाहिर रूप से इस्लामी तानाशाही है। उसके विरुद्ध अंदरूनी असंतोष व्यापक है, जिसे कठोर दमन से ही नियंत्रित रखा गया है। संपूर्ण मुस्लिम जगत में तुर्किये और ईरान में ही सबसे अधिक आधुनिक मानसिकता के मुस्लिम हैं, जो इस्लाम को बीती बात समझते हैं। फलत: ईरान की इस्लामी सत्ता देश के अंदर कठोरता रखने से ही बची रही है। अभी तक अमेरिका को खत्म कर देने और अमेरिका-विरोध के नाम पर ही वह देश में अपना वैचारिक दबाव या नैतिक वैधता बनाए रही है, किंतु यह एक बनावटी, दुर्बल आधार है।

ईरान के प्रबुद्ध वर्ग में यह प्रश्न दिनों-दिन बढ़ेगा कि गत चार दशकों में ईरानी सत्ता द्वारा 'अमेरिका को मौत' की जिद से ईरान को क्या मिला? ईरान ने केवल आस-पास के अमेरिकी अड्डों और उसके मित्र देशों को हानि पहुंचाई। अमेरिकी शक्ति केवल सैनिक नहीं, आर्थिक, तकनीकी, बौद्धिक, सांस्कृतिक भी है। इन सभी क्षेत्रों में ईरान पीछे है। प्राकृतिक तेल के एक सबसे बड़े भंडार के सिवा ईरान की रणनीतिक शक्ति बाहरी दुनिया के लिए नगण्य अर्थ रखती है। तब ऐसी बेमेल और अनावश्यक दुश्मनी ईरान की इस्लामी सत्ता ने क्यों ठान रखी है? पश्चिम एशिया में अमेरिका द्वारा सैन्य उदासीनता से उस क्षेत्र में शक्ति-संतुलन किसी के पक्ष में जाने के बदले अनिश्चित बने रहने की दिशा है।

यह कुल मिलाकर तमाम मुस्लिम देशों के आपसी संबंधों को अधिक बदलेगा। अब सभी को पहले अपनी परवाह करने की चिंता रहेगी। अर्थात मुस्लिम देश 'इस्लामी एकता' के बजाय नई सेक्युलर दिशाओं की तलाश अधिक व्यावहारिक समझेंगे। इसका एक बड़ा कारण स्वयं इस्लामी मतवाद पर दुनिया का फोकस बढ़ना भी है। सितंबर 2001 में न्यूयार्क पर जिहादी हमले के बाद 25 वर्षों ने संपूर्ण इस्लामी सिद्धांत-व्यवहार के प्रति पूरे विश्व को नए सिरे से सजग, शिक्षित किया है। वह प्रक्रिया दिनों-दिन बढ़ रही है। जिसमें स्वयं मुस्लिम समाज में पुनर्विचार बढ़ना भी शामिल है। इसने तुलनात्मक रूप से तमाम मुस्लिम शासकों, नेताओं और उच्च वर्ग को भी बहुत कुछ सिखाया है। वे अनुभव और अवलोकन से इस्लामी मतवाद की खामियों और अप्रासंगिकता को पहले से अधिक समझ रहे हैं। इजरायल के प्रति उनकी नीति में बदलाव भी उसी का संकेत है। ईरान-अमेरिका युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आने वाले बदलाव सकारात्मक भी हो सकते हैं। अमेरिका के कमजोर होने के बदले इस्लामी मानसिकता के कमजोर और परास्त होने की भी संभावना है। (लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर हैं)